मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मेरी तीसरी कविता ( मेरा प्यार रिश्तो का मोहताज़ नहीं )

ये इस कड़ी में मेरी तीसरी कविता हैं । लिख तो पहले ही ली थी । पर तनाव के कारण बहुत सारी दुखी चीज़े इसमें डाल दी थी । पर अब थोडा कम दुःख वाली बनायीं और जो बाते थोड़ी साझी समझ वाली थी वो इसमें डाल दी ।
इसके पहले और दुसरे भाग के लिंक ये हैं
पहला भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_9229.html
दूसरा भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

वैसे इस तीसरी कविता के भी दो भाग आपको लगेंगे क्योंकि थोडा सा थीम अलग लगेगा आपको शुरू कि चार पांच पंक्तियो का और आख़िरी की चार पांच पंक्तियो का . एक तरह से पहले भाग में हम दोनों की बातचीत ही विषय हैं और दुसरे में सिर्फ मेरा दर्द का भाव हैं जो अपने आप से कह रहा हूँ ।


क्या मैं कभी उसके ख्वाब सजा पाउँगा
छूकर उसके गालो को ये कह पाउँगा

आंधियो से जो उड़ जाता मैं वो तख्तो ताज नहीं
मेरा प्यार तुमसे कभी रिश्तो का मोहताज़ नहीं

तुम्हे मेरी ना आज जरुरत तो कल की तकदीर बन जाऊंगा
ना जरुरत तुम्हे आज पति की तो कल बेटा बनकर आऊंगा

कोई बात नहीं अगर इस जन्म में तेरा पति ना बन पाया
तू भी देख लेना अगर उस जन्म में तेरा बेटा ना बनकर आया

तब ये समय बताएगा की क्या ये पंचतत्वो की माया थी
या ईश्वर संकल्प में लिपटी वो मेरे इष्टदेव की छाया थी

पोंछ लेता था कभी सबके आंसू पर पर अब अपने रुक नहीं पाते हैं
मेरे सारे पिछले तर्क कहाँ मुझे अब तसल्ली दे पाते हैं

बीच भंवर में नाव हैं मेरी पर दिखता कोई किनारा नहीं
डूब रहा हूँ समन्दर में तिनके का भी सहारा नहीं

कहना चाहू उसको ,पर होठो को सी जाऊ
आंसू भी आँखों में आये चुपके से पी जाऊ

बस समझ गया कैसे वीरेन शायर हो जाता हैं
फंस के प्यार के धागों में कैसे कोई कायर बन जाता हैं

1 टिप्पणी:

kunwarji's ने कहा…

"तब ये समय बताएगा की क्या ये पंचतत्वो की माया थी
या ईश्वर संकल्प में लिपटी वो मेरे इष्टदेव की छाया थी"


कुछ भी तो कहते नहीं बन रहा है सर जी,
यहीं फर्क आता है मेरे जैसे की तुच्छ सोच में और एक उच्च सोच में!
एक दम से पूर्णविराम ही लगा दिया आपने तो!
कुंवर जी,

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...