ये कविता वैसे तो एक कृष्ण साधिका को समर्पित हैं पर बीच में मुझ बेवक़ूफ़ से एक प्रेमिका के भाव भी लिखे गए . सभी परम भक्त जन मेरी धृष्टता को क्षमा करे और इसे राधा जी द्वारा लिखी गयी कृष्ण को प्रेमपाती समझे या फिर एक सरल साधिका का अपने प्रेमास्पद को अपनी व्यथा कहना . मार्गदर्शन दे
तू गया हैं भूल कि तुने ही ये दिल चुराया हैं
भगवान प्रार्थनाओ से मिला तू मेरा हमसाया हैं
मन समय के इस दौर में शांत और बिलकुल मौन हैं
तू बता तेरा अलावा मेरे आंसू पीने वाला कौन हैं
हालातो को समझने का कुछ मुझे भी समय दे
मै परेशान हू बहुत अपनी बाहों में बस आश्रय दे
आत्मा तुझमे मिल चुकी बस शरीर लगता बोझ हैं
ना इलाज दुनिया में नस नस में चुभता ये रोग हैं
मै तेरी अब सदा के लिए फिर क्यों मुझे विरह से मार देता हैं
जब तुझसे सुकून माँगा अनोखी बातो से बांध देता हैं
अगर तू ही नहीं समझेगा तो फिर तो कुछ आशा नहीं
तू ना सहारा देगा फिर क्या बचा दूसरा भगवान कही
मेरी बातो का भी क्या बुरा मानना सब तेरा ही तो दिया हुआ हैं
जिम्मेदारियो में मर गया तन मेरा सिर्फ तेरी आस से जिया हुआ हैं
क्या मेरे हालात तुझे साफ़ साफ नहीं दिखाई देते
किस्मत के चुभे ये नश्तर क्या मदद की दुहाई नहीं देते
तुम कहाँ मै कहाँ बस मै तो वैसे ही मरी हुई हैं
तुम्हारा दुःख कैसे दूर करू जब अपनों में ही घिरी हुई हू
आँखे भी मुझसे कहती हैं पहचान लिया ना तुने अपना
तेरी दुआओ से देख सच हो गया "वीरेन " जैसा भी सपना
तुम क्यों नहीं कर देते ये प्यार का मौसम सुहाना
समां लो अपने आप में मुझे चाहे रूठ जाये जमाना
अपनी आत्मा से कोई भला नाराज़ होता हैं
तुम्हे परेशान करने की सोचना भी भगवान से धोखा हैं
मै ही तेरी राधे प्रिया फिर भी क्यों मुझे तंग करता हैं
मेरे आंसू पोंछ दे क्यों मुझे अलग समझता हैं
मै बहुत मजबूर हू कभी तो समझा करो
बस तुझसे ही आशा हैं इतना तो साथ दिया करो
मुझे मौका मिलेगा तो मै अपनी साँस साँस तुझे दे दूंगी
तेरे सारे दुखो को अपने दिल में लेकर सच में जान दे दूंगी
बस सिर्फ इस अंतिम दौर में मुझे तुम्हारी जरुरत हैं
कृष्ण तुम मेरी आत्मा हो भविष्य की भी ये एक हकीकत हैं
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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1 टिप्पणी:
कृष्ण प्रेम को समर्पित बहुत ही सुन्दर भाव्।
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