शनिवार, 22 मई 2010

कैरियर उत्थान के लिए दृढ उपवास ( हास्य व्यंग्य )

महीनो से सरल कुमार को थोडा जटिल महंगाई दरो ने मारा हुआ थाअब ऐसे मूर्ख टी वी तो देखते नहीं जहाँ शीला दीक्षित जी के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर से संचालित बयानों से महंगाई रोकने की बात साबित होती हैंसरकार के पूरे आंकड़े इनके पास नहीं होते तो ऐसे आलसी और पलायनवादी लोग अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए अपने " ईश्वरचंद" जी के पास जाते हैं । अब ईश्वर जी के पास तो आर्थिक मंदी के मारे हुए बिजनेसमैन आगे लेन में लगे हैं तो सोचा की शोर्ट कट वे से ही एंट्री मारी जायेअब भगवान् कैसे गरीब लोगो को फर्स्ट लेन में शरण में ले क्योंकि उनके मंदिरों का खर्चा इस महंगाई में बेचारे गरीब नहीं उठा सकते हैं खैर संगमरमर और सी का रेट बढ़ गया हैं और भगवान् गर्मी में नहीं मर सकते और गोबर के लीपे फर्शो का अब जमाना नहीं रहा

तो सरल और खिज्जू दोनों दोस्तों ने सोचा की व्रत वगैरह के कुछ क्रेश कोर्स ले लिए जाये जिससे शाम को व्रत ख़त्म होते ही अपने व्रत के फलस्वरूप वरदान रुपी लिस्ट पहले ही तैयार करके तकिये के नीचे रख लेंगे जिससे वैसी कुछ भूल ना हो जाये हिरन्यकश्यप के जैसी वरदान मांगने में थी

तो
दिन शुरू हुआ महान उपवास का जिसमे सुबह साबूदाने की खीर खाने होती हैंअब क्योंकि व्रत करने वाला कमजोर ना हो जाये या खुश्की ना जो जाये तो दो ग्लास जूस अनार के व्रत के निमित ले लिए जिससे भक्ति में कोई दिक्कत ना हो
अब जैसे ही कम्पनी में गए दोनों तो कुछ खाना तो नहीं था क्योंकि ईश्वर प्रेम के इतने भूखे थे की कुछ सुहा ही नहीं रहा थाबस हर बार जो भी कुछ खाने के लिए पूछता था तो स्पष्ट कर देते नहीं भाई आज फलाहार पर हैं या दूध एक दो ग्लास ले सकते हैंजब दो सेब और आधा दर्जन केले अपने अन्दर के ईश्वर को भेंट में दिए तो मन में भक्ति से आई प्रसन्नता चेहरे की आध्यात्मिक तेजस्विता को और बढ़ा रही थी

अब
इनके पेट में समाये ईश्वर के आनंद की अनुभूति से जो माहौल बना तो कम्पनी की कुछ सरल हृदय कन्याओ से सहन नहीं हुआ और वो इनकी भक्ति की भूख को शांत करने के लिए "व्रत स्पेशल" के कुछ चिप्स के पैकेट ले आई जो व्रत में आजकल खाए जाते हैंसरल और खिज्जु को अपने पिछड़े पन पर दुःख हुआ की एक तो व्रत रखा जीवन में और वो भी बिना कायदे कानून केएक ये लडकिया हैं जो बेचारी व्रत वाले दिन अपने बैग पूरे व्रत वाले खाने से ठूंस ठूंस कर लाती हैं की कही भक्ति में कोई कमी ना रहे व्रत में सिर्फ वही चीज़े प्रचुर मात्र में लायी जो व्रत के लिए बनायीं गयी हैं . तो उन्होंने व्रत के लिए कन्याओ द्वारा लाये गए सारे चिप्स भक्ति भाव से ग्रहण कियेसाथ में कोल्ड ड्रिंक मिल जाता तो गर्मी से राहत मिल जातीअब देखो इसी को तो व्रत कहते हैं जिसमे आपको प्यास सहनी पड़े

शाम
होते होते व्रत के नाम पर जो भ्रष्टाचार मचाना था उसका अब कलाईमेक्स आना थारेस्टारेंट की स्पेशल व्रत थाली मंगा ली गयी जिसमे हफ्ते भर का राशन एक बार में आने की सम्भावना थीहालाँकि वो थाली एक सामान्य व्यक्ति नहीं खा सकता था ईश्वर प्रेम और दृढ भक्ति भाव के चलते दोनों दोस्त व्रत में कोई चूक नहीं होने देना चाहते थेवो सिर्फ वही खाते जो शास्त्रों में व्रत वाले के लिए विधान में लिखा हैंआधा एक घंटा थाली को चाट देने वाली हद तक जाकर ही साँस लिया

शाम
को सोते हुए दूध और बादाम एक सात्विक पेय माना जाता हैंअब जिनकी रग रग में सत्वगुण हो वो कैसे ना इस अल्पाहार को किसी फलाहार के साथ ना लेजब बिस्तर पर लेते तो शायद कठिन उपवास के करण थकान भी ज्यादा थी तो जल्दी नीद गयी

सरल
के स्वप्न में भगवान् आये , " बेटा तुम्हारी आज की भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ क्योंकि तुमने कोई भी नियम नहीं तोडा सिर्फ व्रत के लिए निर्धारित वस्तु ही ग्रहण कीपर आगे से ऐसे कड़े उपवास मत करना क्योंकि मुझे आज सिर्फ दो बन्दों के कारण आठ बन्दों के हिस्से का खाना अरेंज करने में बड़ी दिक्कत हुईपर तुम्हारी भक्ति की भूख के कारण सब सहन करना पड़ावरदान यही हैं की जब तक ये धरती हैं तब तक तुम्हे कोई व्रत करने की जरुरत नहीं मैं वैसे ही राज़ी हूँजब कोई दिक्कत हो फ़ोन कर देना मैं बिना व्रत के ही तैयार हूँ मदद करने के लिएतुम्हारे जैसे व्रत अगर आधी दुनिया रखने लग जाए तो बाकि आधी दुनिया को तो वैसे ही खाने की कमी के करण व्रतरखना पड़ेगा , उनके पास व्रत रखने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा या फिर चारा खाकर ही गुज़ारा करना पड़ेगा

सरल
की नींद खुली तो बदहजमी की वजह से अब ईश्वर प्रशाद के तौर पर इनो लेनी पड़ीअब ऐसे कठोर व्रत वाले व्यक्ति को इतना तो सहना तो पड़ेगा हीआपने भी व्रत रखने में ऐसे काफी दुःख सहे होंगेकृपया साँझा करे .

प्यार पर कविता भाग ग्यारह

मुझे पता नहीं वो इन कविताओ का अर्थ समझती भी थी या नहीं , पढ़ती थी भी या नहीं , या सिर्फ मेरा दिल रखने के लिए झूठी बड़ाई " वाह वाह " के रूप में कर देती थी । अगर सच में इनके बीच में छुपे अर्थ उसे समझ में आते तो शायद रातो की नींद उड़ जाती और मुझसे एक एक पंक्ति के लिए झगड़ पड़ती तब उसे पता चलता की अध्यात्म और प्रेम की समस्या जब एक साथ हो जाये तो क्या होता हैं । ईश्वर कही का नहीं रहने देता । फिर भी उसके चेहरे को याद करके कुछ शब्द बन गए जो कुछ पल्ले नहीं पड़ रहे हैं की मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ । बस सच में वो दौर याद आता हैं कि कैसे एक अच्छा भला जीवन असमय समाप्त हो जाता हैं ।

मेरे प्यार के भाव से जब वो डर गयी थी
बिन भावना की वो आंखे तब झील सी भर गयी थी
जब सच्चे प्यार का अर्थ समझ गयी थी
आंसू गालो पर लिए मुझसे लिपट गयी थी

घबराहट में माथे पर पसीना छाया था
मेरा एक हाथ जिसे पोंछ आया था
उसकी चेतना में जैसे तब मेरा रब समाया था
आँखों में उसकी कोई अपना हमसाया था
उससे कभी ना मिलने का वादा कर आया था
जिंदगी बस उसी दिन ख़त्म कर आया था

जन्मो के बाद मिली और पलो में दूर हो गयी थी
सरल सी मेरी जिंदगी कितनी मजबूर हो गयी थी
किसको घाव दिखाऊ जब इलाज़ ईश्वर ना कर सके
कहाँ इतना पानी जो खाली सागर को भर सके

चरित्रहीन होना ही शायद इससे अच्छा था
बर्बाद तो होना था क्योंकि वीरेन सच्चा था
किस हद तक उस लड़की को प्यार किया
अपना भाव उस जन्मो से बिछड़ी पर वार दिया

ईश्वर तुने मुझे ही क्यों उसके लिए चुन लिया था
भक्ति के चरम से हटाकर आवारा सा कर दिया था
चाँद तारे सारे उसके चेहरे से भरे नज़र आते हैं
साँसों के उस मिलन को याद करके आंसू जाते हैं

काश अपने हाथ फैलाये वो कही से जाती
चेहरे की वो मुस्कान मेरे चारो तरफ छा जाती
बस वो एक बार मेरे गले लग कह जाती
तुम ना होते वीरेन तो शायद मैं मर जाती

कविता मुझे सच में नहीं आती थी । पता नहीं कहा से एक साथ इतने भाव आ जाते हैं की कड़िया से पिरो पिरो का अपने आप सब बन जाता हैं । एक बार फिर मेरे दुःख का ये रूप आपके मनोरंजन के लिए अर्पित हैं ,
धन्यवाद
वीरन्द्र

शुक्रवार, 21 मई 2010

प्रेम कविता ( भाग दस ) राधा जी की कृष्ण को समर्पित कविता

कुछ लोग ज्ञान को बड़ी भारी वस्तु बना देता हैं । असल में तो ज्ञान ही तो चीजों को सरल बना देती हैं । भक्ति और ज्ञान और प्रेम सब एक ही हैं । जब आप परम ज्ञानी हो तो आप पर प्रेम प्रगट होगा , या यूँ कहले की इनमे द्वैत क्यों लाया जाया जब ज्ञान में सब अद्वैत हैं तो प्रेम और ज्ञान में भिन्नता क्यों । सब एक में समाहित हो गया तो फिर अंतर प्रमाणित करने के लिए क्यों वातावरण तैयार करना ।
अभी बात प्रेम की ही करते हैं । राधा जी तो परम ज्ञानी हैं । वो परम भागवत हैं । मुझे प्रेरणा मिली और इस रचना का निर्माण हो गया । अब क्योंकि प्रेम पर ही आधारित हैं तो उसकी कड़ी में ये दसवी कविता होगी ।
नोवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html

प्यार पर दसवी कविता

अश्रु के ये मोती लिए तेरा इंतज़ार करती हूँ
वृन्दावन के ग्वाले मैं तुझे प्यार करती हूँ

मन हरने वाले तुने प्राण क्यों ना हर लिए
अब दुःख होता हैं तेरी याद में राधा क्यों जिए

मथुरा क्या गया अपनी राधा को भूल गया हैं
तुझे पाने का अब राधा का सपना टूट गया हैं

सोने के महल तुझे तो लगता हैं भा गए
झाड़ वृन्दावन के मुझे रास गए

हजारो रानियाँ तू समुन्द्र से भी घेर लाया था
ढाई कोस दूर की राधा को ना देख पाया था

राधा ने तो अपना सर्वस्व तुझ पर छोड़ दिया था
अपनी हर मंजिल का रास्ता तुझ तक मोड़ दिया था

मेरे कृष्ण तेरे दर्शन की मै सदा प्यासी हूँ
विरह से उपजी प्यास बस आंसुओ से बुझाती हूँ

नटखट कान्हा तुझे मैंने किस घडी वर लिया था
क्यों एक छिछोरे में अपना मन धर लिया था

अगर मैं रूठ गयी तो तेरी बंसी की तान बिगड़ जाएगी
राजकुमारिया भले तुझे मिल जाये पर ये ग्वालिन बिछड़ जाएगी

राधा राधा बस इतने शब्द तेरे सुनने को मेरे कान तरस जाते हैं
मेरे कृष्ण मेरे कृष्ण जैसे स्वर होठो से बरस जाते हैं

अभी के लिए राधा जी ने इतनी ही प्रेरणा दी हैं । बाकि उनकी कृपा रही तो बात और आगे तक बढ़ेगी ।
धन्यवाद ,
वीरेंद्र

शनिवार, 15 मई 2010

हम देसी लोग : हमें हर चीज़ का देर से पता चलता हैं ( कुछ वाकये जीवन से )

टिशू पेपर -एक

हम देसी लोगो के साथ यही दिक्कत होती हैं की हमें चीज़े देर से समझ में आती हैं मेरी जीवन में भी ऐसा सा ही हुआ था दो बार . 1994 में स्कूल के फंक्शन में जब सारा काम निबट गया था तो हम यूँ ही आवारो कुत्तो की तरह "चेकिंग" पर निकले थे . इस टिशु पेपर को जब हाथ में लिया तो समझ तो गए थे की ये खाने की चीज़ नहीं हैं . पर जब चार पांच पेपर हाथ में लेकर लगा की शायद ये टैंट वालो की तरफ से रंगीन कागज हैं जो सजावट के लिए अभी टांगे जायेंगे . फिर जब चार पांच टिशु मेरी गलती की वजह से थोड़े क्षतिग्रस्त हो गए तो मैं वहा से भाग लिया की कही जरुरी चीज़ हो और मैं इसे बर्बाद कर रहा हूँ असल में उस समय टीचरों का तांडव जोरो पर होता था असल में मीडिया इतना जागरूक था नहीं जो एक आठवी क्लास के बच्चे को पिटाई से बचा सके

टिशु पेपर - दो
और दूसरा इसके दो तीन साल बाद हुआ , मुझे तो पता था पर एक अति परिचित ने मुझसे कहा की एक पता नहीं क्या चीज़ थी जिसे बस " शहर " के पढ़े लिखे लोग बस चाट कर बिना खाए कूड़ेदान में डाल रहे थे

कम्पार्टमेंट
एक और ऐसा ही हैं पर उसका टिशु पेपर से लिंक नहीं हैं . रोहतक के हमारे जानकार की कभी बचपन में किसी क्लास में compartment आई थी . सबको समझ में आया पर उसके दादा जी को नहीं . आप सोचिये उन्होंने क्या कहा होगा - उनके डायलोग :-
" बेटा इब गई तो कोई बात नहीं , ल्या बैठक में बैठा ले " ( कोई बात नहीं बेटा बैठक में बिठा ले , जैसे कोई गर्ल फ्रेंड हो )
सच में लगता सब मनोरंजक हैं पर हमारे देसी लोगो के जीवन की तो सच्चाई हैं
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

Email:virender.zte@gmail.com
Blog:saralkumar.blogspot.com

शुक्रवार, 14 मई 2010

प्यार पर कविता - भाग नौ

हर व्यक्ति के लिए प्यार करना संभव नहीं क्योंकि करना एक बलात प्रक्रिया हैं और प्रेम एक स्वाभाविक । फिर जब लेखक कि भी गहरी मानवीय संवेदना इसमें जुड़ जाती हैं तो एक रचना का निर्माण होता हैं । वो कहते हैं ना कि आपका दुःख भी एक मनोरंजन का स्रोत बन जाता हैं औरो के लिए । पर इसमें सारा श्रेय तो ईश्वर का ही हैं क्योंकि बुद्धिमानो की बुद्धि वो ही तो प्रेरित करता हैं । खैर ज्यादा बोर ना करते हुए आपके श्री चरणों में ये भाव समर्पित हैं । इसी कड़ी की आठवी कविता का लिंक हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_11.html


और अब नौवी कविता

दर्द से भरा मेरा सागर जब बह जायेगा
अस्तित्व मेरा तेरे सपनो में आकर कह जायेगा
मुझे तो भगवान् तुम्हारे लिए संसार में लाया था
एक मैं ही तेरा अपना और जग पराया था

मेरी आँखों में अपने आंसू देख तो सही
कभी सोच उन बातो को जो मैंने कही
मजबूत दिल वाला मैं कैसे ढह गया
दर्द तेरे दिल का था और मैं सह गया

सोचा कभी तुने इसमें मेरा क्या स्वार्थ था
तेरी ख़ुशी के लिए मेरा भाव परमार्थ था
तेरे अलावा ना मैं किसी के लिए ऐसा कर सकता था
सिर्फ श्री हरि के लिए ही मैं भवसागर तर सकता था

विरह मेरे दिल का लिए तेरा इंतज़ार करता हूँ
मंजिल हो जिसकी तू ,वो राह तैयार करता हूँ
जिंदगी को बस सारे राह बर्बाद करता हूँ
मिट कर खुद बस तुझे आबाद करता हूँ

समझ मुझे कोई नहीं पाया कितना बड़ा दुःख था
तुझे तसल्ली ही तो देने गया इसमें मेरा क्या सुख था
क्या मुझे अच्छा होने की ही सजा मिल गयी थी
कमजोर तो तू थी , जमीन क्यों मेरी हिल गयी थी


और कुछ भाव होंगे तो आप लोगो के साथ शेयर करूँगा । मुझे भी पता हैं कि मेरी कविताओ में समरसता हैं , इससे आपको बार बार लगता होगा कि हर बार वही बात बस शब्द ही अलग होते हैं । पर क्या करू , रचना में सारी प्रेरणा एक भाव को लेकर ही हैं । इसीलिए ऐसा हो रहा हैं । खैर आप तो भले लोग हैं । इस कविता को भी झेल लेना प्लीज़ । आप का भला होगा । ख़ास बात ये कि जिसके लिए ये सब लिखा जा रहा हैं , उसे कविता कभी ज्यादा समझ ही नहीं आती थी क्योंकि वो एक आधुनिक सोच वाली व्यावहारिक लड़की थी । कल्पना कितनी सजीव बना देती हैं चीजों को ।
धन्यवाद
वीरेन्द्र

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...