बुधवार, 31 मार्च 2010
दैनिक कडिया भाग पांच ( गुडगाँव विशेष )
विदेशो की तर्ज़ पर S E Z बनाने वाले भूल गए की चीन में दस S E Z हैं और सारे समुद्र के पास और बंजर और बेकार भूमि पर । मतलब उन्होंने हमारी तरह कृषि योग्य भूमि को प्रयोग में नहीं लाया । गुडगाँव के सारे मूल निवासी जिनके पास बेचने के लिए जमीन नहीं हैं उनका दिल शहरी चकाचौंध को देखकर टूट जाता हैं . अंदर गुडगाँव में जो पुराने निवासी और आस पास के गाँव में जो लोग रहते हैं ।
जिनके पास जमीन हैं उनका तो लगभग उद्धार जमीन बेचने से हो गया हैं । या फिर कई तो बस सिर्फ किराये के मकान की आमदनी ( जो बीस पच्चीस हज़ार आराम से हो जाती हैं ) से ही एश कर रहे हैं । उन बन्दों को कोई काम नहीं होता । सुबह जब हम कम्पनी के लिए निकलते हुए इन्हें देखते हैं तो दुःख होता हैं की देखो कुछ करने की जरुरत नहीं । ये लोग सुबह राजनीति पर चर्चा कर रहे होते हैं और शाम को भी बिलकुल उसी पोज़ में बैठे मिलेंगे । पूरे दिन की कोई आऊट पुट नहीं । पर फिर भी हमारे जितनी ही इनकी आमदनी और खर्चे होते हैं , शायद कइयो कि तो हमसे कई गुना ज्यादा आमदनी हैं ।
पर फिर भी यहाँ फ्लैट के रेट भी बहुत ज्यादा हैं । सबसे ज्यादा हंसी तो विज्ञापनों में लगे रेट को देखकर आती हैं । पैंतीस लाख रुपये में तो तीन बी एच के मिलता हैं । इसे भी मेरे कई अमीर मित्र reasonable कहकर बस मेरा मन दुखी करते हैं । तीस चालीस हज़ार की सेलरी वाला भी कितनी कोशिश कर ले बिना लोन लिया बेचारा यहाँ घर नहीं बना सकता ।
और साफ़ सफाई के हिसाब से कई जगह तो बस दुर्दशा ही हैं . डी एल एफ ही हैं जिसके सहारे पूरे गुडगाँव को जाना जा रहा हैं जैसे ही आप इसे छोड़ देंगे आपको रियल भारत दिखेगा जैसे पूरे वातावरण में हमेशा धूल रहेगी । जैसे मरुस्थल में रहती हो । हमारे कई दुसरे राज्यों के दोस्त कभी समझ ही नहीं पाते कि गुडगाँव में इतनी धूल आती कहाँ से हैं ।
और एक वास्तविक समस्या गुडगाँव से मानेसर ( जयपुर हाइवे ) पर आपको आपको कोई दस किलोमीटर का यु टर्न हैं । यह भी अब दो घंटे मुख्यमंत्री के आदेश पर खोला जाता हैं हीरो होंडा चौक पर । अब हीरो होंडा चौक को ही ले , जो लोग रोज़ मानेसर जाते हैं उन्हें पता होगा । यहाँ पता नहीं क्यों लगभग हर रोज़ सीवेरेज़ का पानी इतना हो जाता हैं की हाइवे की सारी गाड़िया दो फुट पानी में खड़ी हो जाती हैं । और गलती से जल्दी के चक्कर में सर्विस लेन में चले गए तो बस भगवान् ही मालिक हैं आपका । इस समस्या की तरफ पता नहीं प्रशासन का ध्यान क्यों नहीं जाता । वहां से गुजरते हुए जाम लगता हैं और आप बिलकुल बदबू से बेहाल हो जाते हैं । सबसे बुरा हाल उन कम्पनी कर्मचारियो का होता हैं जो बेचारे अपनी कम्पनी की बस का यहाँ इंतज़ार करते हैं ।
रविवार, 28 मार्च 2010
एक कविता प्यार को समर्पित ( एक अपने अनुभव पर आधारित कविता )
ये एक बहुत ही गहरे अनुभव के बाद लिखी हैं। असल में मैं इस दर्द को सहन नहीं कर पाया और टूटकर ये कविता लिख पाया . बस शुरुवात कि दो पंक्तिया मैंने एक ब्लोगेर अम्बरीश जी से ली हैं । आगे की सारी पंक्तिया ( नीले रंग में ) मेरी खुद की हैं ।
आज मेरे सामने खुशिया कम ज्यादा गम हैं
फिर भी लगता हैं मेरी आँखों में आंसू कम हैं
मेरी छोटी सी गलती कि इतनी बड़ी सजा मिली
उसे प्यार करने पर वो मुझसे खफा मिली
जिंदगी में मुझे उससे कुछ भी तो प्यारा नहीं
पर मेरा सच्चा प्यार उसने स्वीकारा नहीं
मेरे इस एकतरफा प्यार पर मैं टूट गया हूँ
ईश्वर भी कहता हैं "वीरेन मैं तुझसे रूठ गया हूँ "
मेरी जिंदगी का वो सबसे बड़ा सपना हैं
चाहतो में उसकी अब मुझे मर मिटना हैं
मुझे क्या जरुरत थी अपने को यूँ फंसाने की
उसकी ख़ुशी के लिए अपने गम दबाने की
उसकी आत्मा से उठी एक सच्ची दुआ थी
मेरे मन को खींच लेने वाली वो एक हवा थी
मेरी सारी भावनाओ को छीन कर ले गयी
सारे दर्द और और आहे वो मुझे दे गयी
दर्द के इस मरुस्थल में जैसे तैसे आगे सरकता हूँ
अब मौत मुझे आती नहीं और मैं तड़पता हूँ
मैं सिर्फ इतनी पंक्तियाँ ही उसको समर्पित कर सकता हूँ ।
अभी तुमको मेरी जरुरत नहीं हैं बहुत चाहने वाले मिल जायेगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हे जब डराने लगी जवानी भी दमन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
हृदय से निकली मेरी काल्पनिक जीवनी ( हास्य व्यंग्य )
आप तो दुनिया बनाकर भाग गए । अकेला मरने के लिए मुझे छोड़ दिया । बचपन में स्कूल में पिटाई खाने का डर सताता रहता था पर आप कोई ज्यादा मददगार ना हुए । उस साइंस के पीरियड में डिजिटल घडी की एक एक मिनट को गिनता मैं आखिरी क्षण में घंटी सुनने के लिए तरस जाता पर कमीना अमित फिर चुगली कर देता
" सर , इसने केमिस्ट्री कि कॉपी ही नहीं बनायीं " और दो तीन घूंसे प्राथमिक उपचार के तौर पर नसीब में आ ही जाते थे । बचपन में ही सत्संग में सुने संतोष के वचनों से इतना तो बल मिला कि चलो कॉपी तो बायोलोजी और फिजिक्स कि भी नहीं बनायीं , बस एक ही सब्जेक्ट पर धुनाई हुई ।
थ्री इडियट कि तर्ज़ पर इंजीनियरिंग जैसे पिटे पिटाए कोर्स में दाखिला ले लिया । सोचा था बड़े ही बुद्धिमान शिक्षक और छात्र मिलेंगे । सपने जब टूटे जब बस वहां इडियट ही इडियट दिखे । एक से एक बुद्धू शिक्षक मार्गदर्शक बने और आवारो , लफंगो कि एक बड़ी भीड़ जो बस " सीनियर " होने के कारण हमें " फ्रेंक " बनाने कि आड़ लेकर हमारा " सामूहिक $#%$#%$#%#^ " करती थी । किसी तरह जुगाड़ लगाकर चार साल पूरे करने के बाद पता चला कि बस
" नौकरी नहीं हैं "
सारे देवी देवताओं , नेताओं भाई भतीजों और जुगाडू लोगों के सामने दंडवत होकर एक " टुच्ची " किस्म की ट्रेनिंग कम जॉब हथिया ही ली । छः हज़ार का आश्वासन पाकर भी सेलरी कभी पचपन सौ को पता नहीं क्यों छू नहीं पाई । खैर पंद्रह बीस साल पड़े रहे उसी फटीचर कम्पनी में ।
शादी के लिए जब रंगमंच जम रहा था तो सोचा एक आध इंटर कास्ट सीन का विकल्प देखा जाए पर इस विकल्प पर परिवार से मिली आंतंकवादी टाइप की धमकियों ने शोले ठन्डे कर दिए । अब हम " वीरू " तो थे नहीं ।
खैर , अब जब कुछ विकल्प ही नहीं रहा तो घर वालों ने एक खानदानी , सुशील लड़की से शादी करवा दी । वैसे वो लड़की खानदानी , सुशील के साथ थोड़ी .........................मतलब थोड़ी ज्यादा काली और मोटी मुटल्ली किस्म कि थी । पर अब सरल उसे प्यार से प्रिया कहकर तसल्ली पा लेता हैं ।
जिंदगी में लगी वाट में चुन्नू और मुन्नू ने लगी वाट में जन्म लेकर दो होने के बावजूद भी चार चाँद लगा दिए । नर्सरी के टाइम बेटों कि फीस ने कन्यादान और दहेज़ की याद दिला दी ।
फिर तनख्वाह में बढ़ोतरी के लिए भगवान् से मन हटाकर बॉस के ऑफिस में जाने से पहले बड़ी लम्बी प्लानिंग करते कि अगर वो कमीना ये कहेगा तो मैं ये कह दूंगा , उसने ऐसे टांग अडाई तो मैं वैसे पलटी मरूँगा , ऐसे वैसे सब सोच लिया । अंदर घुसा तो सर बेचारे बहुत बिजी थे। भाई कंप्यूटर पर इतने गेम हैं कि आप किसी को बीच में तंग करेंगे तो अन प्रोफैशनल कहे जा सकते हैं । पर सर फिर भी ताश का गेम छोड़कर मेरी बात सुनने लगे । हर शब्द के साथ उनके चेहरे पर लाल रंगत आ रही थी और आँखे बड़ी हो रही थी । खैर उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि विचारो का आदान प्रदान किसे कहते हैं , अर्थात मैं उस दिन अपने विचार लेकर बॉस के ऑफिस में गया था और उनके विचारों से सहमत हो आ गया था। और ऐसा कई सालों चलता रहा। कई बार दुर्घटनाये घटी जिन्हें इश्वर कि मर्जी रुपी ढाल कहकर अपने पापो को मैं बचाता रहा ।
स्कूल कोलेज और पड़ोसियों से बच्चो की शिकायतों ने किशोरवस्था की याद दिला दी, आखिर बच्चे किसके थे , बिलकुल बाप पर गए थे बल्कि और एडवांस वर्जन थे। पचास कि उम्र में हम अस्पतालों और अदालतों के परमानेंट तीर्थयात्री हो चुके थे । दोनों बेटे आवारा और लफंगे बनकर कहीं इंटर कास्ट जोड़ा बनाकर रह रहें हैं । फिर सेवा निवृति के महान दिन पर पूरे स्टाफ की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी की जो गलती तीस साल पहले इस गैर प्रतिभावान व्यक्ति को लेकर की थी आज उसके सुधारने का समय आ गया था ।
फिर दस पन्द्रह साल घर के पास में पार्कों में आवारा कुत्तों और सूअरों के साथ मोर्निंग वाक् करते बिताये । वैसे वो वाक् कम थी टाक ज्यादा थी , जिसमे कश्मीर से कन्याकुमारी के नेताओं को निपटाना , अमरीका रूस पाकिस्तान की विदेश नीति को बदलने की बात कहने , सचिन के संन्यास पर दुविधा जताना और एक बड़े युद्ध की सम्भावना से दुनिया के खत्म होने जैसी दुर्घटना पर चर्चा करना ।
आखिरी समय में " प्रिया " किसी कथा सत्संग में गयी हुई थी कि परलोक कि टीम आ गयी और बोली
" TIME OUT DEAR "
और बस मेरी आखिरी पोस्ट खत्म । पर दिक्कत थी कि अब मेरी बहस मजबूत करने के लिए मेरा वकील साथ नहीं था , कहना ना होगा कि बचपन में स्कूल में शुरू हुई धुनाई परलोक में बदस्तूर जारी रही ।
शनिवार, 27 मार्च 2010
सरल कि सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर हैं ( हास्य व्यंग्य )
इनकम नहीं हैं पर टैक्स काटा जा रहा हैं । कर्मचारियो में इज्ज़त बचाने के लिहाज़ से कस्टमर केयर लम्बे लम्बे फोन करता हैं कि ये 80 C में कोई नया झोल आया हो तो बताये । इन्वेस्ट कुछ करना नहीं , पैसा नहीं हैं तो निवेश क्या ख़ाक होगा । पच्चीस तारिख के बाद सौ सौ रुपये के U A ( उधार अलाउंस ) की EMI पर खर्चा चलने की कहानी सरल के लिए बिलकुल आम हैं ।
कहने भर को क्रेडिट कार्ड हैं पर सारे समाज में उसे कोई क्रेडिट नहीं मिला हैं । रिक्शा में बैठना अपने आप में उसके लिए स्टेटस सिम्बल से कम तो नहीं हैं क्योंकि रिक्शा वाला सरल से भी महंगा फोन रखता हैं । ऊपर से रिक्शा वाला भी उत्साह ख़तम करने में एक पल नहीं लगाता . " बाबूजी हम तो शौकिया रिक्शा चलाते हैं " सरल सोचता अगर यही काम मेरी मजबूरी बन जाए तो कम्पनी वाली नौकरी से ज्यादा कमाई हो ।
सरल के सारे बड़े बड़े नोट राशन की दूकान वाला पूरी जांच पड़ताल के बाद ग्रहण करता हैं । सरल झेंप जाता हैं कि कहीं अखबार में खबर में ना आ जाये कि सत्रह सौ रुपये के नकली नोटों के साथ रंगे हाथ एक एजेंट गिरफ्तार । मम्मी पापा का खूब नाम रोशन होने के सदमे में सरल नोटों कि परीक्षा तो पास कर लेता हैं । नहीं तो एक बार तो इतनी आत्म ग्लानी हुई कि क्या सारे नकली नोटों को भारत में फ़ैलाने कि फ्रान्चैज़ी कही मेरे नाम तो नहीं हो जाएगी और मेरा नाम कोई सरल कुमार से "सरल खान " रखकर क्रेडिट ले जाएगा ।
अभी सत्तासी रुपिए बचे हैं सोचा सरल ने कि सब्जी खरीद ली जाये । तीन चार आलू , दो टमाटर , एक गोभी , एक पेठा दुकानदार तौल देता हैं । और हाथ में बिना पोलिथीन के थमाता हैं । सरल झगडा करता हैं कि भैया पोलिथीन तो दे दो । वो सब्जी वाला कुछ " ग्लोबल वार्मिंग " जैसा अग्रेज़ी का भारी भरकम शब्द बाण मरकर सरल को बेहोश कर देता हैं । बेचारे सरल को समझ नहीं आया कि अपने चार चार इंच कि हथेलियो पर वो अठारह चीज़ें कैसे रखे। पडोसी सोचेंगे कि भीख मांगकर लाया हैं । फिर भी सरल बहस करता हैं । सब्जी वाला थोड़ी रणनीति से काम लेता हैं । एक कैप्री में घूम रही लड़की को बुलाता हैं कि बेटा इनको बताना । लड़की अपने कुरकुरे के पैकेट को ख़त्म करके और उसकी पोलिथीन को फेंक कर अपनी पतली सी आवाज़ में कहती हैं " he ! u dont know about the whole stuff of hollywood movie day after tomorrow . " सरल को अंग्रेजी तो खैर कहाँ समझ आनी थी । कुछ थोडा समझदार होने कि एक्टिंग करते हुए बोला " o yes , yes " और पेंटो कि जेब में आलू भरकर चल पड़ा ।
नमी दोनों जगह थी आँखों में आंसू और जेबों में फूटे टमाटर की। गरीब होना शायद आज सबसे बड़ा अभिश्राप हैं ।
सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...