शनिवार, 6 मार्च 2010

इश्वर को कैसे समझे और कैसे ना समझे

मेरे कई दोस्त (अब ओन लाइन दोस्त भी )कई सालों से मुझसे इश्वर के सम्बन्ध में धार्मिक और उलटे सीधे प्रश्न पूछते रहते हैं .जैसे राम जी ने वो गलत क्यों किया कृष्ण जी को क्या वैसे करना चाहिए था , मेरे सदगुरू बापूजी को लेकर भी सवाल या ग़लतफ़हमी सुनने को मिल जाती हैं . हालाँकि मैंने कभी किसी को निराश भी नही किया . असल में मेरी धार्मिक प्रकृति के कारन ही वे बार बार अनूठे अनूठे प्रश्न पूछते हैं . सबसे ज्यादा ख़ुशी मुझे नए साधको के जवाब देने में होती हैं . फिर सोचा कि एक ब्लॉग पोस्ट लिख दू ,lमैं इसी से प्रेरित होकर ये पोस्ट लिखने को मजबूर हुआ हूँ जो समाधान या राय मैं नीचे दे रहा हूँ ये मेरे अपने व्यक्तिगत अनुभव के हैं कुछ भी इसमें झूठ नहीं हैं और अगर कोई मुझसे सहमत ना हो तो मुझे थोडा कम जानकार समझकर प्रेम से मेरा मार्गदर्शन करे मैं बिलकुल आपके सच्चे पथ को स्वीकार करूँगा


मुद्दा कोई भी हो हमारे कुछ दोस्त इस तरह के धरम के बारे में विचार लाकर बस डेढ़ दो घंटे पास कर लेते हैं . ना कोई उन्हें मतलब होता हैं , हरदीप ही नहीं कोई भी बंदा उनके सवालो से थोडा असमंजस में पढ़ ही जाता हैं कि भाई अब इसका जवाब क्या दूँ . ऐसे दोस्तों के खाली दिमाग में बस बहस करने कि आदत ज्यादा होती हैं जो बस एक दो कप चाय मिलने से हुई उर्जा प्राप्त करने के बाद ज्यादा दिखाई देती हैं ऐसी बहस और विषय हमेशा नए धार्मिक साधक की श्रधा की खासी खिंचाई होती हैं क्योंकि बेचारे के पास कमजोर नीव होती हैं बस एक " इश्वर की मर्ज़ी " जैसा तर्क लेकर घंटों लड़ता रहता हैं

दोस्तों ने टाइम पास करना होता हैं पर इसकी पूजा और आत्मसम्मान पर प्रासंगिक होने का खतरा बढ़ता जाता हैं दोस्तों में ना गहरे नास्तिक होते हैं ना गहरे आस्तिक सब थोड़े अनुकूलता के हिसाब से ढलने वाले होते हैं

बस शुरुवात इस बात से करें कि इश्वर कोई तर्कों का विषय नहीं हैं , ये तो बस अब संतो ने ही इश्वर के संकल्प से हम जैसे कलयुगी और उलटी मति के लोगो को समझाने के लिए कुछ रहस्यों को तर्कों से समझाने की कोशिश हैं . आप याद करिए राम जी को पिता के वनवास आदेश को एक सेकंड में स्वीकार किया . क्या कोई तर्क माँगा पिता से . सिर्फ संत ही सही समय के हिसाब से राय दे सकते हैं. कई ग्रंथो की प्रमाणिकता और प्रासंगिकता इनमे समाये रहस्यों से कभी कभी संदेहास्पद हो जाती हैं . इश्वर आज्ञा से सिर्फ संत ही एकमात्र अधिकारी हैं जो सपष्टीकरण दे सकते हैं ये कभी भारत पाकिस्तान या अमेरिका ईराक का मुद्दा नहीं हैं कि आप NDTV पर बहस करके टी आर पी बटोरे और कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद कोई आउट पुट नहीं दस साल से तो पचासों चैनेल बस ऐसे ही टाइम मिसयूज़ कर रहे हैं .

सबसे पहले तो हम यह सोचे कि इश्वर वास्तव में हैं क्या मतलब वो मन बुद्धि वाला एक इंसान टाइप का हैं या नियमो से बंधी कोई साकार या निराकार चेतना या ऐसा कोई निकृष्ट जीव जो दुनिया बनाकर भाग गया हैं और हमें अकेला दुखो के बीच छोड़कर छुट्टी मना रहा हैं मेरे विचार में अगर सिर्फ हम इश्वर को अगर समझने की कोशिश करें तो शायद जो पूरी जिंदगी में उस पर थोपी गयी करोड़ों लानते , कमिओं को लेकर झगड़ते ना रहे आप सोचिये रावन, शिशुपाल जैसे दुष्टों को उसने जीते जी सारी सुविधाएँ दी और मरते वक्त मोक्ष भी दे दिया और एक हम हैं कि इतने पापी भी नहीं लगते फिर भी जीते जी मरे जा रहे हैं और मरने के बाद यमदूतो से हमारी कुटाई भी निश्चित हैं

हम लगभग छः फुट की ऊँचाई वाले लोग निर्णय करते हैं अपने उस दिमाग से जो लगभग एक किलोग्राम का हैं और अब इश्वर का परिमाप जानने की कोशिश करते हैं जो हमारे जैसे छः अरब लोगो को एक साथ जी रहा हैं खरबों और धरती जीवो का पालन कर रहा हैं भूमि का सिर्फ उनतीस प्रतिशत भाग हटाने के बाद इसका लगभग
तिगुना जल का भाग और उसमे रहने वाले बड़े बड़े समुद्री जीव जो हाथी जैसे बड़े जीव को कब निगल जाए कुछ पता नहीं अब पृथ्वी और फिर नौ गृह जिनमे कुछ गृह ऐसे जो हमारी धरती को समां ले तो उनके आकार में ज्यादा फर्क ना आये इन सबके बाप सूर्यदेव उनके आकार की बात ना करे बस ऐसे सोचे की अगर वो एक बस एक किलोमीटर और हमारे पास जाये तो हम चतुर लोग बस एक पल में स्वाहा

ज्यादा बात को नहीं बढाता, एक ब्रहमांड के सौर मंडल और मन्दाकिनी में कुल मिलाकर 10 के बाद बाईस जीरो लगा ले तो सूर्यों की संख्या उतनी हैं हमारे पास जो सबसे नजदीक सूर्य हैं वो लगभग सवा चार प्रकाश वर्ष दूर हैं मतलब अगर हम तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड से गति करें तो वहा सवा चार साल में पहुंचेंगे
अब ये तो वो हैं जो अपनी आखो से हम देख सकते हैं सूर्य से ही हमें करोडो तरंग्धैर्य मिलती हैं पर हम सिर्फ सात रंग और काला, सफ़ेद मिलाकर सिर्फ नौ तरंग धैर्य में सारी जिंदगी गुजारते हैं तो इन सबको जो सिर्फ संकल्प मात्र से जो धारण करती हैं वो माया हैं इश्वर सिर्फ संकल्प से माया बनाते हैं ये तो था उनके लिए जो थोडा वैज्ञानिक जवाब चाहते हैं अब बात आती हैं नए नए साधको की श्रधा टिकाने की

सोचिये सोलह साल पढाई करने के बाद ,जिसमे इंजीनियरिंग & MBA करने के बाद भी हम सोचते हैं की ज्ञान की कोई थाह नहीं पर इश्वर जो सब कुछ हैं उसे क्यों बस एक चाय के कप को पीने में लगने वाले समय में समझ लेने की कोशिश करते हैं पति पत्नी सारी जिंदगी साथ रहते हैं और बुढापे में कहते हैं कि मैं इसको आज तक नहीं समझ पाया /पाई

इश्वर को तो ब्रह्मा जी, माता पार्वती , गरूडजी , इंद्र आदि देव भी नहीं समझ पाए वो तो उनके तर्क में भी नहीं समाया फिर मेरे या आपके समझ में ना आये तो क्या बड़ी बात हैं हमने उसके एक नाम को पुकारा हो वो तो तब भी समझाने को तैयार हैं अरे सामान्य नास्तिक की बात तो छोडो जो स्वयं कि बुआ का बेटा शिशुपाल गाली देते देते मर गया उसे भी अपने में समां लिया फिर क्यों खामख्वाह तर्क ढूंढ ढूंढ कर रूखा ज्ञान बटोरना वो तो बच्चो जैसा मासूम हैं फूलो जितना कोमल हैं उससे शक्तिशाली कोई नहीं समय आने पर वो खुद कह देगा कि वो हिन्दुओ का हैं या मुसलमानों का या इसाईओं का क्यों हम उलझे रहे जैसे बच्चा माँ की गोद में सुरक्षित रहता हैं वैसे क्यों ना सब इसी पर छोड़ दे सिर्फ साठ सत्तर साल के जीवन में थोड़े तर्क सीख लिए और बन्दों को चुप करा दिया तो क्यां अनगिनत काल से चले रहे इश्वर का क्या बिगाड़ा।

उससे चालाकी मत करो वो हमसे अधिक चालाक हैं और चोबीस घंटे गाल में हाथ टिकाये हमारे पास बैठा हैं , बिल्कुल झाँक रहा हैं आँखों में ये रहस्य मेरे एक इश्वर प्राप्त मित्र ने मुझे बताया था क्यों चतुर बन रहे हो सोचो ज़रा अपनी मृत्यु के वक्त कौन सा वकील और मण्डली बहस में मदद करेगी इश्वर से वो तो हमें तब भी प्यार ही करेगा , जलील तो वो कर ही नहीं सकता वो सिर्फ दिल देखता हैं तर्क वाले के साथ तर्क करता हैं , प्यार वाले के साथ प्यार , खतरनाक के साथ खतरनाक

अब हरदीप वाली पोस्ट को लेते हैं . दुर्योधन शायद एक सों बीस साल तक जीया होगा पर लगभग नो लाख और उससे भी पहले के ग्रंथो में जो साक्ष्य आया हैं उसमे अगले एक हज़ार चतुर्युगो तक कि भविष्यवाणी हैं। मुनि वाशिष्ठ जी रामजी को भविष्य में होने वाले महाभारत के युद्ध से पहले के बारे में बताते हैं कि ऐसे ऐसे एक युद्ध होगा और एक दुर्योधन होगा जो आपके कृष्णावतार कि बात नहीं मांगेगा तब आप पांड्वो को संकल्प करके उसका नाश कर दोगे जब देवता इश्वर से जन्म लेने कि प्रार्थना करते हैं तो इश्वर कहते हैं कि मैं एक दुर्योधन जैसा कलयुगी जीव बनाऊंगा और उसके निमित सबका नाश करूँगा

माता पार्वती को भी एक बार भगवान् शिव ने समझाया था कि हरि कि इच्छा से ही सब होता हैं :-
बोले बिहसी महेश तब ज्ञानी मूढ़ ना कोई
जेहि जस रघुपति करई , सोयी तेहि क्षण होई

मेरे भाई बहन , मेरे कहने का मतलब हैं कि कुछ समय महीने साल जो भी जितना भी समय और भक्ति की विधा आपको सही लगता हैं सत्संग, कथा , कीर्तन , जप , ध्यान , ज्ञान या कोई भी गुरु द्वारा बताया रास्ता , उस पर थोडा जाये फिर कोई बात बन सकती हैं

नहीं तो ये पोस्ट मैंने लिख दी और आपने पढ़ ली बस हो गया थोडा टाइम पास बस इन्टरनेट पर कुछ चुटकुले पढ़ लो फिर वापिस अपनी दुनियादारी में लौट जाओ क्योंकि एक दिन में बिना इश्वर या गुरुकृपा के कोई चमत्कार नहीं होगा और जो आपके मन में आएगा वो आप करेंगे इश्वर के आनंद में कोई कमी नहीं पर आपका कुछ बचेगा नहीं सदा श्रधा बनाये रखने के लिए सदा इश्वर के बारे में सोचना और उसके प्यार संतो के संपर्क में रहने से सही राय का पता चल सकता हैं जिन्हें पूरा ज्ञान नहीं हैं वो राम जी के बारे में कृष्ण जी के बारे में या संतो या साधको के बारे में ना कहने जैसा कहेंगे , ना करने जैसा करेंगे पर आधार यही हैं भलाई करने वाले कभी बुरे से पराजित नहीं होते ये थोडा समय के साथ धैर्य रखने से समझ में जाता हैं कि सब कुछ इश्वर हैं सबमे इश्वर हैं सब कुछ इश्वर का हैंजो जैसा समझता हैं वैसा मन बुद्धि के हिसाब से मान लेता हैं

!! श्री हरि: !!
!! बापूजी क़ी कृपा आप पर सदा बनी रहे !!

गुरुवार, 4 मार्च 2010

जाकी रही भावना जैसी - रामचरित मानस लंका काण्ड ( दोहा १४ के प्रसंग में )

पिछली पोस्ट में मैंने आपको रामचरित मानस के गूढ़ रहस्यों की प्रासंगिकता को लेकर एक वाकये का जिक्र किया थाअब ऐसा ही एक वाकया हैं जब भगवान् श्री रामचंद्र जी ने समुन्द्र लांघ लिया तो सारी सेना के साथ रामजी लेटे हुए थेलेटे लेटे उन्हें चाँद दिखाई दियातो उन्होंने सभी से कहा कि अपनी अपनी बुद्धि के हिसाब से बताओ कि चाँद में काला दाग क्या हैं , अब इस झांकी में लक्ष्मण जी नहीं हैं और जाम्बवंत जी भी नहीं हैंहालाँकि रामचरित मानस में किसी का नाम नहीं दिया गया हैं , ये तो मैंने पूज्य संत श्री मोरारी बापूजी के श्री मुख से सुना था , वही मानस का अर्थ आपके श्री हृदयों में रख रहा हूँमानस में सिर्फ ये जिक्र हैं कि क्या कहा गयामैं भाग्यशाली रहा कि इस कथा के इस भाग के सरलार्थ को तुलसीदास जी के प्रेरणा से मोरारी बापूजी से सुन पाया

खैर ज्यादा भावुक ना होते हुए आगे बढ़ता हूँलक्ष्मण जी ने तो उस चाँद या चन्द्र को देखा ही नहीं और सोचा कि जब मेरे सामने रामचंद्र हैं तो फिर मैं क्यों कही और देखूंअब जाम्बवंत जी इसीलिए नहीं हैं क्योंकि यहाँ जवाब वही देगा जो सिर्फ बुद्धिमान के साथ साथ हृदय से भी जवाब दे सकेजाम्बवंत जी परम विद्वान हैं
अब शुरू होती हैं मन की भावना की बातइसका अभिप्राय यही हैं कि आप से कोई कुछ भी पूछे आप हमेशा वही जवाब देंगे जो मनोदशा आपके व्यक्तित्व की हैंदेखिये एक चाँद हैं और सभी सभी बिलकुल अलग अलग राय दे रहे हैं
पहली पंक्ति में सुग्रीव जवाब देते हैं
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई ससि महू प्रगट भूमि कै झाई

सुग्रीव ने जवाब दिया कि पहले चाँद पृथ्वी का भाग था पर ये जब अलग हुआ तो जिस जगह से दोनों अलग हुए थे वहां से अब ये काला दाग बन गया हैं , ऐसा जवाब इसीलिए दिया क्योंकि सुग्रीव जी हमेशा यही सोचते रहते हैं की ये मेरा राज्य था तब बाली ले गया था अब ये राज्य मुझे मिल गया हैंअब कही अंगद इसे छीन ना ले

विभीषण जी ने कहा
मारेउ रहू ससि कह कोई उर में परि स्यामता सोई
विभीषण जी ने कहा कि चाँद और राहू दोनों भाई हैंचाँद तो अच्छा हैं पर राहू ने एक बार चाँद को लात मारी थो और ग्रहण के दिन ये चाँद को ग्रसता रहता हैंइसीलिए चाँद पर काले निशाँ पड़ गए हैंअसल में वो रावन का भाई होने से परेशान हैं उसे ध्यान आता हैं कि कैसे भरी सभा में रावन ने उसे लात मारी थी और अब भी कुछ ना कुछ करके परेशान करता रहता हैं

अब अंगद जी जवाब देते हैं ,
कोऊ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा
सर भाग ससि कर हरि लीन्हा

कि जब परमात्मा ने कामदेव कि पत्नी रति का मुख बनाया तो अत्यधिक चमक के स्वामी चंद्रमा का कुछ हिस्सा रति को दे दियाअब अंगद युवा हैं इसीलिए सौंदर्य प्रधान जवाब देते हैं

अब हनुमान जी जवाब देते हैं पर राम जी कहते हैं कि नहीं आपका जवाब अंतिम होगा , क्योंकि आप परम ज्ञानी हैं और दिल में सिर्फ भक्ति हैं इसीलिए जो आप कहेंगे वो एक पूर्ण पुरुष का जवाब होगा , पहले मुझे कहने दो

प्रभु कह गरल बंधू ससि कर , अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा
बिष संजुत कर निकर पसारी जारत बिरहवंत नर नारी
रामजी कहते हैं कि चंद्रमा और विष दोनों भाई हैंचंद्रमा ने अपने प्रिय भाई को दिल में स्थान दे रखा हैंचंद्रमा अपने भाई से विरह में व्याकुल रहता हैं और चांदनी में विष से व्याप्त किरणे फेंकता रहता हैं जिससे पति पत्नी भी वियोग की आग में जलते रहते हैंअब रामजी को अपना प्रिय भाई भरत याद रहा हैं और साथ में माता सीता भीइसीलिए वो ऐसा कह रहे हैं

अब हनुमान जी का जवाब सुनिए ,
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास
तव मूर्ति विधु उर बसती सोई स्यामता अकास
हे प्रभु सुनिए , ये चंद्रमा आपका प्रिय भक्त हैंअब आपकी मूरत उसके दिल में बसती हैं , अब आप तो सांवले हैं इसीलिए चाँद में काला दाग हैं
बस इसी के साथ भगवान् हँसते हुए इस झांकी को यही समाप्त कर देते हैं

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सती मोह संवाद ( संत तुलसी दास जी के रामचरित मानस से )

तुलसी दास जी क़ी रामचरित मानस की एक एक चौपाई बहुत अर्थपूर्ण होती हैं । जब मैं छोटा था तो सोचता था कि ये सब बस भगवान् राम की जीवनी को कविता का रूप दिया गया हैं । परन्तु संतो के श्री मुख से जब कथा के रहस्य को सुनना शुरू किया तो पता चला कि सभी ऊंची स्थिति के संत जैसे तुलसीदास , सूरदास या बाल्मीकि जी सारी लीलाओं को प्रत्यक्ष ध्यान रूप में देखकर लिखा करते थे . वे कभी भी कोरी गप्प या मनमाना साहित्य नहीं लिखते थे । जो होता था वही इष्टदेव की सत्प्रेरणा से उसे वे लिपिबद्ध करते थे ।

ऐसा ही संवाद माता पार्वती के पिछले जन्म सती से संबध हैं । जब मैं इन चौपाई को पढता तो लगता था की बिलकुल सामान्य हैं पर जब पूज्य संत श्री मोरारी बापूजी ने इनका अर्थ बताया तो तुलसीदास जी लिए अगाध श्रीध उत्पान हुई । पंक्तिया नीचे दी हुई हैं । ये बालकाण्ड भाग के शुरू का संवाद हैं ।


एक बार त्रेता युग माहि शम्भू गए कुम्भज ऋषि पाहि
संग सती जग जगनी भवानी पूजेही ऋषि अखिलेश्वर जानी
रामकथा मुनि बर्ज बखानी सुनी महेश परम सुखु मानी
ऋषि पूछी हरिभगति सुहाई कही शम्भू अधिकारी पाहि
कहत सुनत रघुपति गुण गाथा कछु दिन तह रहे गिरिनाथा
मुनि सन विदा मांगी त्रिपुरारी चलेऊ भवन संग दच्छकुमारी


इसकी पहली पक्ति में भगवान् शिव राम कथा सुनने के लिए ऋषि कुम्भज यानि अगस्त्य के पास आते हैं । अब दूसरी पंक्ति में भगवान् शिव को अखिलेश्वर माना गया और माता पार्वती को जग जननी । ऋषि अगस्त्य दोनों का पूजन करते हैं ।
अब तीसरी पंक्ति देखे , रामकथा को सुनकर महेश ने परम सुख माना मतलब माता पार्वती को श्रोता वर्ग से निकाल दिया । अब तुलसी दास जी ने ऐसा क्यों किया । असल में माता जी के मन में ऋषि अगस्त्य की रामकथा के लिए कोई आदर नहीं था । वो मन में सोच रही थी की भगवन शिव ने जिद की तो मुझे आना पड़ा पर ये तो अभी से हमें प्रणाम कर रहा हैं । तो उन्हें कथा को और कथाकार को विशेष आदर नहीं दिया जो बाद में उन्ही के स्वयं के पतन का कारन बना और शिव जो उनका त्याग करना पड़ा ।

खैर अब जो आगे की भी दो पंक्तिओं की सारी चर्चा सिर्फ शिवजी और ऋषि के बीच की हैं, क्योंकि माता का ध्यान कथा में था ही नहीं । और छठी पंक्ति में तुलसीदास जी बोलते हैं की दोनों जब वापिस कैलाश जाते हैं तो माता पार्वती हमें जाते हुए सिर्फ माता सती एक चतुर पिता दक्ष की पुत्री ही दिखाई देती हैं अर्थात एक माप तौल करने पिता की चतुर पुत्री , जबकि जब वो कथा सुनने आई थी तो उन्हें कितना मान देकर जग जननी भवानी कहा था ।


इसी समय के त्रेता युग में भगवान् राम ने जन्म लिया था । अब माता सीता को रावण हरण कर के ले गया था ।अब क्योंकि भगवान् शिव राम कथा को सुन कर आये थे तो पूरे भक्ति भाव से प्रणाम करने लगे । पर माता ने तो कथा को ज्यादा आदर नहीं दिया था । इसीलिए भगवान् की परीक्षा ही लेने के लिए सीता जी का रूप धर लिया ।बाद की घटनाये तो आपको पता ही होंगी कि कैसे शिव जी ने माता सती को त्यागने का मन बना लिया , फिर इश्वर के बनाये संयोग से दक्ष ने यज्ञ किया और माता सती का शरीर अग्नि में समर्पित हुआ और अगले जन्म में हिमालय पुत्री के रूप में माता पार्वती बनकर आई ।


हमें तो बस यही सीख मिलती हैं कि हमें हमेशा ऋषि और उनके वचनों को श्रेष्ठ ही मानना चाहिए । कभी भी अपनी बुद्धि से उन्हें आंकना नहीं चाहिए । जब माता सती जैसो से भी गलती हो सकती हैं तो हम क्यों बेमतलब अपने तर्कों को सही सोचे । और सदा हमें शास्त्रों को प्रामाणिक मानना चाहिए और अगर दिक्कत हो तो फिर संतो से ही सलाह लेनी चाहिए ।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

आवारा राही गुमशुदा - फिल्म दासविदानिया

फिल्म : दासविदानिया (2008 )
गायक - सोनू निगम , नायक -विनय पाठक


आवारा राही गुमशुदा, बनके क्यूँ घूमें लापता
मुस्कुरा मेरे दिल, ले जिंदगी का मजा

धरती ये गोल गोल क्यूँ है जी
दुनिया में टालम टोल क्यूँ हैं जी
चमचमा खिलखिला जगमगा गम भुला
सीख ले खुश रहने की अदा
आवारा राही गुमशुदा, बनके क्यूँ घूमें लापता


कदमो को जमीन पे टिकाता चल
जीवन तो धोखा है तू खाता चल
क्या भला, क्या बुरा, क्या खोटा, क्या खरा
इन सब में अटकेगा तो जी नहीं पायेगा
आवारा राही गुमशुदा, बनके क्यूँ घूमें लापता
मुस्कुरा मेरे दिल, ले जिंदगी का मजा
आवारा राही गुमशुदा, बनके क्यूँ घूमें लापता

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

आदमी जो कहता हूँ ( फिल्म मजबूर )

किशोर कुमार की आवाज़ में गाया और अमिताभ बच्चन पर फिल्माया ये गीत थोडा यथार्थ सा लगता है ।
फिल्म थी मजबूर और इसके गीतकार है जावेद अख्तर .

कभी सोचता हूँ के मैं कुछ कहूँ
कभी सोचता हूँ के मैं चुप रहूँ

आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है,
ज़िन्दगी भर वो सदायें पीछा करती हैं

आदमी जो देता है, आदमी जो लेता है
ज़िन्दगी भर वो दुआयें पीछा करती हैं

कोई भी हो, हर ख्वाब, तो सच्चा नहीं होता, बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता

कभी दामन छुड़ाना हो तो मुश्किल हो
प्यार के रिश्ते टूटे तो, प्यार के रस्ते छूटे तो
रास्ते में फिर वफायें पीछा करती हैं
आदमी जो कहता है,..................

कभी कभी मन धूप के कारण तरसता है
कभी कभी फिर झूम के सावन बरसता है
पलक झपके यहाँ मौसम बदल जाए
प्यास कभी मिटती नहीं, इक बूँद भी मिलती नहीं
और कभी रिमझिम घटायें पीछा करती हैं
आदमी जो कहता है, ........................

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...