शनिवार, 12 जून 2010

प्यार पर कविता - भाग चौदह

भूमिका की आवशयकता नहीं हैं क्योंकि आप पिछले भागो में पढ़ सकते हैं ।
तेरहवी कविता का लिंक नीचे हैं ।
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html

चोदहवी कविता

उसे मेरी
आँखों में गहराई नज़र आती थी ,
वो मेरी बातो की सच्चाई समझ जाती थी

उसे पाने का अहसास जब कभी सांसो में बसता था
बरस जाने को उसके आँगन में एक सावन तरसता था

खुल कर बिखर जाने को एक लावा धधकता था
चैन से सोती रातो में ये मेरा दिल जगता था

फूलो से कोमल हाथो वाली क्यों याद आती थी
हँस पड़ती थी मेरी किस्मत जब वो मुस्कराती थी

दर्द दिल में लिए जीना अब श्राप हो गया था
मंजिल तो क्या मिलती रस्ता भी खो गया था

ईश्वर ने भी मुझे तब सब और से बेगाना बनाया था
मिट जाऊंगा जिससे मैं वो रस्ता उसे बताया था

सबको सुकून देने की आदत श्री हरि ने मुझे लगा दी थी
सुख औरो को देते वक्त मेरी दुखी जिंदगी सजा दी थी

मेरे जीवन में क्या बस औरो को मदद करना ही लिखा हैं
इन हालातो में ईश्वर भी कहाँ मुझे हाथ देता दिखा हैं

मान इतना मिला कि परमपिता भी खड़ा हो गया था
त्याग में "वीरेन "इतिहास से भी बड़ा हो गया था

1 टिप्पणी:

संगीता पुरी ने कहा…

त्‍याग करनेवाला महान तो बनता ही है .. पर आज कौन त्‍याग कर पाता है ??

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...