गुरुवार, 19 नवंबर 2009

बापूजी के दो भजन - श्री सुरेशानंदजी के स्वर में

हम बापूजी के साधको को सुरेशानंद जी के भजन हमेशा बहुत ही अच्छे लगते हैं ।
  1. मैं पूरी कोशिश करूँगा की हर भजन को हिन्दी में टाइप करके यहाँ पोस्ट कर दूँ। इन्ही में से एक भजन जो बहुत ही प्यारा लगता है । ये भजन है " साधारण जन जानते भये चोबीस अवतार" और सीडी/कैसेट का शीर्षक है गुरु चालीसा । इस कसेट में गुरु चालीसा और इस भजन के अलावा भी एक भजन है जिसका शीर्षक है " जीवमात्र के कल्याण हेतु गुरुवार ने पृथ्वी स्वीकारी "
पहला भजन
साधारण जन जानते भये चौबीस अवतार ,
अंशरूप में आ ही चुके है कई बार करतार
ज्ञानी और अवतार में भेद एक है यह जान ,
ज्ञानी बरते दैव ते अवतार को न कछु आन
योगी को दे योग या दे ज्ञानी को ज्ञान ,
भक्ति पावे भक्त जन वो जिज्ञासु महान
विरले ही देखे यहाँ ऐसे संत सुजान ,
हमको तो भई मिल गए साईं आषाराम!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

दूसरा भजन
जीव मात्र के कल्याण हेतु गुरुवार ने पृथ्वी स्वीकारी ,
लखा पुत्र को गुरु रूप में माता मह्न्गीबा न्यारी
लाखो वर्ष बाद में देखि माता ऐसी सुविचारी
सांख्य शास्त्र के जनक कपिल मुनि की थी ऐसी महतारी
पुत्र को लाख गुरु रूप में ब्रह्म ज्ञान को पाया था
गिरते हुए मानव समाज के हित में लाल जनाया था
ब्रह्म रूप उन कपिल मुनि को पुत्र रूप में पाया था
देवहूति ने तज स्वार्थ को जनकल्याण कराया था
माँ की मंशा पूर्ण कपिल प्रभु ने ऐसे करवाई थी
नव कन्यो के के बाद में आकर नवधा भक्ति जगाई थी
त्रय बहनों के बाद में आकर गुरु ने ये दर्शाया है
द्वार भक्ति और ज्ञान कर्म का हमने खुल्ला पाया है ।

रविवार, 15 नवंबर 2009

सरल कुमार की सफल या असफल शादी : आप निर्णय ले



जिसका सबको यकीन था वो नही हो पाया , सरल कुमार को एक लड़की ने पसंद कर ही लिया ।
हम लोगो से ज्यादा सरल कुमार को हैरानी हो रही थी । आख़िर लंगूर के हाथ एक हूर जो लग गई थी । पर कुछ सालो बाद पता नही क्या हुआ , हमें तो बस इतना ही पता चला कि बस एक एक लेटर ने दोनों को जुदा कर दिया । आइये एक एक करके इन दोनों को पढ़ते हैं । पहला लेटर सरल कुमार की पत्नी ने लिखा था उसका मसाला ये हैं :-
......
प्रिय सरल ( Ex-पतिदेव ),
मैं आपको आखिरी पत्र लिख रही हूँ । मैंने तुम्हारे साथ सात साल तक बहुत निभाया पर दो हफ्तों से मेरी जिंदगी नरक हो गई थी , इसीलिए मैंने तुमसे अलग होने का फ़ैसला ले लिया हैं , कई वजहे हैं जैसे :::
पिछले हफ्ते तुम्हारे बॉस ने बताया कि तुम बिना वजह अपनी जॉब छोड़ रहे हो ,भला इस recession में पाँच हज़ार कि जॉब कौन छोड़ देता हैं , जबकि लोग बिना तनख्वाह के जॉब कर रहे हैं । तुमने मेरे नए हेयर स्टाइल को देखा ही नही और मेरी नई ड्रेस को देखकर तो ऐसे भाव तुमने चेहरे पर लाये जैसे इसके पैसे तुमने दिए हो । उस दिन मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे प्रिय खास राजमा चावल बनाये थे । बिना कुछ कहे तुम सोने चले गए ।
धन्यवाद
तुम्हारी
प्रिया ( और हाँ मुझे ढूँढने कि कोशिश मत करना , क्योंकि मैं और हमारा नौकर रामू एक नई
जिंदगी कि शुरुवात करने जा रहे हैं । रामू कह रहा हैं कि सारा इंतजाम वो पिछले हफ्ते ही
कर चुका हैं , इसीलिए पैसे कि कोई दिक्कत नही होगी ।)
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अब सरल कुमार जी का जवाब पढ़ा तो समझ में आया , मसाला ये हैं
प्रिय प्रिया ,
तुम नही जानती इस पत्र ने मुझे कितनी खुशी दी हैं ।असल में पिछले दो हफ्ते से मेरे साथ बहुत कुछ अजीब हो रहा था , दिमाग ही काम नही कर रहा था । रामू ने पिछले हफ्ते दो हज़ार रुपये उधार मांगे थे । तुम्हारे ड्रेस पर दो हज़ार का टैग देख कर मैं तो पागल हो गया था । तुम्हारा नया हयेर स्टाइल लड़को जैसा था ।
ऊपर से तुम भूल गई कि राजमा चावल मुझे नही हमारे नौकर रामू को पसंद था । बताओ, इस बात पर मैं चुपचाप सोने चला गया तो मैंने क्या गलती की ।
पिछले दो हफ्ते से मेरे तीनो क्रेडिट कार्ड नही मिल रहे थे । तुम्हारे पत्र के बाद मैंने बंद करवा दिए हैं। शायद रामू के पास अब बस पैसे नही होंगे । कोई बाद नही तुम दोनों पति पत्नी किसी भी घर में नौकर और बाई बनकर खूब ऐश कर सकते हो।
जहाँ तक मेरी जॉब की बात हैं , पाँच करोड़ कि लॉटरी लगने के बाद कौन बुद्धू पाँच हज़ार के लिए जॉब करेगा । खैर मैं तुम्हे खुश देखकर खुश हूँ .
तुम्हारा Ex-पति
सरल कुमार
( और हाँ इस रामू के बारे में तरह तरह की अफवाह हैं , सबसे पहली तो ये हैं कि ये पहले "रीमा "
थी )





एक कविता /कंपनी/ ऑफिस आदि कि टुच्ची राजनीति / सरल कुमार को गुस्सा क्यों आता है



सरल कुमार एक कम्पनी कर्मचारी भी है । कई कंपनियों के कर्मचारिओं के आपसी सबंधो से सबको परेशानी होती है । इसी माहौल को चरितार्थ करती है ये कविता । आशा है आपको पसंद आएगी

धन्यवाद भेज देना नही तो हो सकता है कि एक प्रतिभाहीन कवि समय से पहले निराश हो जाए । फ़िर आप क्यों जिम्मेदार रहे किसी को हतोत्साहित करने के लिए । ये काम तो सरल कुमार के लिए उसके हालत ही कर देंगे। तो कविता का झूठा आनंद उठाये और अपने कीमती समय को इस बोरिंग कविता से अर्थहीन बनायें , तो यहाँ से शुरू होती है कविता ----

उनकी उलझी गुत्थी को सुलझाने में हमारा माथा दुःख जाता है

सबके उल्टे कामो से हमारा कोमल दिल टूट जाता है

और फ़िर उनको लगता है कि मुझे गुस्सा बहुत आता है ..

उनकी टेढी चालों से बस उनका हित सध जाता है

उनके स्वार्थ में लिप्त हर काम प्रोफेशनल कहलाता है

कोई किसी का नही यहाँ पर बस पैसों का ही नाता है

गुस्सा ही दीखता उनको प्यार मेरा छुप जाता है

उनकी हर गलती पर मैं हैरान कभी नही होता हूँ

बस उनके बुरे वक्त के आ जाने से मैं डरता हूँ

जब हंस के हिस्से कि खुशी कौवा लूट ले जाता है

पता नही तब उनको लगता है कि मुझे गुस्सा बहुत आता है।

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दूसरी कविता है , हालाँकि ये थोडी inspired है ( चोरी कि हुई है जसपाल भट्टी जी के फ्लॉप शो से ,आख़िर सरल कुमार कोई अनु मलिक से कम थोड़े ही है inspiration लेने में ) अपनी नासमझी की वजह से शायद सरल कुमार उपहास का पात्र तो बन ही जाता है

ये ऑफिस है बेईमानो का हैवानो का , इस ऑफिस का यारों क्या कहना

घूमे निठ्ठले यहाँ सारे बारों में , खड़े सीधे बेचारे बेकारों में

क्रेडिट सारा झूठे ले जाते हैं , सच्चे तो काम कि कीमत भी नही पाते हैं

चमचों कि तरक्की मिनटों में , सीधो को पेनाल्टी सेकंडों में

यहाँ काम की कीमत जीरो है , यहाँ बॉस का चमचा हीरो है ,


वो नटखट विद्यार्थी जीवन और बहाने





1 जिस दिन काम न किया हो तो उस दिन का सॉलिड बहाना

सर कॉपी घर रह गई ,काम तो किया था

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२ जिस दिन छुट्टी कर लेते थे उससे अगले दिन का बहाना

सर बुखार था । ( आज तक ऐसा कोई thermometer नही बना जो आपका बीते

हुए कल का बुखार चेक कर सके।

इस बहाने पर अक्सर टीचर कुछ नही कहते थे पर कई कमीने फ़िर भी धुनाई कर ही देते थे.

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३ जब क्लास में किसी प्रश्न का उत्तर नही पता होता तो सिर्फ़ नही में सिर हिला देते थे

तो सर हमेशा कहते थे " दस किलो का सर हिला दिया , दस ग्राम की जीभ नही हिला सकता "

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४ पिटाई से बचने का रामबाण तरीका

सर इसको डॉक्टर ने पीटने से मन किया है । ये वाकई सबसे सॉलिड बहाना था।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

अच्छे लोग




अच्छे व्यक्ति ही धर्म को परिभाषित करते हैं । उन्हें बड़े बड़े कर्मकांड करके इश्वर को मनाने में दिलचस्पी नही है बल्कि अपने अपने आस पास के लोगो की सेवा करके भी धर्म को निभाना तो कोई उनसे सीखे।

"ऐसे लोगों की वजह से ही धर्म अभी जीवित है। "

एक कविता

सरल कुमार के हृदय से निकली ये आधी अधूरी कविता आपको ज्यादा पसंद नही आएगी ।
क्योंकि उसकी प्रतिभा पर आपसे ज्यादा उसे शक है । पर खाली पीली दिमाग का दही करने की बात ही और है
बधाई लिख कर न भेजे नही तो सरल कुमार समझ जाएगा की आप झूठ बोल रहे है




सरल कुमार - एक परिचय


मैंने एक पात्र चुना है जो बहुत धार्मिक है , शिक्षित है इंजिनियर और एम् बी ऐ दोनों है । उसे हर तरह की पूरी जानकारी है जैसे राजनीतिक , धार्मिक ,विज्ञान आदि । शायद कोई क्षेत्र उससे अछूता नही है । दूसरे को फायदा
पहुंचाने के लिए वो ख़ुद दुःख उठाने को तैयार है । इन सबके बाद भी वो ख़ुद को एक अति साधारण व्यक्ति महसूस करता है । वो एक हमारे जैसा कंपनी में काम करने वाला सामान्य सा व्यक्ति है । बहुत हद तक वो मेरे जैसा है ।
जैसे जैसे पोस्ट बढती जाएँगी वो हर माहौल को जियेगा चाहे वो सुख का हो दुःख का हो , व्यंग्य हो या सामाजिक अवहेलना हो आर्थिक तंगी या कोई भी आयाम । पारिवारिक पृष्ठभूमि में देखे तो उसे शहरी और गाँव दोनों तरह की
अच्छी जानकारी है
धन्यवाद्
वीरेन्द्र रावल

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...