पिछली पोस्ट में मैंने आपको रामचरित मानस के गूढ़ रहस्यों की प्रासंगिकता को लेकर एक वाकये का जिक्र किया था । अब ऐसा ही एक वाकया हैं जब भगवान् श्री रामचंद्र जी ने समुन्द्र लांघ लिया तो सारी सेना के साथ रामजी लेटे हुए थे । लेटे लेटे उन्हें चाँद दिखाई दिया । तो उन्होंने सभी से कहा कि अपनी अपनी बुद्धि के हिसाब से बताओ कि चाँद में काला दाग क्या हैं , अब इस झांकी में लक्ष्मण जी नहीं हैं और जाम्बवंत जी भी नहीं हैं । हालाँकि रामचरित मानस में किसी का नाम नहीं दिया गया हैं , ये तो मैंने पूज्य संत श्री मोरारी बापूजी के श्री मुख से सुना था , वही मानस का अर्थ आपके श्री हृदयों में रख रहा हूँ । मानस में सिर्फ ये जिक्र हैं कि क्या कहा गया । मैं भाग्यशाली रहा कि इस कथा के इस भाग के सरलार्थ को तुलसीदास जी के प्रेरणा से मोरारी बापूजी से सुन पाया ।
खैर ज्यादा भावुक ना होते हुए आगे बढ़ता हूँ । लक्ष्मण जी ने तो उस चाँद या चन्द्र को देखा ही नहीं और सोचा कि जब मेरे सामने रामचंद्र हैं तो फिर मैं क्यों कही और देखूं । अब जाम्बवंत जी इसीलिए नहीं हैं क्योंकि यहाँ जवाब वही देगा जो सिर्फ बुद्धिमान के साथ साथ हृदय से भी जवाब दे सके । जाम्बवंत जी परम विद्वान हैं ।
अब शुरू होती हैं मन की भावना की बात । इसका अभिप्राय यही हैं कि आप से कोई कुछ भी पूछे आप हमेशा वही जवाब देंगे जो मनोदशा आपके व्यक्तित्व की हैं । देखिये एक चाँद हैं और सभी सभी बिलकुल अलग अलग राय दे रहे हैं ।
पहली पंक्ति में सुग्रीव जवाब देते हैं
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई ससि महू प्रगट भूमि कै झाई ।
सुग्रीव ने जवाब दिया कि पहले चाँद पृथ्वी का भाग था पर ये जब अलग हुआ तो जिस जगह से दोनों अलग हुए थे वहां से अब ये काला दाग बन गया हैं , ऐसा जवाब इसीलिए दिया क्योंकि सुग्रीव जी हमेशा यही सोचते रहते हैं की ये मेरा राज्य था तब बाली ले गया था अब ये राज्य मुझे मिल गया हैं । अब कही अंगद इसे छीन ना ले ।
विभीषण जी ने कहा
मारेउ रहू ससि कह कोई उर में परि स्यामता सोई ।
विभीषण जी ने कहा कि चाँद और राहू दोनों भाई हैं । चाँद तो अच्छा हैं पर राहू ने एक बार चाँद को लात मारी थो और ग्रहण के दिन ये चाँद को ग्रसता रहता हैं । इसीलिए चाँद पर काले निशाँ पड़ गए हैं । असल में वो रावन का भाई होने से परेशान हैं उसे ध्यान आता हैं कि कैसे भरी सभा में रावन ने उसे लात मारी थी और अब भी कुछ ना कुछ करके परेशान करता रहता हैं ।
अब अंगद जी जवाब देते हैं ,
कोऊ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा
सर भाग ससि कर हरि लीन्हा
कि जब परमात्मा ने कामदेव कि पत्नी रति का मुख बनाया तो अत्यधिक चमक के स्वामी चंद्रमा का कुछ हिस्सा रति को दे दिया । अब अंगद युवा हैं इसीलिए सौंदर्य प्रधान जवाब देते हैं ।
अब हनुमान जी जवाब देते हैं पर राम जी कहते हैं कि नहीं आपका जवाब अंतिम होगा , क्योंकि आप परम ज्ञानी हैं और दिल में सिर्फ भक्ति हैं इसीलिए जो आप कहेंगे वो एक पूर्ण पुरुष का जवाब होगा , पहले मुझे कहने दो ।
प्रभु कह गरल बंधू ससि कर , अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा
बिष संजुत कर निकर पसारी जारत बिरहवंत नर नारी
रामजी कहते हैं कि चंद्रमा और विष दोनों भाई हैं । चंद्रमा ने अपने प्रिय भाई को दिल में स्थान दे रखा हैं । चंद्रमा अपने भाई से विरह में व्याकुल रहता हैं और चांदनी में विष से व्याप्त किरणे फेंकता रहता हैं जिससे पति पत्नी भी वियोग की आग में जलते रहते हैं । अब रामजी को अपना प्रिय भाई भरत याद आ रहा हैं और साथ में माता सीता भी । इसीलिए वो ऐसा कह रहे हैं ।
अब हनुमान जी का जवाब सुनिए ,
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास
तव मूर्ति विधु उर बसती सोई स्यामता अकास
हे प्रभु सुनिए , ये चंद्रमा आपका प्रिय भक्त हैं । अब आपकी मूरत उसके दिल में बसती हैं , अब आप तो सांवले हैं इसीलिए चाँद में काला दाग हैं ।
बस इसी के साथ भगवान् हँसते हुए इस झांकी को यही समाप्त कर देते हैं
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