अभी प्रेम भाव के ऊपर रची ये कविता आपके श्री चरणों में समर्पित हैं । बस बैठे बैठे बन गयी कुछ सच हैं कुछ कल्पना । पहली वाली कड़ीयो को भी जोड़ कर पढ़ सकते हैं । ब्लॉग पाठक लिंक भी कविता के आखिरी में पढ़ सकते हैं ।
प्यार में तो जीने के अब ना सहारे ही रह गए
नदी क्या ख़त्म हुई तो किनारे भी बह गए
जो कभी पूरी दुनिया के दिल में प्यार भरता था
खुद उसका दिल एक चरित्रहीन पर मर मिटता था
तू कभी बुरा मत मानना ये सब तूने ही तो कहा था
तेरे हर शब्द को बस मैंने उंच नीच स्तर तक सहा था
ईश्वर के विधान से पुनर्जन्म के किस्से ने फंसाया था
हरि इच्छा वो सुकून वाली जिसने सदाचार गंवाया था
लाख मेरा दिल तार तार हुआ पर हिम्मत तेरी बनी रहे
सुख मेरे सारे छीन लिए तूने पर तू दुखो से कटी रहे
जिंदगी मेरी उस दिन छोड़ कर चला आया था
खुद तूने बढाया हाथ और मैं छू तक ना पाया था
पर ईश्वर तुझे भी कहाँ मुझ पर दया आई हैं
जबकि तेरी मर्ज़ी में ही तो मैंने किस्मत गवाई हैं
फिर भी कृष्ण जी की इच्छा से बेमेल ये बंधन स्वीकार किया
हो जाये बस तेरे सुखो की रक्षा इसीलिए इसे प्यार का भाव दिया
तुझे पा लेना तो संकल्प से हो जाता पर तेरी ख़ुशी के लिए बेबस हूँ
जीवत्व की करुणा के लिए ब्रह्म भाव को त्याग दिया मैं वो शख्स हूँ
तू करवा ले सब इष्टदेवो की पूजा होगा वही जो ईश्वर चाहेगा
भक्ति भाव का हैं आराधक वीरेन तुझसे भला क्या पायेगा
पिछले दो तीन लिंक ये हैं
भाग बारह
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_04.html
भाग ग्यारह
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_22.html
भाग दस
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_21.html
ये तीनो लिंक उनके लिए हैं जो पुरानी कविता नहीं पढ़ पाए हो । और बाकि दसवे भाग में पिछले लिंक्स हैं ही
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4 टिप्पणियां:
har bar ki tarha is bar bhi
bahut khub
jitni prashansha ki jaye kam he
सादर वन्दे !
सार्थक रचना !
रत्नेश त्रिपाठी
अति सुन्दर भावपूर्ण रचना...
अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर...
आपकी कविता ..आपके प्रेम का प्रतीक है..
बहुत सुन्दर लिखा है आपने...
सचमुच आपका प्रेम अनुकरणीय है....
आभार...
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