बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
लुव कुश रामायण ( रामानंद सागर निर्मित रामायण में से भजन )
यह भजन हमें सिखाता हैं कि जो स्वयं जगदम्बा श्री लक्ष्मी हैं । सब वैभवो और ऐश्वर्यों कि स्वामिनी हैं , वो खुद मनुष्य रूप में कितने अभाव और समाज की अन्याय पूर्ण व्यवस्थाओं का सामना करती हैं ।
लुव कुश कहते हैं
काल चक्र ने घटना क्रम में ऐसा चक्र चलाया
राम सिया के जीवन में फिर घोर अँधेरा छाया
अवध में ऐसा , ऐसा इक दिन आया
निष्कलंक सीता पे प्रजा ने मिथ्या दोष लगाया
चल दी सिया जब तोड़ नेह नाते मोह के
पाषाण हृदयों में ना अंगारे जगे विद्रोह के
ममतामई माओं के आँचल भी सिमट कर रह गए
गुरुदेव ज्ञान और नीति के सागर भी खट कर रह गए
ना रघुकुल ना रघुकुल नायक
कोई ना सिया का हुआ सहायक
मानवता को खो बैठे सब सभ्य नगर के वासी
तब सीता को हुआ सहायक वन का एक सन्यासी
उन ऋषि परम उदार का बाल्मीकि शुभ नाम
सीता को आश्रय दिया ले आये निज धाम
रघुकुल में कुलदीप जलाये , राम के दो सुत सिय ने जाए
फिर लव कुश कहते हैं " श्रोतागण जो एक राजा की पुत्री हैं एक राजा की पुत्रवधू हैं और एक चक्रवर्ती राज़ा की पत्नी हैं ।वही महारानी सीता वनवास के दिनों में अपने दुःख कैसे काटती हैं । फिर स्वाभिमान की रक्षा करते हुए किसी से सहायता मांगे बिना अपना काम वो स्वयं करती हैं । स्वयं वन से लकड़ी काटती हैं, स्वयं अपना धान कूटती हैं , स्वयं अपनी चक्की पीसती हैं । और अपनी संतान को स्वावलम्बी बनने कि शिक्षा कैसे देती , आप उसकी एक करुण झांकी देखिये :-
जनकदुलारी कुलवधू दशरथ जी की राजरानी हो के दिन वन में बिताती हैं
रहते थे घेरे जिसे दास दासी आठो याम दासी बनी अपनी उदासी को छुपाती हैं
धर्म प्रवीना सती परमकुलीना सब विधि दोष हीना जीना दुःख में सिखाती हैं
जग माता हरिप्रिया लक्ष्मीस्वरूपा सिया कूटती हैं धान भोज स्वयं बनाती हैं
कठिन कुल्हाड़ी ले के लकडिया काटती हैं, करम लिखे को पर काट नहीं पाती हैं
फूल भी उठाना भारी जिस सुकुमारी को था दुःख भरे जीवन का बोझ वो उठाती हैं
अर्धांगिनी रघुवीर की वो धरी धीर भरती हैं नीर नीर जल में मिलाती हैं
पिस के प्रजा के आप वादों के कुचक्र में वो पीसती हैं चाकी स्वाभिमान को बचाती हैं
पालती हैं बच्चों को वो कर्मयोगिनी की भांति स्वावलम्बी स्वाभिमानी सबल बनाती हैं
ऐसी सीता माता की परीक्षा लेते दुःख देते निठुर नीयति को दया भी नहीं आती हैं
हो उस दुखिया के प्राणों से प्यारे हम ही सुत श्री राम तिहारे
सीता माँ की आँखों के तारे लव कुश हैं पितु नाम हमारे
हे पितु भाग्य हमारे जागे राम कथा कही राम के आगे
भजन - लुव कुश द्वारा श्रीराम को उलाहना (सन्दर्भ फिल्म सम्पूर्ण रामायण से )
इस भजन या गीत कि पंक्तियाँ एक पुरानी फिल्म " सम्पूर्ण रामायण " फिल्म से ली गयी हैं हैं। इस फिल्म में दारा सिंह हुनमान बने थे । भजन कि पृष्ठभूमि ये हैं कि जब लव कुश को पता चला कि श्री राम अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं तो वे दोनों अयोध्या पहुँच कर भजन के रूप में स्त्रिओं की दुर्दशा का वर्णन करते हैं । भजन जन शुरू होता हैं तो उस समय मंत्रोच्चार चरम पर होता हैं । पर जैसे ही लव कुश के स्वर तीव्र होते हैं तो सभी और स्वयं श्री हरि भगवान् राम उठकर लव कुश का करुणापूर्ण भजन सुनते हैं ।
भजन ये हैं
हम रामचंद्र की चन्द्र कला में भी कलंक दिखलाते हैं
नारी के आसुओं से लिखी रामायण तुम्हे सुनाते हैं
इन तारो से अंगारों से झंकार नई सुनवाते हैं
ये श्लोक नहीं अत्याचारों के अग्निवेद हम गाते हैं
भारत की सीताओं के दुखड़े जब तक होंगे चूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण तब तक होगी सम्पूर्ण नहीं
जब पुरुष परीक्षाये लेगा नारी में दोष निकालेगा
सती पर विश्वास नहीं करके , अग्नि में उन्हें डालेगा
नारी पर ज्वाला की ये लपटे होंगी भूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण तब तक होंगी सम्पूर्ण नहीं
जब राम राज्य के निर्माता , धोबी की बात में आयेंगे
भारत भविष्य की माता को धोखे से वन में ठुकरायेंगे
तब तक कवि बाल्मीकि की लेखनी होगी परिपूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण
पुरुषों की नीति अनीति बनी चलती हैं,नारी के पावन जीवन को छलती हैं
तो सृष्टि सभ्यता की संध्या ढलती हैं,जब स्वयं ज्वाल में जगदम्बा जलती हैं
ज्वाल में जगदम्बा जलती हैं,
भजन ये हैं
हम रामचंद्र की चन्द्र कला में भी कलंक दिखलाते हैं
नारी के आसुओं से लिखी रामायण तुम्हे सुनाते हैं
इन तारो से अंगारों से झंकार नई सुनवाते हैं
ये श्लोक नहीं अत्याचारों के अग्निवेद हम गाते हैं
भारत की सीताओं के दुखड़े जब तक होंगे चूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण तब तक होगी सम्पूर्ण नहीं
जब पुरुष परीक्षाये लेगा नारी में दोष निकालेगा
सती पर विश्वास नहीं करके , अग्नि में उन्हें डालेगा
नारी पर ज्वाला की ये लपटे होंगी भूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण तब तक होंगी सम्पूर्ण नहीं
जब राम राज्य के निर्माता , धोबी की बात में आयेंगे
भारत भविष्य की माता को धोखे से वन में ठुकरायेंगे
तब तक कवि बाल्मीकि की लेखनी होगी परिपूर्ण नहीं
हे राम तुम्हारी रामायण
पुरुषों की नीति अनीति बनी चलती हैं,नारी के पावन जीवन को छलती हैं
तो सृष्टि सभ्यता की संध्या ढलती हैं,जब स्वयं ज्वाल में जगदम्बा जलती हैं
ज्वाल में जगदम्बा जलती हैं,
इश्वर प्रार्थना और भजन
हरि हर शरणम्
हे हरिमैं आपकी शरण हूँ । अब समय आ गया है की आप मेरा उद्धार कर दें । अब मुझमे इतनी ताकत नहीं बची किदुनिया से संघर्ष करू या आपकी इस शरीर से सेवा कर सकूँ । आप ही तो कहते हो कि जब मुझे कोई पुकारता है तो मैं आ जाता हूँ । इस संसार में अपनी इच्छा पूर्ति करते करते मैं तंग आ चुका हूँ ।
आप तो सब जानते हैं फिर क्यों जानकार भी अनजान बने हुए हैं । कुछ लोग जो धर्म में नए नए हैं हैं वो भी कहते हैं की वो अपने इष्ट से बात करते हैं । हमें तो प्रभु कोई पूर्वाग्रह नहीं की आप गुरु ,कृष्ण या हरि या शिव बनकर आये अगर आप चाहते हैं की आप मुझे कुछ और बनकर दर्शन देना चाहते हैं तो हम अपनी कल्पना को वैसा
बस बार बार यही दुआ करते हैं की कभी तो हम पर दया करो । बनाने को भी तैयार हैं । हम तो अपनी सोच आप पर लाद ही नहीं रहे हैं
आपके लिए बस सिर्फ ये ही पंक्ति याद आती है
" झूमे झुके कभी न बरसे कैसे हो तुम घनश्याम
कब लोगे शरण मेरे राम
चलते चलते मेरे पग हारे आई जीवन की श्याम
कब लोगे शरण मोरे राम
कहते हैं तुम हो दया के सागर
फिर क्यूँ खाली मेरी गागर
सुन के जो बहरे हो जाओगे
आप ही छलिया कहलाओगे
मेरी बात बने न बने हो जाओगे तुम बदनाम
हे राम हे राम
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
जिंदगी प्यार का गीत हैं
लता मंगेशकर की आवाज़ में पद्मिनी कोल्हापुरे पर फिल्माया ये गीत वाकई जिंदगी के उतार चढाव दिखाता हैं ।
गीत के बोल हैं
जिंदगी प्यार का गीत हैं , इसे हर दिल को गाना पड़ेगा
जिंदगी गम का सागर भी हंस के उस पार जाना पड़ेगा
जिसका जितना हो आँचल यहाँ पर उसको सौगात उतनी मिलेगी
फूल जीवन में ना खिले तो कांटो से भी निभाना पड़ेगा
हैं अगर दूर मंजिल तो क्या रास्ता भी मुश्किल हैं तो क्या
रात तारों भरी ना मिले तो दिल का दीपक जलाना पड़ेगा
जिंदगी एक पहेली भी हैं सुख दुःख की सहेली भी हैं
जिंदगी एक वचन भी तो हैं जिसे सबको निभाना पड़ेगा
(किशोर कुमार के स्वर में)
गीत के बोल हैं
जिंदगी प्यार का गीत हैं , इसे हर दिल को गाना पड़ेगा
जिंदगी गम का सागर भी हंस के उस पार जाना पड़ेगा
जिसका जितना हो आँचल यहाँ पर उसको सौगात उतनी मिलेगी
फूल जीवन में ना खिले तो कांटो से भी निभाना पड़ेगा
हैं अगर दूर मंजिल तो क्या रास्ता भी मुश्किल हैं तो क्या
रात तारों भरी ना मिले तो दिल का दीपक जलाना पड़ेगा
जिंदगी एक पहेली भी हैं सुख दुःख की सहेली भी हैं
जिंदगी एक वचन भी तो हैं जिसे सबको निभाना पड़ेगा
(किशोर कुमार के स्वर में)
ज़िन्दगी एक अहसास हैं टूटे दिल की कोई आस हैं
ज़िन्दगी एक बनवास हैं काट कर सबको जाना पड़ेगा
ज़िन्दगी बेवफा हैं तो क्या अपने रूठे हैं हमसे तो क्या
हाथ में हाथ ना हो तो क्या साथ फिर भी निभाना पड़ेगा
ज़िन्दगी एक मुस्कान हैं दर्द की कोई पहचान हैं
ज़िन्दगी एक मेहमान हैं छोड़ संसार जाना पड़ेगा
मेरा जीवन कोरा कागज़
जया भादुड़ी पर फिल्माया ये गीत दर्द के नगमो में से एक हैं । ये गीत उनके लिए जिन्हें जिंदगी में अधूरे विकल्प से ही जीवन बिताना होता हैं । 1974 में बनी इस "कोरा कागज़ " फिल्म के शीर्षक गीत को आवाज़ दी हैं किशोर कुमार ने । इस फिल्म की कहानी ये हैं की एक घमंडी और अमीर माँ की बेटी जया अपने अहम के कारन अपने संवेदनशील प्रोफेसर पति विजय आनंद से अलग हो जाती हैं । दस पन्द्रह साल अलग रहने के बाद जया भ्दुदी की मनोदशा व्यक्त करती ये पंक्तिया हैं
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया
जो लिखा था आसुओं के संग बह गया
एक हवा का झोंका आया टूटा डाली से फूल
ना पवन की ना चमन की किसी की हैं ये फूल
खो गयी खुशबू हवा में कुछ न रह गया ,मेरा जीवन .........
उड़ते पंछी का ठिकाना मेरा ना कोई जहाँ
ना डगर हैं ना खबर हैं जाना हैं मुझको कहाँ
बन के सपना हमसफर का साथ रह गयामेरा जीवन .......
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया
जो लिखा था आसुओं के संग बह गया
एक हवा का झोंका आया टूटा डाली से फूल
ना पवन की ना चमन की किसी की हैं ये फूल
खो गयी खुशबू हवा में कुछ न रह गया ,मेरा जीवन .........
उड़ते पंछी का ठिकाना मेरा ना कोई जहाँ
ना डगर हैं ना खबर हैं जाना हैं मुझको कहाँ
बन के सपना हमसफर का साथ रह गयामेरा जीवन .......
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
दैनिक कड़ियाँ भाग दो
बचपन से लेकर आज तक कई बयान या खबरे हमें बहुत ही बोर करती हैं ।हमें पता नहीं इनकी आदत सी हो जातीहैं । पर सच में ये हमारे देश का दुर्भाग्य हैं की हमें ये सब झेलना पड़ता हैं
जैसे
कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं ।
हालाँकि सेना हटाकार देखें कितना कश्मीर हमारा हैं । और जो सेना के अधिकार क्षेत्र में हैं वह भी चालीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं ।
पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तरीय वार्ता शुरू
पता नहीं साथ सत्तर साल से किसको बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा हैं
पाकिस्तान को मुह तोड़ जवाब देंगे ।
फिर दे क्यों नहीं रहे हो
भारतीय टीम के प्रदर्शन ने देश को निराश किया ।
क्या सिर्फ ग्यारह लोग जो एक तरह से बिज़नस मैन ही हैं या चलती फिरती कम्पनी हैं । वाकई हमारे सुख दुःख में जिम्मेदार हैं । ऐसी मूर्खता हमारे देश में ही होती हैं । हम सब जानते हैं कि क्रिकेट पेशेवर खेल हैं , क्रिकेट बोर्ड का सरकार से कोई सम्बन्ध नहीं हैं फिर उनकी हार से देश को क्या घाटा हैं । जीत गए तो ठीक पर हार गए मुह छोटा करने कि क्या जरुरत हैं । ओलम्पिक खेल लगभग सीधे देश की सरकार या प्रतिष्ठा से जुड़े हैं क्योंकि इसमें देश के लोगों से प्राप्त income tax से ही सरकार ग्रांट देती हैं । क्रिकेट तो एक पैसा भी सरकार से नहीं लेता हैं । यह तो लगभग एक कम्पनी की तरह काम करता हैं ।
सरकार महंगाई पर काबू पा लेगी ।
पूरे पचास साल में जितना बेहूदापन इस बयान को लेकर हुआ हैं वो अपने आप में रिकॉर्ड हैं । सबसे ज्यादा गैर जिम्मेदार बयान इसी मुद्दे को लेकर होते हैं । सरकार पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने के लिए बहाने बनाती हैं की कच्चे तेल की कीमत बढ़ गयी , कच्चे तेल की कीमत अगर पांच प्रतिशत बढती हैं तो सरकार पांच रुपये बढ़ा देगी लेकिन अभी एक साल पहले आर्थिक मंदी के वजह से कच्चे तेल की कीमत पचास प्रतिशत गिरी तो सरकार ने बस पांच रुपये ही घटाए । और एक महत्वपूर्ण बात यह हैं की जब तेल की कीमत बढती हैं तो सब चीज़ों के कीमत बढती हैं क्योंकि सारा सामान वाहनों से ही लाया जाता हैं । लेकिन जब तेल की कीमत घटती हैं तो भी दूसरी चीज़ों की कीमत घटती नहीं हैं क्योंकि इस पर नियंत्रण का काम सरकार का हैं और वो कभी भी इस पर नियंत्रण नहीं करती हैं , बस एक तरफ़ा तेल कम्पनिओं को फायदे के हित के लिए नीतियां अपनाती हैं .
जैसे
कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं ।
हालाँकि सेना हटाकार देखें कितना कश्मीर हमारा हैं । और जो सेना के अधिकार क्षेत्र में हैं वह भी चालीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं ।
पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तरीय वार्ता शुरू
पता नहीं साथ सत्तर साल से किसको बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा हैं
पाकिस्तान को मुह तोड़ जवाब देंगे ।
फिर दे क्यों नहीं रहे हो
भारतीय टीम के प्रदर्शन ने देश को निराश किया ।
क्या सिर्फ ग्यारह लोग जो एक तरह से बिज़नस मैन ही हैं या चलती फिरती कम्पनी हैं । वाकई हमारे सुख दुःख में जिम्मेदार हैं । ऐसी मूर्खता हमारे देश में ही होती हैं । हम सब जानते हैं कि क्रिकेट पेशेवर खेल हैं , क्रिकेट बोर्ड का सरकार से कोई सम्बन्ध नहीं हैं फिर उनकी हार से देश को क्या घाटा हैं । जीत गए तो ठीक पर हार गए मुह छोटा करने कि क्या जरुरत हैं । ओलम्पिक खेल लगभग सीधे देश की सरकार या प्रतिष्ठा से जुड़े हैं क्योंकि इसमें देश के लोगों से प्राप्त income tax से ही सरकार ग्रांट देती हैं । क्रिकेट तो एक पैसा भी सरकार से नहीं लेता हैं । यह तो लगभग एक कम्पनी की तरह काम करता हैं ।
सरकार महंगाई पर काबू पा लेगी ।
पूरे पचास साल में जितना बेहूदापन इस बयान को लेकर हुआ हैं वो अपने आप में रिकॉर्ड हैं । सबसे ज्यादा गैर जिम्मेदार बयान इसी मुद्दे को लेकर होते हैं । सरकार पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने के लिए बहाने बनाती हैं की कच्चे तेल की कीमत बढ़ गयी , कच्चे तेल की कीमत अगर पांच प्रतिशत बढती हैं तो सरकार पांच रुपये बढ़ा देगी लेकिन अभी एक साल पहले आर्थिक मंदी के वजह से कच्चे तेल की कीमत पचास प्रतिशत गिरी तो सरकार ने बस पांच रुपये ही घटाए । और एक महत्वपूर्ण बात यह हैं की जब तेल की कीमत बढती हैं तो सब चीज़ों के कीमत बढती हैं क्योंकि सारा सामान वाहनों से ही लाया जाता हैं । लेकिन जब तेल की कीमत घटती हैं तो भी दूसरी चीज़ों की कीमत घटती नहीं हैं क्योंकि इस पर नियंत्रण का काम सरकार का हैं और वो कभी भी इस पर नियंत्रण नहीं करती हैं , बस एक तरफ़ा तेल कम्पनिओं को फायदे के हित के लिए नीतियां अपनाती हैं .
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...