गुरुवार, 27 जनवरी 2011

राधा कृष्ण प्रेमाभक्ति

ये कविता बस छोटी सी हैं . बस लिख डाला , मेरे साथ दिक्कत यही हैं की भाव बहुत ज्यादा हैं इसलिए किसी को एक लाइन की टिपण्णी देने बैठता हू तो विचारो की असंख्य बाते आ जाती हैं . यहाँ टिपण्णी देने गया था , कविता बना बैठा ( http://kavyawani.blogspot.com/2011/01/blog-post.html )

आप फिर भी पढ़ लीजिये और मार्गदर्शन करे

दर्द में आंसू अगर राधा को ना आते

कन्हैया कृष्ण भला क्यों उन्हें अपनाते
प्रेम में विरह का एक पड़ाव हैं
परमात्मा से जहाँ गहरा जुडाव हैं
पर प्रभु आखिर में हमेशा अपनाते हैं
तभी तो हम हरे राधा कृष्ण नाम गाते हैं

प्रियतम तो हमेशा खुद कि आत्मा होता हैं
फिर भी हमारा मन हमेशा धीरज खोता हैं
प्रेम कि कोई शर्त नहीं होती
भक्ति राधा मीरा सी कही होती
तो मै अपना आप कृष्ण में फिर से मिला देता
भागवत के ज्ञान वैराग्य को दिल में जिला देता

मिलना बिछुड़ना एक सीमा तक ही रहेगा
आखिर में तो परमात्मा बस यही कहेगा
तू मेरा और मै तेरा प्रियतम फिर क्यों तू उदास हैं
राधा की परीक्षा पर खरा उतरा इसीलिए "वीरेन " खास हैं


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

1 टिप्पणी:

shekhar kumawat ने कहा…

waqy me bahut bahut sundar bhav

mujh na chiz ki kaha itni samjh jo itne gahrai tak utar saku

aap waqy me mahan hai

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...