अभी प्यार की कविताओ की कड़ी में ये आज पंद्रहवी कविता हैं । आशा हैं आपको पसंद आएगी । इसमें थोडा ईश्वर से शिकायत भरी बाते हैं , जो शायद वो सहन कर ले । भाव में तारतम्यता के लिए चौदहवी कविता का लिंक देने की जरुरत नहीं क्योंकि वो exact पहली पोस्ट में हैं ,आप सीधे ब्लॉग से पढ़ ले , भूमिका भी ।
जीव बनकर तेरे हर कहर मैं सहता गया
और कृष्ण तू रस बनकर बस औरो के लिए बहता गया
क्या करू जब एक बुरी लड़की भा जाये
मेरे मिटने का भाव उसके लिए आ जाये
जिंदगी उस कदम पर जाकर बेमानी हो गयी थी
उसकी ख़ुशी के लिए अपनी भक्ति खो गयी थी
चरित्रहीन तुने ही बनाया कृष्ण मुझमे कहाँ ताकत थी
समाज के पुराने रिवाजो की खिलाफ मेरी बगावत थी
मेरा दोष तो बताओ प्रभु जो खुद का सजा दे सकू
डूबी हो मल्लाह से कश्ती तो क्यों ना खुद मैं खे सकू
इसके उसके इलज़ाम कब तक लिए मैं फिरूँ
सांस पूरे हो चुकी जिंदगी में किसलिए प्राण भरूँ
ना हरि ना ब्रह्म ना ग्रंथो का ही सहारा मिला
जाऊ कहाँ भवसागर पार जब ना किनारा मिला
भक्ति हो या प्रेम हो या पर ज्ञान की कोई मांग नहीं
नशा बस एक सच्चे समर्पण का झूठा मेरा स्वांग नहीं
झूठे सारे लोगो को वफ़ा का रास्ता मिला
सच्चो को तो भावो ने दिया जड़ से हिला
कभी तो दो पल हमारे जीवन में सुकून के आ जाते
अच्छे पल ना मिले , बुरे लोगो में हम समा जाते
कभी कभी तो वो धुंधले राज ईश्वर की दया से चमक जाते
दुआ उसकी होती "वीरेन" के चिराग जिसकी झोली में दमक जाते
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1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर भाव |बधाई
आशा
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