मंगलवार, 11 मई 2010

प्यार पर कविता -भाग आठ

इससे पिछली कविता का लिंक हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_09.html

आठवी कविता

वो कभी मेरे पास तो आये , मेरे लिए बाहे फैलाये
मेरी गोद में सर रख कर मुझसे रूठे तो सही
हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे ताने दे तो सही
मैं फिराऊ उसके बालो में हाथ वो रोये तो सही

जितनी वो नाराज हो उतने प्यार से मैं मनाता जाऊ
आँखों से फिसले गालो पर उसके आंसू हटाता जाऊ
जब जी भर जाये उसका मुझसे झगड़कर
बस फिर चुप हो जाये वो मुझसे लिपटकर

तब मैं खोलू राज कि मैं ही तेरी दुखी दुनिया का हल था
ईश्वर का भेजा हुआ मैं तेरे सारे पुण्यो का फल था
सिर्फ तुम्हे आस्तिक बनाने को एक झोंका आया था
बुरी लड़की में भी छिपा एक साधक का साया था

अब तुझसा प्यारा ना कोई बैकुंठ द्वारा था
एक हरि पार्षद सिर्फ तेरे उद्धार के लिए उतारा था
तू सिर्फ इंतज़ार कर वो घड़ियाँ आने वाली हैं
जब भीगी तेरी पलके ये कहने वाली हैं

तुम सब जानते थे तो पहले अपनाया क्यों नहीं
मैं तो नालायक थी तुमने लायक बनाया क्यों नहीं
जब इतनी तैयारी कर चुके थे तो बताया क्यों नहीं
चाहती तो मैं भी यही थी पर तुमने फिर कहलवाया क्यों नहीं

माफ़ कर दो मुझे मैं जाने क्या क्या समझ गयी
वीरेन तुम्हारा सच्चा प्यार पाने को मैं अब तरस गयी


बस अभी के लिए इतना ही , आशा करता हूँ कि ईश्वर आपको इन पंक्तियों का अर्थ समझाए जो खुद मुझे भी ज्यादा स्पष्ट नहीं हैं । आप समझ पाए तो मुझे भी समझा दे । प्रेम सच में रहस्य हैं , आपको पता नहीं चलता कि आपसे ईश्वर क्या करवा रहा हैं । खैर उसका अपना विधान हैं , हमें तो बस उसी कि आज्ञा माननी हैं । बस वो लिखवा दे , हम तो सिर्फ माध्यम हैं । ज्यादा नहीं लिखूंगा नहीं तो कृष्ण नाराज़ होंगे कि ये बेवक़ूफ़ खुद को बीच में ले आया ।
खैर किसी की जिंदगी का दुःख आपके श्री चरणों में मनोरंजन के लिए अर्पित हैं .

2 टिप्‍पणियां:

kunwarji's ने कहा…

पता नहीं कब इश्वर हमें इन पंक्तियों के अर्थ समझने के लायक समझेगा या करेगा!इस दिशा हमारे प्रयास क्या है?सोचा तो पाया कि ....... रिक्त स्थान ही नजर आया!इसमें भी उस ही कि मर्जी........ होगी!पता ही नहीं इन सब बातों का!

कुंवर जी,

SANJEEV RANA ने कहा…

बहुत बढ़िया प्यार रस में डूबी हुई रचना

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...