शनिवार, 22 मई 2010

प्यार पर कविता भाग ग्यारह

मुझे पता नहीं वो इन कविताओ का अर्थ समझती भी थी या नहीं , पढ़ती थी भी या नहीं , या सिर्फ मेरा दिल रखने के लिए झूठी बड़ाई " वाह वाह " के रूप में कर देती थी । अगर सच में इनके बीच में छुपे अर्थ उसे समझ में आते तो शायद रातो की नींद उड़ जाती और मुझसे एक एक पंक्ति के लिए झगड़ पड़ती तब उसे पता चलता की अध्यात्म और प्रेम की समस्या जब एक साथ हो जाये तो क्या होता हैं । ईश्वर कही का नहीं रहने देता । फिर भी उसके चेहरे को याद करके कुछ शब्द बन गए जो कुछ पल्ले नहीं पड़ रहे हैं की मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ । बस सच में वो दौर याद आता हैं कि कैसे एक अच्छा भला जीवन असमय समाप्त हो जाता हैं ।

मेरे प्यार के भाव से जब वो डर गयी थी
बिन भावना की वो आंखे तब झील सी भर गयी थी
जब सच्चे प्यार का अर्थ समझ गयी थी
आंसू गालो पर लिए मुझसे लिपट गयी थी

घबराहट में माथे पर पसीना छाया था
मेरा एक हाथ जिसे पोंछ आया था
उसकी चेतना में जैसे तब मेरा रब समाया था
आँखों में उसकी कोई अपना हमसाया था
उससे कभी ना मिलने का वादा कर आया था
जिंदगी बस उसी दिन ख़त्म कर आया था

जन्मो के बाद मिली और पलो में दूर हो गयी थी
सरल सी मेरी जिंदगी कितनी मजबूर हो गयी थी
किसको घाव दिखाऊ जब इलाज़ ईश्वर ना कर सके
कहाँ इतना पानी जो खाली सागर को भर सके

चरित्रहीन होना ही शायद इससे अच्छा था
बर्बाद तो होना था क्योंकि वीरेन सच्चा था
किस हद तक उस लड़की को प्यार किया
अपना भाव उस जन्मो से बिछड़ी पर वार दिया

ईश्वर तुने मुझे ही क्यों उसके लिए चुन लिया था
भक्ति के चरम से हटाकर आवारा सा कर दिया था
चाँद तारे सारे उसके चेहरे से भरे नज़र आते हैं
साँसों के उस मिलन को याद करके आंसू जाते हैं

काश अपने हाथ फैलाये वो कही से जाती
चेहरे की वो मुस्कान मेरे चारो तरफ छा जाती
बस वो एक बार मेरे गले लग कह जाती
तुम ना होते वीरेन तो शायद मैं मर जाती

कविता मुझे सच में नहीं आती थी । पता नहीं कहा से एक साथ इतने भाव आ जाते हैं की कड़िया से पिरो पिरो का अपने आप सब बन जाता हैं । एक बार फिर मेरे दुःख का ये रूप आपके मनोरंजन के लिए अर्पित हैं ,
धन्यवाद
वीरन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

SANJEEV RANA ने कहा…

बहट अच्छे मन के भाव

sachin ने कहा…

very nice poem.. :)

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...