मंगलवार, 22 जून 2010

राष्ट्र प्रेम- मेरे भारत देश को सम्पर्पित

आज कुछ मन किया कि उस वतन को भी रूह में बसाये जिसकी हवा से सांसे उस खुदा ने बख्शी हैं । देशभक्ति का जज्बा उन परिवारों से पूछो जिन्होंने देश के लिए अपने सपूत , भाई , पिता राष्ट्र कि रक्षा में झोंक दिए । हालाँकि राजनीति कि तो बुराई लिखने कि मेरी आदत हैं । पर फिर भी मैंने पूरी कोशिश हैं बचने की । एक सच्चे देशवासी होने के नाते मैंने कोशिश की हैं की जो लिखू वो भारतीय के शब्द हो किसी हिन्दू मुस्लिम के नहीं नहीं तो आजकल धर्म और देश की प्राथमिकता की परिभाषाओ ने संदेह के सिवा कुछ नहीं दिया हैं ।

तुम रास्ता तो बनो रोड़े तो हट जायेंगे
प्रताप तो चुनो चेतक तो छंट जायेंगे

क्रिकेट में ना उलझो प्यारो ,देश के लिए भी कोई खेल हो जाये
सत्ता भले फूट डलवाती रहे , हिन्दू मुस्लिम में बस मेल हो जाये
भारतीयों पर अब भी विदेशी ही तो राज कर रहे हैं
घाघ चरित्र वाले कुछ दलाल भ्रष्ट सत्ता कि गुलामी कर रहे हैं


जनाधार जिनका नहीं भविष्य उन्हें बताया जा रहा हैं
छिपी हुई नीतिओ से राम का अतीत भी मिटाया जा रहा हैं
लोकतंत्र को ये कैसा संविधान बताया जा रहा हैं
वोट से नहीं उत्तराधिकार से नेता लाया जा रहा हैं

क्या करेंगे ये महिलाओ का तैंतीस फ़ीसदी आरक्षण
मुद्दों से बस ध्यान बंटाया जा रहा हैं
सुलग रहा अंदर अंदर मेरा भारत
झूठी संवेदनाओ से उसे बुझाया जा रहा हैं


ना कर पाए जो शहीदों की विधवाओ का सम्मान
संसद पर उन कायरो ने हंगामा मचाया हुआ हैं
चापलूसी और नपुंसकता ही रह गए राजनीति के मायने
सर्वोच्च पदों पर तभी तो ऐसो को बिठाया गया हैं

सत्ता के नशे में जो जनता को भुलाने जा रहा हैं
इतिहास उनकी अब धुल उड़ाने रहा हैं
बाजुओ में ताकत नहीं इन विदेशी गुलामो की
कायरता को शांति की चादर से छुपाया जा रहा हैं

ना जरुरत हमें लड़ाई लिए भेड़ो के देश की
देशभक्त तो एक अकेला शेर ही होना चाहिए
गैरत अगर बची हैं तो सच्चे लोग साथ हो ले
बदलाव अगर भारत में लाना हैं जान से हाथ धो ले

हर जन्म में तेरे लिए मातृभूमि मिट जाऊंगा
इस जन्म में भी सरहद पर वीर बन काम आऊंगा
कोई ना जाने मेरे बारे में इस बात कि परवाह नहीं
देश के लिए जलते शोलो में भी "वीरेन " को आह नहीं

रविवार, 20 जून 2010

एक कविता - अपनी बुराई के ऊपर

इस बार एक अलग से मुद्दे पर कविता लिखी हैं , अपनी बुराई दिल खोलकर लिखी हैं , आपको मजा आ जायेगा ।

कितने घर उजाड़ दिए मेरे प्रेम ने और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
हवाओ के झोको से उड़ जाने वाला हिमालय से टकराता फिरता हूँ

मेरी नाकामिया मुझे लेकर डूबी, रिश्तेदारिया मुझसे सारी रूठी
गलतियाँ ही मैंने सबकी ढूंढी , अच्छाई की तो आशा छूटी
नजदीकिया ना निभा पाया और दुरिया निभाता फिरता हूँ
मेरे पापो की सूची लम्बी और मैं चरित्र निभाता फिरता हूँ

मेरी मरती सांसो कि भी क्या कसमे खायी जाये
जिंदगी के बाद अब मौत की रस्मे लायी जाये
सूखी धरती मेरा प्यार और मैं दुनिया भिगोता फिरता हूँ
भ्रष्ट परंपरा मेरा आधार और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ

नोटों की गिनती पर मेरा इमान डोलता हैं
अपने मतलब के लिए हमेशा मेरा दिल बोलता हैं
जुर्म का मैं बेताज बादशाह और सत्संग कराता फिरता हूँ
संयम का गला घोंट दिया मैंने और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ

सत्ता की चापलूसी मेरी महत्वाकांक्षा हैं
सुन्दर रूपसी मिले ये भोंदू मन की आकांक्षा हैं
कट्टर हिन्दू मुस्लिम बन कर मैं भगवान् बनाता फिरता हूँ
धर्म की मुझे समझ नहीं और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ

आशा हैं मैंने आपको पूरा निराश किया होगा ,
झूठी एक संवेदना से पूरी कविता को जीया होगा
शब्दों की मेरी सीमा हैं फिर भी मैं ब्लॉग बनाता फिरता हूँ
बदनामी अपनी सारी छुपा ली और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ



आप सबके श्री चरणों में नमन !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
वीरेन्द्र ..

शनिवार, 19 जून 2010

दोस्त को समर्पित कविता (ईश्वर से दो शब्द )

हे हरि !
ये कविता एक दोस्त को समर्पित हैं जो इन दिनों समस्याओ में हैं , ईश्वर करे वो शीघ्र ही ठीक हो जाये ,अगर वो ये पढ़े तो जवाब दे कि समस्या ख़त्म हुई कि नहीं


सख्त लोहे की जंजीरे मिली , पर हाथ तो उसके फूलो जैसे हैं
संतो से भी जो पूजी जाती , हालत उसके बदतर कैसे हैं

सवालों का उसका सागर जिसमे बस मैं बहता जाता हूँ
भक्ति का फल टूटे दिल को सारा कुछ मैं कहता जाता हूँ

धर्म को जिसने नित्य नया जीवन दिया था
कालकूट श्री हरि ने उसके होंठो से पिया था

रिवाजो में लिपटी होती वो एक दिल की दीवानी थी
प्यार और धर्म में उलझी खोती एक दर्द की कहानी थी

मीरा राधा का प्रियतम कृष्ण उसका कोई चाहने वाला था
सीता माता की परीक्षा लेने वाला उत्तम मर्यादा वाला था

सबमे सूक्ष्म रूप में बसती पर उस दिल को वो देख ना पाई
ज्ञान से सब वो देखने वाली नैनो में किसी के बस ना पाई

चरम शिखर पर पहुंची आत्मा, पातालो से भी ठुकराई थी
एकत्व को प्राप्त जीवत्व वो परतो में भी चिनवाई थी

परम समर्थ वो अबला कैसी प्रार्थना कर गयी थी
तपती दोपहरी में जिसकी झील दुःख से भर गयी थी

शरीर थी या आत्मा जीवन रह भी गया था नहीं
मदद करने को कोई संत बचा था क्या कही

ऊंगली सबने उठा दी दर्द उसका ना कोई उठा पाया
सबके लिए खुद को छोड़ा पर दिल उसका ना वफ़ा पाया

नारायण या जीव वो या उसमे ही समाया हमसाया था
सब मुझमे सब मेरे "वीरेन " के लिए ना कोई पराया था

बुधवार, 16 जून 2010

सच्चा प्यार -भाग पंद्रह ( ईश्वर से शिकायत प्रेम को लेकर )

अभी प्यार की कविताओ की कड़ी में ये आज पंद्रहवी कविता हैं । आशा हैं आपको पसंद आएगी । इसमें थोडा ईश्वर से शिकायत भरी बाते हैं , जो शायद वो सहन कर ले । भाव में तारतम्यता के लिए चौदहवी कविता का लिंक देने की जरुरत नहीं क्योंकि वो exact पहली पोस्ट में हैं ,आप सीधे ब्लॉग से पढ़ ले , भूमिका भी ।

जीव बनकर तेरे हर कहर मैं सहता गया
और कृष्ण तू रस बनकर बस औरो के लिए बहता गया

क्या करू जब एक बुरी लड़की भा जाये
मेरे मिटने का भाव उसके लिए जाये

जिंदगी उस कदम पर जाकर बेमानी हो गयी थी
उसकी ख़ुशी के लिए अपनी भक्ति खो गयी थी

चरित्रहीन तुने ही बनाया कृष्ण मुझमे कहाँ ताकत थी
समाज के पुराने रिवाजो की खिलाफ मेरी बगावत थी

मेरा दोष तो बताओ प्रभु जो खुद का सजा दे सकू
डूबी हो मल्लाह से कश्ती तो क्यों ना खुद मैं खे सकू

इसके उसके इलज़ाम कब तक लिए मैं फिरूँ
सांस पूरे हो चुकी जिंदगी में किसलिए प्राण भरूँ

ना हरि ना ब्रह्म ना ग्रंथो का ही सहारा मिला
जाऊ कहाँ भवसागर पार जब ना किनारा मिला

भक्ति हो या प्रेम हो या पर ज्ञान की कोई मांग नहीं
नशा बस एक सच्चे समर्पण का झूठा मेरा स्वांग नहीं

झूठे सारे लोगो को वफ़ा का रास्ता मिला
सच्चो को तो भावो ने दिया जड़ से हिला

कभी तो दो पल हमारे जीवन में सुकून के जाते
अच्छे पल ना मिले , बुरे लोगो में हम समा जाते

कभी कभी तो वो धुंधले राज ईश्वर की दया से चमक जाते
दुआ उसकी होती "वीरेन" के चिराग जिसकी झोली में दमक जाते

शनिवार, 12 जून 2010

प्यार पर कविता - भाग चौदह

भूमिका की आवशयकता नहीं हैं क्योंकि आप पिछले भागो में पढ़ सकते हैं ।
तेरहवी कविता का लिंक नीचे हैं ।
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html

चोदहवी कविता

उसे मेरी
आँखों में गहराई नज़र आती थी ,
वो मेरी बातो की सच्चाई समझ जाती थी

उसे पाने का अहसास जब कभी सांसो में बसता था
बरस जाने को उसके आँगन में एक सावन तरसता था

खुल कर बिखर जाने को एक लावा धधकता था
चैन से सोती रातो में ये मेरा दिल जगता था

फूलो से कोमल हाथो वाली क्यों याद आती थी
हँस पड़ती थी मेरी किस्मत जब वो मुस्कराती थी

दर्द दिल में लिए जीना अब श्राप हो गया था
मंजिल तो क्या मिलती रस्ता भी खो गया था

ईश्वर ने भी मुझे तब सब और से बेगाना बनाया था
मिट जाऊंगा जिससे मैं वो रस्ता उसे बताया था

सबको सुकून देने की आदत श्री हरि ने मुझे लगा दी थी
सुख औरो को देते वक्त मेरी दुखी जिंदगी सजा दी थी

मेरे जीवन में क्या बस औरो को मदद करना ही लिखा हैं
इन हालातो में ईश्वर भी कहाँ मुझे हाथ देता दिखा हैं

मान इतना मिला कि परमपिता भी खड़ा हो गया था
त्याग में "वीरेन "इतिहास से भी बड़ा हो गया था

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...