ये कविता मेरी दो तीन दौर को इकट्ठे जोड़ कर बनायीं गयी हैं . इसमें कुछ बाते हैं जो मुझे अपनी उन कृष्ण भक्त साधको को कहनी हैं जो बस कृष्ण प्रेम में पागल हैं . फिर अपने उन दोस्तों को बतानी हैं जो मेरी soulmate की परिभाषा के बारे में पूछते रहते हैं . ये कविता soulmate वाले कन्सेप्ट से थोडा आगे भक्ति की धरा में उस भाव को बढ़ा देने के लिए लिखी हैं . वन्दना जी के लिए तो खैर हैं ही . अपनी soulmate ढूँढने के आखिरी प्रयासों में ये कविता लिखी हैं की उसे अकल आये और वो मेरी जिंदगी में आये किसी बहाने से . और अब असली प्रार्थना उस माता जी से जो दो महीने से मेरी बात सुन नहीं रही हैं क्योंकि ये कविता असल में उन्ही को पूरी समझ आएगी और मुझे भरोसा हैं की एक बार फिर से वो मेरे जीवन में आएँगी अपने पतिदेव को ढूँढने के लिए . अगर मिल गया हो तो भी बता दे . आजकल स्पिरिचुअल माहौल में बड़े बदलाव हो गए इसीलिए मजबूरी में मुझे कुछ बताना पड़ रहा हैं . पर ये सदा नहीं रहेगा और सृष्टि वापस एक बार रिसेट मोड में जाएगी . आशा हैं जिनके लिए लिखी गयी हैं वो मेल करेगी क्योंकि बहुत समय से रहस्य अपने अन्दर रखने से प्रोब्लम सहन नहीं हो रही हैं . बाकि सभी लोग एन्जॉय करे एक नोर्मल कविता की तरह कि वह क्या लिखा हैं वीरेन्द्र ने .
मै फिर तुम्हे कहता हू
दर्द तुम्हारा भी खुद सहता हू
उस कृष्ण कि ना बस तुम बात करो
उसके लिए ना तुम अपनी काली रात करो
भक्ति कि दुनिया का वो सबसे बड़ा दाग हैं
फोड़ दिए जिसने मेरी गोपियों के भाग हैं
छीन कर मेरे होठो कि हंसी जो दर्द सारे अपने दे गया
सपनो से भरी मेरी आँखों में जो बहते आंसू दे गया
मेरी आत्मा को जो सबमे बसाकर टुकडो में मुझे बाँट गया
कुरेद कर मेरे जख्मो को उन पर नमक छांट गया
उसी कृष्ण की तू क्यों इतनी दीवानी हैं
पाकर जिसे अच्छे अच्छो की जिन्दगी वीरानी हैं
मेरे आंसुओ का मै तुम्हे अब भी वास्ता देता हू
उसकी दुनिया से जाने को सीधा रास्ता बता देता हू
प्राणों से बसी उसकी यादो को बस तुम सदा के लिए भूल जाओ
चुपचाप सोने की कोशिश करो ना वृन्दावन की धूल खाओ
अगर ऐसा ना कर पाई तो मेरी तरह कही की ना रहोगी
फूलो से डरने वाली तुम दर्द के कांटे बता कैसे सहोगी
तेरे सारे सवालो का जवाब मै चुप रहकर दे देता हूँ
तेरे मौन व्यंग्यो को मै चीख चीख कर ले लेता हूँ
मेरी भक्ति बस तेरा प्यार फिर क्यों मुझे खींच नहीं लेती
किस्मत तेरे सामने हैं फिर क्यों मुट्ठी में भींच नहीं लेती
संदेह क्यों करती हैं जब विश्व का पूरा रहस्य तेरे सामने हैं
आत्मा तू जिसकी हैं उस पर अविश्वास के क्या मायने हैं
सिर्फ और सिर्फ उसका हो जाना तेरा प्रारब्ध हैं
पूछ अपनी सांसो से क्या ये नए जीवन का आरंभ हैं
बिना शर्तो के जो कृष्ण को मजबूर कर गया
उस वीरेन के हिस्से का सारा सुख क्यों मर गया
दुनिया अपने हिसाब से तोलेगी क्योंकि पुराने सारे तराजू हैं
मेरे ज्ञान समझ को जो उठा पाए ऐसे ना किसी के बुद्धि में बाजू हैं
जितनी जल्दी हो सके अपने जीवन की दिशा तय करके रहो
देर अगर हो गयी तो शायद माफ़ी मांगने लायक भी ना रहो
सच ये कि अँधेरी रात को मिटाने जैसे कोई सूरज उगता हैं
झूठ बोलती तेरी बुद्धि जो वीरेन तुझे पागल लगता हैं
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
-
सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
-
सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...
-
सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
1 टिप्पणी:
ये तो प्रेम की बात है ऊधो
बन्दगी तेरे बसकी नही है
यहाँ दिल दे के होते हैं सौदे
आशिकी इतनी सस्ती नही है
अब और क्या कहूँ जनाब्…………चाहे जिस तरफ़ से सोचना इस बारे मे विरेन मगर प्रेम अथाह सागर है इसका पार किसी ने नही पाया और तुम तो अभी पहली सीढी पर खडे हो जहाँ इस वक्त वो तुम्हे नाच नचा रहा है और तुम हो कि उसकी सुनते नही हो तो वो कौन सा कम है वो भी नही मानेगा जब तक तुम हार नही जाओगे…………।ये प्रेम की गलियाँ बडी तंग होती हैं इसमे दो नही समाते सब एकाकार होता है।
एक टिप्पणी भेजें