रविवार, 28 मार्च 2010

एक कविता प्यार को समर्पित ( एक अपने अनुभव पर आधारित कविता )

यह कविता एक सच्चे अनुभव पर आधारित हैं
ये एक बहुत ही गहरे अनुभव के बाद लिखी हैं। असल में मैं इस दर्द को सहन नहीं कर पाया और टूटकर ये कविता लिख पाया . बस शुरुवात कि दो पंक्तिया मैंने एक ब्लोगेर अम्बरीश जी से ली हैं । आगे की सारी पंक्तिया ( नीले रंग में ) मेरी खुद की हैं
आज मेरे सामने खुशिया कम ज्यादा गम हैं
फिर भी लगता हैं मेरी आँखों में आंसू कम हैं


मेरी छोटी सी गलती कि इतनी बड़ी सजा मिली
उसे प्यार करने पर वो मुझसे खफा मिली
जिंदगी में मुझे उससे कुछ भी तो प्यारा नहीं
पर मेरा सच्चा प्यार उसने स्वीकारा नहीं

मेरे इस एकतरफा प्यार पर मैं टूट गया हूँ
ईश्वर भी कहता हैं "वीरेन मैं तुझसे रूठ गया हूँ "
मेरी जिंदगी का वो सबसे बड़ा सपना हैं
चाहतो में उसकी अब मुझे मर मिटना हैं

मुझे क्या जरुरत थी अपने को यूँ फंसाने की
उसकी ख़ुशी के लिए अपने गम दबाने की
उसकी आत्मा से उठी एक सच्ची दुआ थी
मेरे मन को खींच लेने वाली वो एक हवा थी

मेरी सारी भावनाओ को छीन कर ले गयी
सारे दर्द और और आहे वो मुझे दे गयी
दर्द के इस मरुस्थल में जैसे तैसे आगे सरकता हूँ
अब मौत मुझे आती नहीं और मैं तड़पता हूँ

मैं सिर्फ इतनी पंक्तियाँ ही उसको समर्पित कर सकता हूँ ।
अभी तुमको मेरी जरुरत नहीं हैं बहुत चाहने वाले मिल जायेगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हे जब डराने लगी जवानी भी दमन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये

4 टिप्‍पणियां:

Kulwant Happy ने कहा…

मुझे गम दिए, उसको सुकून दिया
क्योंकि रब्ब जानता था,
मुझसे सह न होगा उसका दर्द
खुद के दर्द से दो चार हो जी लूँगा
वो खुश है अपने रंग में
सोचकर गम ए जहर पी लूँगा
उसके जख्म देख मर जाता
खुद के तो खुद ही सी लूँगा

सी-सिलाई

कुलवंत हैप्पी

kunwarji's ने कहा…

"कोई शर्त होती नहीं प्यार में,मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया,
सितारे नजर में जो चमके जरा,बुझाने लगी आरती का दिया,
जब अपनी नजर में ही गिरने लगो,
अंधेरो अपने ही घिरने लगो,

तब तुम मेरे पास आना प्रिये,मेरा सर झुका है,
झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए......"

समंदर भी बह जाता होगा ये तो ना सोचा था,
नदियों ने देखा तो रो पड़ी,
पहाड़ का बिखरना कोई आम बात नहीं,
रेत के टीलों को हैरानी तो होगी ही,
आसमान को सहारा तलाशते तो ना देखा था,
हवाओं ने देखा तो घबरा गयीं!
हवा बेखबर,रेत के टीले अनजान और नदियाँ बेचारी मासूम,
वो क्या जाने समंदर भी बहना चाहता है कभी,
पहाड़ कि बिखरने कि तमन्ना बे बुनियाद नहीं,
आसमान अकेला कब तक देखे सभी को सहारे मिलते हुए!
मगर वो जानते भी है कि उनको ऐसी कोई जरुरत नहीं,
ऐसे रहना उनकी कोई मजबूरी भी नहीं,

फिर भी.....

कुंवर जी,

वीरेंद्र रावल ने कहा…

धन्यवाद हरदीप
मेरे सारे दर्द को तुने अपनी टिपण्णी में डाल दिया . वैसे तो पूरी कविता ही जबरदस्त थी .
पर ये पंक्तिया काफी भा गयी
"आसमान अकेला कब तक देखे सभी को सहारे मिलते हुए!"
मेरे साथ एक सच्चे दुखद घटनाक्रम को लेकर ये कविता मैंने रची और इसको पूरा एक तरह से तेरी टिपण्णी ने किया

kunwarji's ने कहा…

मै अब क्या कहूं सर जी,कल जब ये कविता पढ़ी तो जो सबसे पहले दिमाग में चला वो ये ही था!

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...