मंगलवार, 13 जुलाई 2010

परमेश्वर को पति रूप में पाने की इच्छा को व्यक्त करती एक कविता

यह कविता मेरी एक मित्र ने भेजी हैं जिन्हें परम तत्व का साक्षात्कार हो चुका हैं , उनका अभिप्राय अपने निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान को सगुण रूप में वरण करने के लिए काफी मार्मिक बन पड़ा हैं । आपको पसंद ना भी आये तो मेरे आनंद में कोई कमी होने वाली नहीं हैं । कविता समझ में आ जाये तो ढीठ बन जाये और मुझे कुछ ना बताये । बस पढ़े और सोचे , कि इश्वर से प्यार करने का क्या क्या भाव हो सकता हैं ,। पहले कविता में वो मेरी खिंचाई करती हैं फिर इश्वर की , तो आपके श्री चरणों में समर्पित :-

कविता लिखना छोडो भाई
पहले करवाओ मेरी विदाई
क्या कोई राजकुमार राजा होने को तरस गया है?
और एक राजा सच्चे वैराग से बरस गया है?
रिमझिम सा उठता एक संकल्प मुझे खींचता है
दुनिया का असली राजा अपना हक छीनता है
मुझे क्या पड़ी किसी छलिये से दिल लगाने की
नाम तो बताया नहीं क्या उम्मीद हो घर बसने की
मैं क्यूँ जाऊं किसी गुरुद्वार
मेरा तो हक है पति का प्यार
कितनी ही बार अलग नाम से मिलता है
उसी नाम को स्वीकारूं तो फिर जलता है
असली पहचान पूछूं तो शक्की समझता है
उसे नहीं पहचान पाई, बस ये ही रटता है
असली कहानी तो खुद उसे ही पता नहीं
ऐसे ही बदनाम कर रहा है, मैं तो उस से खफा नहीं
बहुवचन क्यूँ लगाऊं वो तो एक ही एक है
प्रकृति है रंग बिरंगी, उसी के रूप अनेक हैं
स्त्री तो सिर्फ प्रकृति का रूप है ये सबको ज्ञात है
पुरुषों की जात दो ही हैं ये मुझे विश्वास है
मैंने तो कबका उन्हें चुन लिया था
कितने फेरे लिए उधेड़े अनेक का रूप क्यूँ धर लिया था
अपनी इज्जत करवाने के लिए क्या शब्द ही काफी नहीं
खुद को बहुवचन बना लेना क्या ये शिवजी की जाति नहीं
फिर भी मुझे उनकी जाति समझनी जरूरी है
क्यूंकि मैं तो एक ही हूँ, न बँट सकना मेरी मजबूरी है
ऐसा नहीं कि किसी के भी भाव मुझे द्वैत का एहसास करवाएं
सिर्फ वो ही अलग प्राणी हैं, विश्वास हो तो प्राणपति हो जाएँ
किसी किसी से न प्रार्थना करुँगी
वीरेन चाहे तो बात करवाए, वर्ना बात ही न करुँगी
हरि ॐ

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