अब वैसे इतनी कविता लिखने के बाद किसी भूमिका क़ी जरुरत तो नहीं हैं । बेहतर यही हैं कि जो आप में से कोई इस कडी क़ी कविता पहली बार पढ़ रहे हैं , वो छठा भाग भी नीचे दिए लिंक से पढ़ ले । हर भाग में पिछले भाग का क्रमांक दिया हैं जिससे इस थीम का मूल स्वरुप बरक़रारऔर इससे पिछले भागो का भी कविता दर कविता लिंक हैं। ।
छठा भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html
सातवी कविता
क्यों प्यार ना करू तुझे क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं
भक्ति जैसा प्यारा भाव मेरा कोई वासना का नरक नहीं
तेरी हर इच्छा पूरी करना मेरी मजबूरी हैं
तेरा हो जाना बस अब मेरे लिए जरुरी हैं
नहीं तो तू जी भी नहीं पायेगी
प्यार का उजाले से दूर हो अंधेरो में खो जाएगी
हे हरि कभी इतना तो बताओ मुझमे क्या कमी थी
स्वार्थ ना अपना देख पाया क्योंकि आँखों में नमी थी
कभी तो जिंदगी में उसके आने का वादा हो
जीवन में अब तो दुःख कम और सुख ज्यादा हो
क्या बेटा बाप से भक्ति ले नहीं सकता
ऐसा क्या हैं जो तू दे नहीं सकता
क्या मेरे टूटने पर तुझे ख़ुशी हो रही हैं
हँसता मैं अपनी मौत पर और जिंदगी रो रही हैं
क्यूँ कर सकता मैं उसके सपनो का श्रृंगार नहीं
क्यों पड़ सकता मेरे गले में उसकी बाहों का हार नहीं
क्या करे जब उसके लिए सब ख़त्म हो जाये
दुःख क़ी रात बीती ना हो और सुबह मातम हो जाये
कौन प्रेम को बिना टूटे सह पाया हैं
सब चुप हो गए बस " वीरेन "कह पाया हैं ।
रविवार, 9 मई 2010
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