बुधवार, 9 जून 2010

ब्लॉग को लोकप्रिय बनाने की महत्वाकांक्षा ( व्यंग्य )

सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक्षा के शिकार हो गए की उनका ब्लॉग भी पोपुलर हो जाये तो सबसे पहले नैतिकता को टाटा कर दिया गया क्योंकि प्रतिभा उसमे थी नहीं और उसका सरल मन सोचता था की वो राष्ट्रपति भवन में रहती हैं खैर
तो सरल कुमार ने सोचा की उसकी ब्लोगिंग जिंदगी में रिपेयर की गुंजाईश हैं वैसे तो जिंदगी में भी रिपेयर चाहिए पर सेलरी के कम बजट के कारण ऐसी ख्वाहिशे रोज दम तोड़ देती हैं \

तो सरल ने ब्लॉग को पोपुलर करने के लिए सबसे पहले वृन्दावन में भगवान् कृष्ण से प्रार्थना कर डाली , पर आजकल के ब्लॉग पाठको के मन श्रधा से मीलो दूर के पत्थर हैं की कृष्ण जी की आवाज भी नहीं पहुँच पाई और पहुंची तो टकरा गयी पर चूर चूर ना कर पाई हार थक कर किसी लोकप्रिय ब्लॉग के टिपण्णी क्षेत्र में पहले तो जबरदस्ती टांग घुसेड़ी और फिर जान बूझकर किसी की टिपण्णी से झूठी घोर असहमति दिखाकर "ओंकारा " फिल्म की भाषा के समर्थक बने और अपनी ढोंगी ब्लॉग पोस्ट के सन्दर्भ दे डाले ताकि भाई बंधू ब्लॉग पोस्ट पढ़कर भाषा के "मजे " ले

फिर सदाबहार हिन्दू मुस्लिम मुद्दे को चुना पर दिखा कि वहां तो लेखक /पाठक
हैं ही नहीं सिर्फ ऊपरी तौर पर झूठे झगडे से लड़ते समय व्यतीत करने को उत्सुक कुछ राजनीति के लोग थेअब सरल क्यों इसमें भीड़ का हिस्सा बनता तो ये टेस्ट भी छोड़ दिया ,

फिर एक और नुस्खा अपनाया की बड़े बड़े ब्लोगरो की तरह जुमले बना लिए " उम्दा भाव ", " सटीक रचना " ," खूब कही " आदि आदि जो बस कोपी पेस्ट करने से हर ब्लॉगर आपको जानने लग जाता पर नक़ल के लिए भी तो अकल चाहिए दिक्कत जब हुई जब एक ब्लॉगर ने असमंजस में आकर पूछ ही लिया जब हास्य कविता में गलती से उनको सरल ने लिखा "गहरा दर्द हैं आपकी लेखनी में " और एक दिन जब किसी ब्लोगर के पिता की मृत्यु से सबंधित पोस्ट पर लिख डाला " हंसा हंसा कर मार डाला आपने तो "

तो सब लेखको के दिमाग की नसे हिला दी इस वाकये ने पर सरल के कानो पर ब्लोगरो के परामर्श से भी जूँ तक नहीं रेंगी अब कुछ टुच्चे किस्म में नवागंतुक ब्लोगरो ने सरल के नाम से फेक आई डी बनकर जब ब्लॉग पर गन्दगी मचाना शुरू किया तो सरल के होश ठिकाने गए और धमकियां आने लगी कि घर से उठवा लेंगे
मरता क्या ना करता और सरल फिर अपने प्रेम के मार्ग में , जिसमे ईश्वर , धर्म , राष्ट्र मंजिले आती थी , वापिस गया

मंगलवार, 8 जून 2010

राष्ट्र प्रेम को समर्पित मेरी एक और कविता

मेरे लिए तो प्रेम ईश्वर, राष्ट्र, समाज और मित्र सबमे हैं . प्रेम का हर भाव मुझे ईश्वर की देन लगता हैं क्योंकि हमारे व्यक्तिगत प्रेम में तो स्वार्थ भरा होता हैं . आज कुछ ईश्वर प्रेम ने राष्ट्र को समर्पित ये कविता लिखने को उत्साहित किया . शुरू में थोडा आदतवश नेताओ को भड़ास का माध्यम सा बनाना पड़ा , जो आपको थोडा पार्टी विशेष के विरोध में लग सकता हैं . पर राष्ट्र के लिए कई बार बहुत कड़क होना पड़ता हैं , हमारे ढीले पीले रवैये ने देखिये कमजोर इच्छाशक्ति बढाकर आतंकवाद को टोनिक दिया हैं . देखिये तो सही कैसी कैसी आतंकवादी घटनाये हो जाती हैं और इनको समर्थन देने वाले लोग हमारे अंदर देश में मौजूद हैं
खैर कविता पढ़े ,

उनकी मेहनत का ना यकीन सो हक़ हमारे भी बिखर गए
जब सहने का दौर आया तो पत्थर रिश्ते भी पिघल गए

क्यों आस बंधाते हो चंद झूठे लोगो से
ये कैसी आग बुझाते हो गीले नोटों से

शिकवा दुनिया से क्या हो जब ईश्वर वफ़ा ना कर पाए
ज़माने को मारी जिन्होंने ठोकर वो खुद कहाँ संभल पाए

सच्चे दिल वाले तो कब के मिट कर फ़साना बन खो गए
और झूठी नीयत वाले कुछ चोर सत्ता का आईना हो गए

किस किस में कमी निकालू जब चिराग के तले ही अँधेरा हो
सबको कैसे फांसी चढ़ाऊ जब वोट से चुना हर सत्तावान मेरा हो

तुफान से लायी शहीदों की कश्ती आखिर हमने कहाँ फंसाई
संविधान की आड़ में कुकर्म करके हमने राष्ट्रीयता गँवाई

किसी के मन को मोहने वाले सत्ताधीश दरअसल दगाबाज थे
मैडम के हाथो अपने सम्मान गिरवी रख चुके कुछ ड्रामेबाज थे

महंगाई से मैं मारा गया पर इनकी दुकाने सज रही थी
स्विस बैंक इनका हुआ पर मेरी मंदी चल रही थी

मैं धर्म से से जुड़ा तो इन्होने मुझे मजहबी करार दिया
देश जिहोने तोड़ दिया इन्होने उसे फरार किया

देश धर्म ना सही कम से कम एक इंसान तो बच जाता
बस भारत माँ को गाली ना देते तो" वीरेन" इनका क्या जाता

मत पुकार माता तेरा " वीरेन " तो बिना बुलाये आ जाएगा
तेरे कदमो में फूल नहीं माँ वो तो अपना मस्तक बिछाएगा

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे


Email:virender.zte@gmail.com

रविवार, 6 जून 2010

प्यार पर कविता -भाग तेरह

अभी प्रेम भाव के ऊपर रची ये कविता आपके श्री चरणों में समर्पित हैं । बस बैठे बैठे बन गयी कुछ सच हैं कुछ कल्पना । पहली वाली कड़ीयो को भी जोड़ कर पढ़ सकते हैं । ब्लॉग पाठक लिंक भी कविता के आखिरी में पढ़ सकते हैं ।

प्यार में तो जीने के अब ना सहारे ही रह गए
नदी क्या ख़त्म हुई तो किनारे भी बह गए

जो कभी पूरी दुनिया के दिल में प्यार भरता था
खुद उसका दिल एक चरित्रहीन पर मर मिटता था

तू कभी बुरा मत मानना ये सब तूने ही तो कहा था
तेरे हर शब्द को बस मैंने उंच नीच स्तर तक सहा था

ईश्वर के विधान से पुनर्जन्म के किस्से ने फंसाया था
हरि इच्छा वो सुकून वाली जिसने सदाचार गंवाया था

लाख मेरा दिल तार तार हुआ पर हिम्मत तेरी बनी रहे
सुख मेरे सारे छीन लिए तूने पर तू दुखो से कटी रहे

जिंदगी मेरी उस दिन छोड़ कर चला आया था
खुद तूने बढाया हाथ मैं छू तक ना पाया था

पर ईश्वर तुझे भी कहाँ मुझ पर दया आई हैं
जबकि तेरी मर्ज़ी में ही तो मैंने किस्मत गवाई हैं

फिर भी कृष्ण जी की इच्छा से बेमेल ये बंधन स्वीकार किया
हो जाये बस तेरे सुखो की रक्षा इसीलिए इसे प्यार का भाव दिया

तुझे पा लेना तो संकल्प से हो जाता पर तेरी ख़ुशी के लिए बेबस हूँ
जीवत्व की करुणा के लिए ब्रह्म भाव को त्याग दिया मैं वो शख्स हूँ

तू करवा ले सब इष्टदेवो की पूजा होगा वही जो ईश्वर चाहेगा
भक्ति भाव का हैं आराधक वीरेन तुझसे भला क्या पायेगा


पिछले दो तीन लिंक ये हैं

भाग बारह
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_04.html
भाग ग्यारह
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_22.html
भाग दस
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_21.html

ये तीनो लिंक उनके लिए हैं जो पुरानी कविता नहीं पढ़ पाए होऔर बाकि दसवे भाग में पिछले लिंक्स हैं ही

शुक्रवार, 4 जून 2010

प्रेम कविता - ( भाग बारह ) (इश्वर से शिकायत भरी )

आजकल कई बार ईश्वर से बहस हो जाती हैंजीतना तो खैर उसने ही हैं , क्योंकि मेरे पास उसके जितने ताकतवर संत और ज्ञानी नहीं हैंपूरी दुनिया उसके समर्थन में खड़ी हैं और मैं कुछ गिने चुने दुखी लोगो की तरफ से प्रतिनिधि बना हुआ हूँपर फिर भी कोई बात नहीं , कम से कम हम सच्चे तो हैं जो ईश्वर की झूठी बड़ाई करके कुछ पाने का लोभ लेकर उसकी पूजा नहीं करतेठीक हैं आप भी इस बहस का लुत्फ़ उठाये और ईश्वर के समर्थन में खड़े हो जाये .........

आज ईश्वर से शिकायत भरा पत्र लिखने का मन हो आया
मदद तो करता नहीं फिर भी बना हुआ हैं मेरा हमसाया

सारा कुछ दांव पर लगाकर ईश्वर को अपनाया था
पर जब दर पर उसके पहुंचा तो लानत देकर भगाया था

उसे तो सुन्दर चेहरे , बड़ी कार वाले लोग ही प्यारे थे
आँखों में आंसू लिए मेरे जैसे तो सदा उसने दुत्कारे थे

ना हमारी आस्था में भौतिकता का जादू था
स्वर्ग की रौनक देख क्यों हमारा मन काबू था

वैरागी होने का झूठा ढोंग भी नहीं किया
जीवन में कुछ मिला नहीं अफ़सोस नहीं भरा

तुझे हम पसंद नहीं तो भी कोई शिकायत नहीं
ना प्यारी हमें भी तेरी गीता या कुरान की आयत नहीं

ना भक्ति ना ज्ञान ना कोई साधक मन चाहिए
नकली जिंदगी ना स्वीकारू मुझे असली मौत चाहिए

ना थी जिनमे गज भर ताकत तुने मीलो उनको बढाया था
मुझमे समन्दर जितना होंसला था पर तुने बूँद बूँद रुलाया था


जिंदगी जीने की अब मुझे हिम्मत मिलती नहीं
जब भी खड़ा हुआ मेरी जमीन हिलती रही

जिंदगी जीने की अब मेरे पास कोई वजह नहीं हैं
सच्चे मन से आवाज आई क्या ईश्वर भी कही हैं

अब हर बार तो मैं धीरज कहा से लाऊ
जहाँ वीरेन को सुकून मिले वो दुनिया बसाऊ

बस आपके श्री चरणों में इतना ही !!!!!!!!!!!!

बुधवार, 2 जून 2010

राष्ट्र और समाज को समर्पित मेरी एक कविता

इस बार मैं मेरे ईश्वर प्रेमी साधको से माफ़ी चाहूँगा क्योंकि ये कविता भक्ति या प्रेम के ऊपर नहीं हैं कुछ आदतवश भाव सकता हैं पर मैंने उस भाव को रोकने कि बड़ी कोशिश कि हैं देश ओर समाज में जो आजकल हो रहा हैं उससे कुछ बाते अच्छी हैं कुछ हौसला तोड़ देने वाली हैं सुरक्षा हमारे देश का बहुत अहम् मुद्दा बना हैं झूठी राजनीति के चलते थोड़ी निराशा भी होती हैं खैर कुछ भी हो , मुझसे कुछ गलत लिखा जाये तो कृपया माफ़ कर दे पसंद ना भी आये तो मेल कर दे , मैं सुधार करूँगा ब्लॉग पर पहली बार देश से सबंधित कविता लिखने जा रहा हूँ हौसला ना तोड़े :-

इतिहास बदलने वाले हाथ कलम घिस रहे हैं
दुष्ट नेताओ कि भीड़ में बेचारे संत पिस रहे हैं


अकल ना थी जिन्हें गधे चराने की , देश उनसे हंकवाया गया
ना कर पाई नपुंसक सरकारे देश की रक्षा , तभी जल्दी मुआवजा बांटा गया

जला दिया जिन्होंने घर मेरा , उनके ही घरो पर पानी छांटा गया
गलती जिन्होंने औरों की मानी, अपने गिरेबा में ना उनसे झाँका गया

हिन्दू मुस्लिम के मध्य में एक राष्ट्र धर्म कही खोता हैं
कांग्रेस ओर भाजपा में कही एक भारतीय रोता हैं

कमजोरो को यहाँ सबसे ऊंचे पदों पर बिठाया गया ,
लोकतंत्र कहाँ था जब एक मैडम का युवराज सराहा गया

कितना अन्याय गरीब लोगो पर ढाया गया
घर ना था जिनके पास ताज महल उनसे बनवाया गया

किसको फरियाद सुनाऊ, कहते कहते दिल भर आता हैं
पूरे दिन की मेहनत का फल रात में दर्द बन जाता हैं

दूध पिलाती माए देखि , खून सने अरमान लिए
देश को तोड़ने वाले सदा यहाँ शहीद सा सम्मान जिए

क्यों एक आतंकवादी पर सोलह करोड़ स्वाहा हो गया
देश भक्त करकरे तो पल भर में भगवान् को प्यारा हो गया

कौन देगा जवाब क्या किसी सरकार कि कोई जवाबदेही नहीं हैं
घोषनाओ में ही दीखता बस विकास , बदली क्यों फिजा नहीं हैं

कितनी करू मैं ज्ञान की बाते , जब पागल मुझे बताया गया
राम को मेरे नकार दिया जिन्होंने ,
धर्मनिरपेक्षता
का सिक्का उनका चलाया गया

अब बस इतने पर ही विराम लगा लेता हूँ , क्योंकि फिर विवादस्पद सा लिखा जायेगा ओर एक पार्टी विशेष की ढुलमुल नीति ओर भ्रष्टाचार को लेकर उदासीनता पर ही केन्द्रित हो जायेगा , जो मैं अपनी एकाग्रता खोने की कीमत पर नहीं कर सकता हैं । मैं हमेशा इस विषय पर लिखने से बचता हु , पता नहीं आज क्यों लिखा गया । मैंने वही लिखने की कोशिश की हैं जो आज तक सच महसूस किया हैं ।
जय हिंद जय भारत ,

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...