शनिवार, 3 जुलाई 2010

आज एक ब्लॉग पर एक साधक बहन को इश्वर कि बड़ाई करते सुना जो मेरे जैसे ईर्ष्यालु से सहन नहीं हुआ । अपनी इसी टिपण्णी को कविता का रूप दे दिया । कविता छोटी हैं अब क्या करू ईश्वर से थोडा डर भी तो लगता हैं कि कही ज्यादा खुंदक ना जाये और मेरी वाट ना लगा दे ( भाई मैं भी थोडा प्रोफेशनल हूँ )
प्रिय साधक बहन ,

कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं

वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं

भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं

क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा

फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

1 टिप्पणी:

vandana gupta ने कहा…

मतलब अट भी मेरी और पट भी मेरी………………उस बेचारे को थप्पड भी लगा दिया और उस पर मरहम भी लगा दिया।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...