शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

बृज यात्रा भाग दो - राधा कुंड

पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि ब्रज में सर्वोपरि स्थान राधाकुंड का हैं आपको दिल्ली कि तरफ से अगर प्रवेश करना हो तो फरीदाबाद कि तरफ से नेशनल हाईवे नम्बर दो या जी टी रोड पर मथुरा या आगरा कि कोई भी बस आपको छटीकरा उतार देगी छटीकरा से आप वृन्दावन ( छः किलोमीटर ) या राधाकुंड ( पन्द्रह किलोमीटर ) या गिरिराज जी ( बीस किलोमीटर )जा सकते हैं मथुरा के लिए यहाँ उतरने कि जरुरत नहीं हैं क्योंकि वो इसी हाइवे वाले रोड पर और आठ किलोमीटर आगे हैं।


राधा कुंड के लिए छटीकरा के लिए ऑटो वगैरह चलते हैं जो आपको आधे घंटे में राधा कुंड पर पहुंचा देंगे वहां राधा कुंड , कृष्ण कुंड और ललिता कुंड तीनो एक साथ मिलेंगे आपको राधाकुंड और कृष्ण कुंड के बीच में मंदिर भी मिलेगा तीनो कुंदो कि परिक्रमा सिर्फ एक किलोमीटर की हैं । साथ में ही एक इस्कोन का मंदिर भी हैं परिक्रमा पथ पर भी चार पांच महत्वपूर्ण मंदिर हैं



वैसे
राधा कुंड क्यों बना या क्यूँ सबसे पावन हैं इसके पीछे जो रहस्य मैंने सुना हैं की भगवान् कृष्ण ने जब एक राक्षस अरिष्टनेमि ( बैल के वेश में राक्षस ) का वध किया तो राधा जी ने कृष्ण पर गो हत्या के पाप को नष्ट करने को प्रोत्साहित किया कृष्ण जी ने समस्त तीर्थो का आह्वान किया , सभी तीर्थ गए पर तीर्थराज पुष्कर नहीं आये हालंकि वो अलग कहानी हैं , इसे अभी चर्चा में नहीं लेते हैं
तो समस्त तीर्थों के जल में स्नान करने के बाद भी कृष्ण जी का पाप नष्ट नहीं हुआ कृष्ण ने जहाँ समस्त तीर्थों को आह्वान किया था वह स्थान कृष्ण कुंड बना
फिर राधा जी ने अपने पैर के अंगूठे से जमीन में गड्ढा किया , तीर्थों का जल उस में भी गया फिर भगवान् कृष्ण ने इस कुंड में स्नान किया और निवृति पायी तब से यही प्रसिद्द हैं की राधा कुंड सबसे पवित्र हैं और इसमें स्नान करने से अनायास ही भक्ति प्राप्त होती हैं

ईश्वर से प्रार्थना


हे
हरि !!!!
मुझे लगता था कि आप मेरी प्रार्थना से शायद प्रसन्न हो जाएँगे और मेरे पाप क्षमा करके मुझे दर्शन देंगेपरन्तु अब इतने सालो के बाद अब मेरा हौंसला बिलकुल टूट गया हैं और मैं ये कहने को विवश हुआ हूँ कि

" शायद मेरे पाप ज्यादा थे , मेरी अपेक्षा से ज्यादा मैंने पाप किये होंगे या फिर मेरी प्रार्थनाओ में दम नहीं होगा ,नहीं तो आप तो कभी भी अन्याय नहीं करतेमैं बेवक़ूफ़ पता नहीं क्यूँ सोचता था कि शायद आप मेरी इस बात पर या मेरे इस काम पर प्रसन्न होंगे और आखिरकार बेपर्दा होकर मेरे सामने कहीं से जैसे बादलों में से या कही धुंध से या एक अँधेरे से प्रगट होकर कह देंगे कि बस भाई आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ



मुझे अब आपके दर्शन का भरोसा टूट चूका हैंकोई प्रवचन या भक्ति कि कोई विधा अब मुझे उठाने में सही नहीं होगी क्योंकि अब मुझमे आपके लिए वो प्यार रहा नहींदुःख इस बात का हैं कि जो समय मैंने आपके बारे में सोचने में बिताया वो समय अगर सदुपयोग करता तो शायद कैरियर में काफी तरक्की होतीआपके डर से मैं दुनिया के भोगो का आनंद तो ना ले सका पर क्षणिक और कमजोर वैराग्य के कारन मैं ना तो धर्म ही निभा सका और अधार्मिक लोगों ने मुझे कभी अपना माना नहीं

प्रभु मैंने कोई प्रसिद्धि नहीं चाही थीबस मुझे शांति मिल जातीमैंने कोई बड़े वैभव के लिए आपकी शरण ली थी ऐसा नहीं हैंबस इतना सोचा था कि शायद जब संत बोलते हैं कि आप दयालु हैं और सब कुछ दे देते हैं तो मन ने एक कल्पना रची कि दुखी संसार में जब मेरे पास कोई वजह नहीं हैं जीने कि , तो शायद आप संकल्प मात्र से मुझे अपनी शरण में ले लेगीता , रामायण और कई ग्रन्थ पढ़े जिससे कि आपमें रूचि होआप कि प्रशंसा से भरे सारे ग्रन्थ मुझे हौसला तो दे सके पर यथार्थ में आपके दर्शन करा सके

मैं क्या करूँ प्रभु अगर मैं आपको पाने के योग्य नहीं हूँपर आपकी वजह से अब मैं ना तो संसार में कोई ज्यादा सफल व्यक्ति हूँ और मेरी धार्मिक यात्रा भी अब मेरी हिम्मत टूटने कि वजह से खत्म हो गयी हैंमैं बस यही कहना चाहता हूँ कि हे हरि , सबके पास आपको पाने कि ताकत नहींकोई और आगे साधक मिले तो उस पर दया कर देना
बस इतना ही कह सकता हूँ आपके लिए ( हालाँकि मैं गलत भी हो सकता हूँ )

" हम को खबर भी होने नहीं दी किस मोड़ पर ला के दिल तुने तोडा
अपना बनाना रहा दूर तुने ओरों के हो जाए ऐसा ना छोड़ा
तेरी जफा का चर्चा ही कैसा अपनी वफ़ा पे मैं शर्मा रहा हूँ
.जो प्यार तुने मुझको दिया था वो प्यार तेरा मैं लौटा रहा हूँ
अब कोई तुझको शिकवा ना होगा तेरी जिंदगी से चला जा रहा हूँ "
अगर आपको हम पसंद नहीं थे तो फिर क्यों हमें जन्म दियाहम तो समर्थ नहीं थे पर आप तो आकर समझा सकते थेखैर
इलाही अजब हैं ये तेरी खुदाई
कि दोनों जहाँ पर हुकूमत हैं तेरी
अँधेरे उजाले में हर जिंदगी हैं
कि कई मुश्किलों में ये जन्नत हैं तेरी

भजन - जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान् की

ये भजन मैंने 2008 में बापूजी के दिल्ली ( द्वारिका ) में हुए सत्संग में सुना था । मुझे इसके मूल लेखक का पता नहीं हैं । पर ये भजन बहुत ही अच्छा हैं जिसमे इश्वर प्रेमी भक्तों के भाव बिलकुल सटीक प्रदर्शित किये गए हैं ।


जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान् की , किसी सूझ वाली आँख ने पहचान की
नामदेव ने पकाई रोटी कुत्ते ने उठाई, पीछे घी का कटोरा लिए जा रहे
बोले रूखी तो ना खाओ स्वामी घी तो लगाओ
रूप अपना क्यूँ मुझसे छुपा रहे
तेरा मेरा एक नूर फिर काहे को हजूर तुने शकल बनायीं हैं श्वान की
मुझे ओढनी उढ़ा दी इंसान की


निगाह मीरा की निराली पी के जहर की प्याली
ऐसा गिरिधर बसाया श्वास में
जब आया काला नाग बोली धन्य मेरे भाग
आज आये प्रभु सांप के लिबास में,
आओ आओ बलिहार प्यारे कृष्ण मुरार
बड़ी कृपा हैं कृपानिधान की , बलिहारी हूँ मैं आपके एहसान की ,


इसी तरह सूरदास निगाह जिनकी थी ख़ास
ऐसा नैनो में नशा था हरिनाम का
नैन हुए जब बंद तब मिला वो आनंद
देखा अजब नज़ारा भगवान का
हर जगह वो समाया सारे जग को बताया
आई आँखों में रौशनी थी ज्ञान की
देखि झूम झूम झांकी भगवान् की

गुरु नानक कबीर सही जिनकी थी नजीर
देखा पत्ते पत्ते में निरंकार को
नजदीक और दूर वही हाजर हजूर
यही सार समझाया संसार को
ये जहां शहर गाँव और जंगल बियाबान
मेहरबानियाँ हैं उस मेहरबान की
सारी चीज़ें हैं ये एक ही दूकान की

जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान की ...............







गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

भजन - आज सजन मोहे अंग लगा लो

ईश्वर प्रेम अद्भुत होता हैं । उसे हर जगह ढूंढना आसान नहीं होता । अपने सदगुरु बापूजी के श्री मुख से ही सुना था कि संतो के गुण दोष मत विचारिये बस सिर्फ अपने उद्धार के लिए उनके द्वारा बताई गयी बातों से कोई एक चुराकर अपनी बना लो और बस तर जाओ । ज्यादा तर्क बुद्धि से कुछ हासिल नहीं होगा । अभी एक भजन मिला जो प्यासा फिल्म का हैं जो साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा हैं । फिल्मांकन हालाँकि वहीदा रहमान और गुरु दत्त पर ज्यादा हैं पर इसमें सन्दर्भ लिया गया हैं कि श्री राधा जी कृष्ण भगवान् से प्रार्थना करते हुए कहती हैं
आज सजन मोहे अंग लगा लो जन्म सफल हो जाए
हृदय की पीड़ा विरह की अग्नि सब शीतल जो जाए ,
आज सजन ...........

कई जुग से हैं जागे मेरे नैन अभागे ,
कही जिया नहीं लागे बिन तोरे
कोई सुख नहीं दीखे आगे, दुःख पीछे पीछे भागे
जग सूना सूना लागे बिन तोरे
प्रेम सुधा मोरे सांवरिया , सांवरिया
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो सब जल थल हो जाए
आज सजन ....................


मोहे अपना बना लो, हो मोहे अपना बना लो
मोरी बांह पकड़ मैं हूँ जन्म जन्म की दासी
मोरी प्यास बुझा दो मनोहर गिरिधर
मनोहर गिरिधर मैं हूँ अंतर्घट तक प्यासी
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो सब जल थल जो जाए
आज सजन .............

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

एक कविता - एक नास्तिक वृद्ध का पछतावा

ये कविता उन लोगों के लिए हैं जो सारी उम्र बिना इश्वर को याद किया बिताते हैं और अंत में पछताते हैं ,

कविता ली हैं वन्दनीय संत श्री आशुतोष महाराज के संस्थान दिव्या ज्योति जाग्रति संस्थान से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका अखंड ज्ञान से । इसके लेखक हैं श्री अमित कुमार दीक्षित और दिसम्बर 2009 में प्रकाशित अंक में पृष्ठ 18 पर हैं ये कविता हैं ।

सूखी सूखी घास जैसे पानी को तरसती हैं
हाँ आज मेरी उम्र वैसे जवानी को तरसती हैं
क्या समां था वो क्या वक्त था वो हरि भक्ति करने का
अब तो चंद सांसे बची हैं कब वक्त जाये मरने का
हरि ने भी तब मुझ पर तरस खाया था
मुझे ज्ञान देने हेतु कुछ संतो को भिजवाया था
तब जवानी का आलम भी खूब छाया था
और उस वक्त मैंने बस तन को सजाया था
याद आता हैं वो वक्त जो रेत की तरह फिसल गया
पानी का बहाव था जो निकल गया बस निकल गया
अब जाने कब मौके मिले बस खुद से कहता जाता हूँ
कोई मेरा अब साथी नहीं , रो रो के पछताता हूँ
बुढ़ापे के बादलों में जब मौत की बारिश बरसती हैं
हाँ आज मेरी उम्र जवानी को तरसती हैं

एक प्रार्थना -बापूजी के आश्रमवासियों पर झूठे आरोपों की सत्यता

सभी प्रिय जन

पहले ही मैं साफ़ कहना चाहता हूँ कि मैं बापूजी का लगभग दस वर्षों से साधक हूँ । अपने जीवन में जितना धर्म के बारे में समय गंवाया वो एक कहानी हैं । भारत के पुराने संतो के जीवन परिचय पढ़िए और उनके साथ हुए समाज के उस समय के विरोध को पढ़िए । उनके साथ उस समय समाज की सारी ज्यादितियों , सारी बुरायिओं को पढ़िए ।

सिर्फ एक दो साल बापूजी के साधको से जुड़कर रहिये और निष्पक्ष अपने विचार उनके सामने रखिये । खुद आश्रमों में जाईये और देखिये वहां क्या होता हैं और पता नहीं क्यों कुछ नज़रों को सारे ढोंग "बापूजी " के शिष्यों में ही दीखते हैं । ऐसे लोगों से प्रार्थना हैं कि बापूजी के किसी सत्संग में पूरी अश्रधा से जाईये और मन से बुराई करते रहिये और सोचिये कि ये सारे बापूजी के एजेंट हैं । हम बापूजी के साधकों को कोई शिकायत नहीं हैं ।

मीडिया के कुछ लोग सीधे नाम लेकर या बिलकुल अपमानित तरीके से बापूजी का नाम लेते हैं । हमें कोई शिकायत नहीं हैं । फिर हिन्दू धर्मसभा के सारे संतो के भाषण सुनिए और फिर सोचिये कि हिन्दू धर्म सभा के अध्यक्ष पद पर सभी संतो ने बापूजी को ही क्यूँ चुना ।

बापूजी के छः करोड़ पंजीकृत साधक हैं । वो तो सब पागल हैं । 325 आश्रम 1225 समितिया का सञ्चालन सब पागल लोग कर रहें हैं । छः करोड़ साधक पागल हैं और आश्रम से निकाले कुछ चालीस के आसपास लोग और बिकी हुई मीडिया के दस या बारह लोग एक साथ ज्ञान शिरोमणि हो गए हैं ।

मीडिया को तो हम सब जानते हैं । हम सब के हित के लिए एक तथ्य हैं कि दुर्योधन और शकुनी की बात छोडो , स्वयं सारे यदुवंशी भी कृष्ण को अंत तक नहीं समझ पाए । सब हमारे जैसे सोचे ये संभव नहीं हैं । हम बापूजी के साधकों को थोड़ी सहनशक्ति बढ़ा लेनी चाहिए और सबमे एक ही इश्वर देखना चाहिए । बाकी सब समय के साथ साथ सही हो जाता हैं । मैं जानता हूँ नए साधक के लिए थोडा भावुक होना संभव हैं ।
I suggest that First check everything by yourself about bapuji's pupils । For exmaple this blame of bapuji is totally fake । If two child are died due to drowning in river then even the principal is not accountable for it । You have seen so many news that 45 child were died due to bus falling in river but there is no action . But here is a big game of blame .

This is all done by christian missionary to blame some hindu saints from five years like baba ramdev , shankaracharya , kripaluji & shri satya sai baba . Anyway still if anybody or even nobody is agree with me then also i have no problem .
May bapuji bless you best moments .
सबका मंगल सबका भला हो ।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

ब्रज यात्रा भाग एक - ब्रज परिचय संक्षेप

ब्रज चौरासी सदा से ही प्रेमाभक्ति के साधकों के लिए आदर्श रहा हैं । ब्रज चौरासी कोस में फैला हुआ हैं । चौरासी कोस यानि लगभग दो सौ किलोमीटर का परिमाप (circumference) हैं ब्रज का ।

ब्रज के चार प्रमुख स्थान हैं :-

मथुरा ,वृन्दावन , राधा कुंड और गिरिराज जी । इन्ही के इर्द गिर्द सारे ब्रज के धाम, मंदिर, आश्रम आदि हैं ।

इस पोस्ट के कई भाग होंगे क्योंकि आपको पता हैं की ब्रज के बारे में तो इतनी सामग्री हैं कि शायद एक पूरी जिंदगी बीत जायेगी । इसका एक पहलू ये भी देखिये जिससे कि आपको लगेगा कि मैं सच बोल रहा हूँ ।

अकेले वृन्दावन धाम में ही पांच हज़ार से ज्यादा मंदिर माने जाते हैं । हर पोस्ट में मैं तीन चार धार्मिक स्थलों के बारे में लिखता रहूँगा जिससे आपको सही और विस्तृत जानकारी मिलती रहे । कही कोई सुधार कि गुंजाईश हो तो कृपया मुझे मेल करना ।

वैसे इश्वर के सभी धाम समान होते हैं पर कबीर जी का ये दोहा साक्ष्य मानकर ब्रज को सर्वोपरि माना जाता हैं

" सब घाट मेरा सईंया खाली घट ना कोई

बलिहारी वो घट कि जा घट प्रगट होई "


और एक श्रीकृष्ण भक्त के श्रीमुख से सुना था कि धार्मिक पुण्यता के क्रम से सर्वोपरि स्थान ब्रज का हैं , ब्रज कि मथुरा सब अन्य गैर ब्रज धार्मिक स्थलों से पुण्यदायी हैं । मथुरा से भी ज्यादा पुण्य दाई भूमि भगवान् कृष्ण कि लीलास्थली वृन्दावन हैं और वृन्दावन से भी श्रेष्ठ श्री गिरिराज जी महाराज हैं । और इन सबमे सर्व पुण्यदायक ब्रज का सिरमौर श्री राधाकुंड हैं । अर्थात दुनिया का सबसे अधिक महत्त्व का कोई तीर्थ या धाम हैं तो वो राधा कुंड हैं । खैर अभी पहली पोस्ट हैं अगली पोस्ट में एक एक करके वर्णन करता जाऊंगा ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...