http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html
अब चौथी कविता ये हैं
वो जताती थी मुझे जैसे वो मेरे लायक नहीं हो
वीरेन मेरी वो प्रेम कथा जिसके तुम नायक नहीं हो
पर मैं बस इतना ही कह सका
क्यों मैंने साधक होने का ढोंग रचाया
क्यों ज्ञानी होने का दम्भ सजाया
वो तो हरि जप से ही मुक्त हो गयी
और मेरी गति पापो से युक्त हो गयी

मेरा प्यार उसके लिए हमेशा सच्चा था
वासना के लिए तो मेरा मन अभी कच्चा था
अगर ये वासना की नदी होती तो बह गयी होती
नहीं तो वो मुझसे क्यों कह गयी होती
तुम्हारा प्यार यु तो बिलकुल सागर जैसा हैं
मिट जाती जहाँ नदिया वो संगम वैसा हैं
बातें हैं दिल में पर बोला ना जाये
आंसू हैं आँखों में पर रोया ना जाए
काश वो मेरी मौत से कुछ पल पहले आ जाये
गोद में सिर हो उसके और सांसे मर जाये
आँखों में देखू उसके आखिरी सपना
ख़त्म हुआ वीरेन सब अब और नहीं जगना
हर रात को अब ना तारे गिनूंगा
जी ही ना पाया तो अब मरूँगा ।
अभी थोड़ी और पंक्तिया हैं पर मूर्त रूप नहीं दिया । इसीलिए अभी तक के लिए इतना ही ।
4 टिप्पणियां:
bahut dard tha in panktiyon me kabhi kabhi prem ki parakashtha hi kavita ban jaati hai...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/
बहुत गहन भाव!!
सूरज को दर्पण दिखाऊं ऐसी
मेरी औकात नहीं,
घडी भर को नभ पे जो छा जाए बादल,
हो जाती रात नहीं,
सुख-दुख जो मिलते है
कैसे कहूं ये सब उस ही की सौगात नहीं,
निशा बीते और हो प्रभात नहीं,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
कुंवर जी,
thanks to all of you
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