शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

भजन - जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान् की

ये भजन मैंने 2008 में बापूजी के दिल्ली ( द्वारिका ) में हुए सत्संग में सुना था । मुझे इसके मूल लेखक का पता नहीं हैं । पर ये भजन बहुत ही अच्छा हैं जिसमे इश्वर प्रेमी भक्तों के भाव बिलकुल सटीक प्रदर्शित किये गए हैं ।


जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान् की , किसी सूझ वाली आँख ने पहचान की
नामदेव ने पकाई रोटी कुत्ते ने उठाई, पीछे घी का कटोरा लिए जा रहे
बोले रूखी तो ना खाओ स्वामी घी तो लगाओ
रूप अपना क्यूँ मुझसे छुपा रहे
तेरा मेरा एक नूर फिर काहे को हजूर तुने शकल बनायीं हैं श्वान की
मुझे ओढनी उढ़ा दी इंसान की


निगाह मीरा की निराली पी के जहर की प्याली
ऐसा गिरिधर बसाया श्वास में
जब आया काला नाग बोली धन्य मेरे भाग
आज आये प्रभु सांप के लिबास में,
आओ आओ बलिहार प्यारे कृष्ण मुरार
बड़ी कृपा हैं कृपानिधान की , बलिहारी हूँ मैं आपके एहसान की ,


इसी तरह सूरदास निगाह जिनकी थी ख़ास
ऐसा नैनो में नशा था हरिनाम का
नैन हुए जब बंद तब मिला वो आनंद
देखा अजब नज़ारा भगवान का
हर जगह वो समाया सारे जग को बताया
आई आँखों में रौशनी थी ज्ञान की
देखि झूम झूम झांकी भगवान् की

गुरु नानक कबीर सही जिनकी थी नजीर
देखा पत्ते पत्ते में निरंकार को
नजदीक और दूर वही हाजर हजूर
यही सार समझाया संसार को
ये जहां शहर गाँव और जंगल बियाबान
मेहरबानियाँ हैं उस मेहरबान की
सारी चीज़ें हैं ये एक ही दूकान की

जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान की ...............







1 टिप्पणी:

kunwarji's ने कहा…

बहुत अच्छा लगा जी ये भजन...

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...