बुधवार, 12 मई 2010

ईश्वर और अल्लाह एक और हम हिन्दू मुस्लिम ब्लॉगर ,,पुनर्जन्म

वैसे मैं इन हिन्दू मुस्लिम बन्दों से थोडा दूर रहता हूँ क्योंकि मेरे जैसा भावुक व्यक्ति हर समय बेमतलब ईश्वर प्रेम को बीच में ले आता हैं अभी दो तीन हफ्ते से शायद सावरकर जी पर हिन्दू मुस्लिम जगत में पुनर्जन्म को लेकर काफी बहस हो रही हैं हमेशा की तरह कुंवरजी को भी इस चीज़ ने परेशान किया होगा और वो भी मजबूर हो गया होगा क्योंकि हम मनुष्य हैं एक हद तक ही किसी चीज़ को सहन कर सकते हैं इसी कड़ी में मैं मुझे भी लिखना पड़ गया

हालाँकि मेरे जैसे काम चलाऊ ब्लॉगर की टिपण्णी से कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ता लेकिन पुनर्जन्म और हिन्दू मुस्लिम मुद्दा क्या हम लोगो को पूरा पूरा पता हैं ? मुझे तो सच बताऊ ये आप सबका एक मनोरंजन का जरिया लगता हैं खुद जब कृष्ण कहते हैं की ऐसा कभी नहीं हुआ हैं की हम ना रहे हों , हम सब सदा रहते हैं . अब कोई सोचे सावरकर का पुनर्जन्म अगर पाकिस्तान आदि देश में हो तो इसका मतलब यही तो हैं की एक पिछले जन्म का हिन्दू अब मुस्लिम परिवार में जन्म ले रहा हैं . अर्थ ये हुआ की जीव किसी धर्म या देश की परिधि में नहीं आता . वो हमेशा रहता हैं

मेरे जैसे भावुक व्यक्ति के लिए तो टिपण्णी करना बड़ी मुसीबत हैं . टिपण्णी करने जाता हूँ और ब्लोग्पोस्ट से भी लम्बी हो जाती हैं . अभी आज भी ऐसा ही हुआ हैं, फिर मैंने टिपण्णी हटा दी नहीं तो हरदीप के पेज लोड होने में ज्यादा समय लगेगा . पी सी हैंग हो सकता हैं , गलती मेरी होती और कोसा हरदीप को जाता . हरदीप की पोस्ट ये हैं
http://hardeeprana.blogspot.com/2010/05/blog-post_11.html

मैं पहले हिन्दू मुस्लिम भाइयो से कहना चाहता हूँ की क्या उनकी ईश्वर अल्लाह से सीधी बात हो चुकी हैं कि आप ब्लॉग पर भी ये घृणित सम्वाद फैलायेंगे और वो आपसे नाराज़ नहीं होगा , क्या ईश्वर और अल्लाह दो अलग चीज़ें हैं और इनके अलग अलग ऑफिस हैं मैं अपने जीवन में बहुत ज्यादा धर्म से जुड़ा और जितनी मेहनत इंजीनियरिंग में और मैनेजमेंट पर की उससे कही ज्यादा सिर्फ धर्म को समझने पर की हम कुछ लोग जो आपस में चैट के थ्रू बात करते हैं , वो जानते हैं की कैसे कुछ मुस्लिम भाइयो ने ईश्वर प्रेम ( रसखान ,राबिया , शरमत ने हिन्दू धर्म के ब्रह्म ज्ञान को अपनाया ) और कुछ पूर्ण ईश्वर प्राप्त हिन्दुओ ने मुस्लिम धर्म में भी ईश्वर का सच्चा सार बताया ऐसे और भी बहुत सी बाते हैं जो मैं दस या पंद्रह साल से देखता रहा हूँ इतना लिखा जा सकता हैं सबमे प्यार बनाये रखने के लिए मुझे तो सच में आंसू जाते हैं जब एक दुसरे के धर्म को बिना जाने बस छुरी चाकू लेकर पोस्ट मार्टम पर उतर जाते हैं हम लोग .

अगर सच में धर्म की रक्षा सिर्फ ब्लॉग की टिपण्णी से हो रही होती तो पांच साल पहले तो हिन्दू मुस्लिम धर्म शायद खतरे में होते ये हमारा मानवीय स्वाभाव और कलयुग का समय चीजों को समझने नहीं देता मैं शरीर से एक हिन्दू होने के कारन सारे अपने ग्रंथो को पढता गया और जीवन में उतारता भी गया मुझे कहीं किसी हिन्दू धर्म की पुस्तक में नहीं लिखा दिखा कि मुस्लिम से घृणा करो ये सिर्फ कुछ बुरे लोग मुस्लिम धर्म में आये उनसे मैं नफ़रत तो खैर नहीं बस ये सोचूंगा कि इनका रास्ता अलग मेरा अलग , अगर कही कुछ गलत लगा तो जरुर विरोध करूँगा पर मुस्लिम मुस्लिम नहीं चिल्लाऊंगा

सहिष्णु
हिन्दू होना ख़राब लगता हैं और लगता हैं कि ऐसे तो हिन्दू संकट में हैं तो पहले हिन्दू संतो या हिन्दू ईश्वर राम कृष्ण से भी पूछ कर देखा तो यही जवाब आया कि जो हिन्दू मुस्लिम मुद्दों पर लड़ते हैं उन्हें अभी मेरी ( ईश्वर की ) ताकत का पता नहीं हैं मैं अपने साथ पढ़े मुस्लिम दोस्तों से बात करता हैं , उनमे से कई तो खुद में भी गहरा अपराध बोध लिए हुए रहते हैं कि कुछ बुरे लोगो कि वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ रही हैं और देखिये क्या हमें राज ठाकरे जैसे घ्रणित राजनीति करने वाले हिन्दू पसंद हो सकते हैं

हम
सबका दर्द एक हैं फिर क्यों हम एक दुसरे को बेमतलब तंग कर रहे हैं मुझे सुरेश चिपलूनकर जी के लेख बहुत अच्छे लगते थे क्योंकि उनमे कोंग्रेस सरकार की हरामखोरी कि बाते सच थी पर वहा भी मेरे जैसे भाइयो ने बस टिपण्णी में लड़ाई झगडा शुरू कर दिया तो वो भी मैंने पढना बंद कर दिया

अब
रही बात पुनर्जन्म की , सिर्फ सच ही बोलूँगा कुछ घुमा फिराकर नहीं कोई भी व्यक्ति हो , जब तक वो मुक्त या ईश्वर अल्लाह को प्राप्त नहीं होगा उसका पुनर्जन्म होगा चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम हो या ईसाई , और ये धार्मिक विचार हैं , मुझे आपकी टिपण्णी का लोभ नहीं , और ये धार्मिक मंच हैं यहं गप्प लगाना अपने पुण्यो का नाश करना हैं । और पूरी जिम्मेदारी लेनी पड़ती हैं अपने कहे हुए की । मुझे ख़ुशी हैं की मैं ऐसे गुरु अपने बापूजी संत श्री आशारामजी का शिष्य हूँ जिसने मुझे विपरीत परिस्थिति में भी अकेला पड़ जाने पर गलत और सही का विवेक करना सिखाया । जिनसे सारे संत स्नेह करते हैं ये निर्णय जिसने लिखवाया वो ही आपको समय के साथ आगे बढ़ाएगा एक विदेशी महिला जो हमारे देश को जानती नहीं एक युवक जो उसका बेटा हैं दोनों शायद कुछ भी नहीं जानते हमारे देश के बारे में फिर भी अपने पुनर्जन्मो के कारन राष्ट्र के सर्वेसर्वा हैं नहीं क्या आपको नहीं लगता कि सिर्फ दो लोगो के हाथ मेरा पूरा देश और क्या योग्य व्यक्ति नहीं होंगे हमारे देश में

अपने
जीवन को पहले थोडा ईश्वर से जोड़े अल्लाह से जोड़े फिर हिन्दू मुस्लिम से जोड़े , शब्दों के बजाय भाव से कहे कोरे शब्दों से ज्ञान नहीं मिलता टिपण्णी रुपी माया के चक्कर में ना आये यह कहीं का ना छोड़ेगी आपके श्री चरणों में ईश्वर का एक पैगाम आपके पुण्य हैं जो इश्वर ने मुझे विवश किया धन्य हैं आप लोग . but please dont try to judge me as something may be beyond dimension of your perception . आपकी सेवा समाज के बड़े काम आने वाली हैं

और ये सब बाते मैं जानता हूँ कि आप शायद छः लोग ही पढेंगे सिर्फ आपके लिए हैं ,हरदीप , श्री समीर लाल सर , वंदनाजी , संजीव राना , कुलवंत हैप्पी ( शायद ) और अब जो मैं जानता ही नहीं कौन हैं वो नोर्वे में हैं और ओस्ले शहर में रहते हैं , कृपया वो कभी तो मुझे मेल करे , उनको थैंक्स बोलना हैं
virender.zte@gmail.कॉम

वैसे किसी को भी मेरे विचार पसंद ना हो तो मुझे बुरे शब्द लिख कर भेज सकते हैं मैंने टिपण्णी मोडरेशन नहीं लगाया हैं । पर कभी तो सोचो " एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौन मंदे "

मंगलवार, 11 मई 2010

प्यार पर कविता -भाग आठ

इससे पिछली कविता का लिंक हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_09.html

आठवी कविता

वो कभी मेरे पास तो आये , मेरे लिए बाहे फैलाये
मेरी गोद में सर रख कर मुझसे रूठे तो सही
हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे ताने दे तो सही
मैं फिराऊ उसके बालो में हाथ वो रोये तो सही

जितनी वो नाराज हो उतने प्यार से मैं मनाता जाऊ
आँखों से फिसले गालो पर उसके आंसू हटाता जाऊ
जब जी भर जाये उसका मुझसे झगड़कर
बस फिर चुप हो जाये वो मुझसे लिपटकर

तब मैं खोलू राज कि मैं ही तेरी दुखी दुनिया का हल था
ईश्वर का भेजा हुआ मैं तेरे सारे पुण्यो का फल था
सिर्फ तुम्हे आस्तिक बनाने को एक झोंका आया था
बुरी लड़की में भी छिपा एक साधक का साया था

अब तुझसा प्यारा ना कोई बैकुंठ द्वारा था
एक हरि पार्षद सिर्फ तेरे उद्धार के लिए उतारा था
तू सिर्फ इंतज़ार कर वो घड़ियाँ आने वाली हैं
जब भीगी तेरी पलके ये कहने वाली हैं

तुम सब जानते थे तो पहले अपनाया क्यों नहीं
मैं तो नालायक थी तुमने लायक बनाया क्यों नहीं
जब इतनी तैयारी कर चुके थे तो बताया क्यों नहीं
चाहती तो मैं भी यही थी पर तुमने फिर कहलवाया क्यों नहीं

माफ़ कर दो मुझे मैं जाने क्या क्या समझ गयी
वीरेन तुम्हारा सच्चा प्यार पाने को मैं अब तरस गयी


बस अभी के लिए इतना ही , आशा करता हूँ कि ईश्वर आपको इन पंक्तियों का अर्थ समझाए जो खुद मुझे भी ज्यादा स्पष्ट नहीं हैं । आप समझ पाए तो मुझे भी समझा दे । प्रेम सच में रहस्य हैं , आपको पता नहीं चलता कि आपसे ईश्वर क्या करवा रहा हैं । खैर उसका अपना विधान हैं , हमें तो बस उसी कि आज्ञा माननी हैं । बस वो लिखवा दे , हम तो सिर्फ माध्यम हैं । ज्यादा नहीं लिखूंगा नहीं तो कृष्ण नाराज़ होंगे कि ये बेवक़ूफ़ खुद को बीच में ले आया ।
खैर किसी की जिंदगी का दुःख आपके श्री चरणों में मनोरंजन के लिए अर्पित हैं .

रविवार, 9 मई 2010

प्रेम कविता - भाग सात

अब वैसे इतनी कविता लिखने के बाद किसी भूमिका क़ी जरुरत तो नहीं हैं । बेहतर यही हैं कि जो आप में से कोई इस कडी क़ी कविता पहली बार पढ़ रहे हैं , वो छठा भाग भी नीचे दिए लिंक से पढ़ ले । हर भाग में पिछले भाग का क्रमांक दिया हैं जिससे इस थीम का मूल स्वरुप बरक़रारऔर इससे पिछले भागो का भी कविता दर कविता लिंक हैं। ।
छठा भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html

सातवी कविता
क्यों प्यार ना करू तुझे क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं
भक्ति जैसा प्यारा भाव मेरा कोई वासना का नरक नहीं

तेरी हर इच्छा पूरी करना मेरी मजबूरी हैं
तेरा हो जाना बस अब मेरे लिए जरुरी हैं
नहीं तो तू जी भी नहीं पायेगी
प्यार का उजाले से दूर हो अंधेरो में खो जाएगी

हे हरि कभी इतना तो बताओ मुझमे क्या कमी थी
स्वार्थ ना अपना देख पाया क्योंकि आँखों में नमी थी
कभी तो जिंदगी में उसके आने का वादा हो
जीवन में अब तो दुःख कम और सुख ज्यादा हो

क्या बेटा बाप से भक्ति ले नहीं सकता
ऐसा क्या हैं जो तू दे नहीं सकता
क्या मेरे टूटने पर तुझे ख़ुशी हो रही हैं
हँसता मैं अपनी मौत पर और जिंदगी रो रही हैं

क्यूँ कर सकता मैं उसके सपनो का श्रृंगार नहीं
क्यों पड़ सकता मेरे गले में उसकी बाहों का हार नहीं
क्या करे जब उसके लिए सब ख़त्म हो जाये
दुःख क़ी रात बीती ना हो और सुबह मातम हो जाये
कौन प्रेम को बिना टूटे सह पाया हैं
सब चुप हो गए बस " वीरेन "कह पाया हैं

शनिवार, 8 मई 2010

प्रेम को समर्पित कविता ( ईश्वर प्रेम )-भाग छः

अब तक मैंने प्रेम के ऊपर पांच कविताये लिखी हैं । इनको भागो में इसीलिए बना रहा हूँ कि मुझे प्यार पर अगर खुद भी ढूंढना पड़े तो आसानी से लिंक मिलता जाये । विषय क्योंकि मुझसे , ईश्वर से और उस लड़की से प्रेरित हैं इसीलिए ये सांझी थीम रखने के लिए भाग क्रमांक देना जरुरी हैं , इससे भाव की तारतम्यता बनी रहेगी और कविता दर कविता बात आगे बढ़ेगी । किसी और विषय पर होता तो मैं भाग नहीं डालता ।
ऐसा मैं इसीलिए भी कर रहा हूँ कि मैं खुद इतनी गहरी प्रेम कि मनोदशा में उतरा हूँ कि हर बात को जोड़ने कि कोशिश करता हूँ । मुझे सच कहू तो किसी को खुश रखने के लिए या ब्लॉग पर भी डालने कि दिलचस्पी नहीं हैं क्योंकि ये मेरे जैसे धार्मिक व्यक्ति के लिए ही बहुत समस्या कड़ी कर रहा हैं । खुद ईश्वर कि तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही हैं , कई मेरे गुरु भाईओं ने मुझे कहा कि ये मैं क्या व्यभिचार जैसा कुछ रच रहा हूँ , मतलब वो मुझे कोई छिछोरा समझ बैठे हैं । खैर जीवन भी अजब पहेली हैं । हमें कोई नहीं समझ सकता और फिर हम क्यों किसी को समझे । बस जैसी जिंदगी आये जी लो उसे । प्यार तो वैसे ही बहुत ही सच्चे और धैर्यवान लोग करते हैं । कुछ लोग जो प्यार को judge करने की कोशिश करते हैं , वो कभी प्यार को जानते नहीं हैं । यह तो गूंगे को गुड का स्वाद पूछने वाली बात हैं । आप तबाह हो जायेंगे अगर आपको प्यार हो गया तो । यहाँ कृपया फ़िल्मी प्यार को थोडा दूर रखे क्योंकि वहां तो सारा व्यभिचार हैं और इसीलिए मेरे साधक भाई बहन मुझे गलत समझ रहे हैं । खैर हे हरि हम तेरी शरण हो , तेरी मर्ज़ी पूरण हो ।
पांचवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

आज की कविता
हे हरि ! तेरे द्वार का मैं भिखारी बन जाऊ
तेरे तरस खाकर वो मुक्ति का सिक्का पाऊ
सुना हैं तेरे प्रेम से जीवन का मोल दिख जाता हैं
बस तुझे चाहने से सौदा सस्ते में निभ जाता हैं

राधा जी जितना तो मैं तेरा प्रेमी नहीं हूँ
मीरा जी जितना तो मैं भजन नेमी नहीं हूँ
मेरा तो मन पल पल तुमसे डिग जाता हैं
बस थोड़े दुःख से ही हौंसला हिल जाता हैं

हे प्रभु , तुम तो दयालु हो अब तो मुझे तार दो
मर गया प्यार के बोझ से और ना अब भार दो
क्यों किसी के प्रेम में तुने मुझे बर्बाद किया
उजाड़ी क्यों मेरी दुनिया , घर ना क्यों आबाद किया

इतनी तो मेरी हैसियत नहीं थी कि तुझे भी क्षोभ होने लगा
मेरे प्रेम की ताकत से तुझे राधा जी पाने का लोभ होने लगा
क्या पिता भी पुत्र के प्रेम में बाधक बनने आता हैं
जब दोष तेरा हो तो क्यों वीरेन व्यभिचारी कहलाता हैं ,

अभी इससे आगे तो धार्मिक रहस्य की बात हैं , वो मैं ब्लॉग पर नहीं डाल सकता हूँ । मैं मानता हूँ की मेरा हर शब्द थोडा आपको संदेह में डालता हैं की जो लिखा जा रहा हैं उसका वही अर्थ हैं या सांकेतिक हैं या ये वीरेन्द्र की कल्पना हैं । पर अब तक की सारी कविताये सच हैं हर पंक्ति का अर्थ हैं और सांकेतिक भी । अभी आज थोडा भावुकता के कारन ज्यादा लिख गया । धार्मिक रहस्य थोड़े परेशान करते हैं और सच कहू तो बस रुला डालते हैं । ईश्वर प्यार तो बहुत करता हैं पर पता नहीं क्यों साथ बैठा भी मदद नहीं करता ।

शनिवार, 1 मई 2010

सच्चा प्यार - मेरी पांचवी कविता

इस कड़ी में मेरी ये पांचवी कविता हैं । प्यार आपको ईश्वर से हो सकता हैं । अपने किसी परिवार के सदस्य से या किसी मित्र से हो सकता हैं । मुख्य बात समर्पण और त्याग की हैं । दुःख तो प्यार में हमेशा मिलेगा क्योंकि आप इसमें हमेशा अपने सुख को त्याग देते हो और सारा सुख अपने प्रियतम के लिए ही चाहते हो । हालाँकि प्रेम करना बहुत मुश्किल हैं । सच में प्रेम कभी किया नहीं जाता ये तो बस हो जाता हैं । प्रेम को कभी भी शारीरिक संपर्क की भी चाह नहीं होती । सिर्फ आपकी फीलिंग ही आपके प्रेमी में प्यार के भाव जगा देती हैं ।
प्रेम में आप अपने साथी को उसकी सारी बुराई और अच्छाई से सच्चे मन से स्वीकार कर लेते हो । बस प्रेम के लिए शब्दों की कमी पड़ जाती हैं ।
इसका थीम प्यार ही हैं और जो आज पहली बार पढ़ रहे हैं वो इसका चौथा भाग पड़े , उसमे इससे भी पिछले भाग की कविताओं का लिंक दिया हैं .
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_14.html

अब आप मेरी नयी कविता को पढ़े जो कभी मेरे जीवन में घटी थी .


क्या करू जब मेरी किस्मत सोयी, तेरे दर्शन को मेरी अंखिया रोई
पिछला जब मुझे चिंतन आता हैं, तेरा हँसता चेहरा याद आता हैं
दिल के तारो में संगीत आता हैं , जब तेरा खिलता होठ दिख जाता हैं
पतझड़ भी सावन लग जाता हैं जब तुझसा साथी मिल जाता हैं

वर्तमान का जब सुख ठुकराता हूँ , तब तुझे याद कर पाता हूँ
जब प्यार की हद खो जाता हूँ , सारी रस्मे बस तोड़ आता हूँ

प्रकृति के नियम में मैंने बदलाव किया
अपने कर्तव्य को प्यार का भाव दिया
अपनी मुक्ति खोकर तेरा बंधन थाम लिया
सिर्फ हरि के लिए सारा जीवन तेरे नाम किया

इश्वर की दया से सब वही हुआ
जैसा मैंने सोचा वो तो सही हुआ
भूत के गर्भ को भविष्य से बदल पाया था
जब तुझमे मेरी ही चेतना बनकर आया था

तेरे अपराधो की सजा मुझे गयी
तेरे आंसुओ को मेरी आँख भा गयी
पर मैं तुझे कभी समझा नहीं पाउँगा
प्रकृति के सारे रहस्य ना खोल पाउँगा
क्योंकि यहाँ ज्ञान जैसी कोई बात ही नहीं हैं
बिना शर्तो पर जो होता हैं प्यार बस वही हैं

बस इतनी सी बात पर मेरे सारे गम मिट जाते हैं
हरि इच्छा से लिपटे तेरे स्वर जब ये कह पाते हैं
"इतनी सच्चाई से तुम वीरेन सब कह जाते हो
अपने दर्द को बस तुम शांत सह जाते हो
मेरे मन को कैसे पढ़ पाते हो
जो मैंने सोचा वही कैसे बातो में ले आते हो
तुम ईश्वर का कोई रहस्य सा लगते हो
इसीलिए वीरेन तुम सबसे अच्छे लगते हो "

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...