एक साधारण आम मध्यमवर्गीय भारतीय कि तरह मैं भी महंगाई की मार से परेशान हूँ । सच कहू पांच साल पहले जिस दस पंद्रह हज़ार में घर चल रहा था अब वो बीस पच्चीस तक पहुँच गया हैं , पर मेरी तनख्वाह तो नहीं बढ़ी हैं ।
अब नीचे मैं अपना दुःख शुरू करता हूँ
हे हमारे देश के सोये हुए प्रधानमंत्री ( श्रीमती सोनिया गाँधी सही रहेगा शायद ) ।
मुझे अब तक समझ नहीं आया कि आप लोग हमारे दुःख दूर करने के लिए सत्ता में हैं या बढ़ाने के लिए । एक सूची देखिये जिन्होंने मेरा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं ।
एक :::::::महंगाई बढती जा रही हैं पर क्या आपकी सरकार कि जवाबदेही नहीं हैं क्या । बी जे पी ने जो बंद किया था उसका भी मुझे तो नुक्सान ही हुआ क्योंकि हमारी कंपनी उसका किसी और दिन में शिफ्ट कर लेगी । पर आप ने और मीडिया ने मिलकर बस तोड़ फोड़ को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया मेरी कमर टूट चुकी गृहस्थी पर कोई ध्यान नहीं दिया ।
दो ::: रोज़ रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं पर पता नहीं आप पाकिस्तान से मीटिंग में व्यस्त हैं , पूरे साठ साल से तो आप लोग यही कर रहे हो पर एक समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हो , साठ साल कि ढोंगी शांति से तो साठ दिन का सच्चा युद्ध ठीक हैं । वैसे भी सैनिक भी तो हमारे परिवारों पर के ही मरेंगे , आप तो हमारे बस दुःख में शरीक होने के लिए एकदम सफ़ेद कपड़ो में आओगे , बिके हुए मीडिया चैनलों पर देशभक्ति की दुहाई दोगे , जबकि आपे बेटा बेटी कही स्विट्ज़रलैंड में जमा पैसो की रसीद कटवा रहे होंगे ।
तीन :::::मुझे बताये की ममता बैनर्जी जी का हम क्या करे । ट्रेनों पर सुरक्षा की कमी होने से नक्सल हमलो में तेजी हो रही हैं पर वो कह रही हैं कि रेलवे का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं । मुझे डर हैं कि कल यही आपकी पार्टी के हर मंत्री ने कहना हैं कि आर्मी में घोटाला हुआ हैं पर रक्षा मंत्रालय का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं ।
चार :::हम पढ़ते आये हैं कि देश में लोकतंत्र हैं और जनता के वोटो से चुनकर आये नेता ही देश चलते हैं । आपको कहाँ कि जनता ने चुना हैं , किस मैडम को संविधान ने अधिकार दे दिया हैं कि वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी इच्छा से बना देती हैं , एक अरब लोगो के वोटो कि कोई कीमत नहीं । अब तो हद और भी हो गयी जो एक नासमझ से लगने वाले (और जिसे भारत कि आत्मा के बारे में पता नहीं हैं ) लड़के को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते कि वजह से हमारे ऊपर थोपा जाने वाला हैं ।
पांच :::::हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया कम पत्रकारिता शायद आपने खरीद लिया हैं । नहीं तो पिछले साल इतनी कमरतोड़ महंगाई के बाद भी आप कैसे जीत गए । पिछले मुख्य चुनाव आयुक्त आपकी सरकार में मंत्री हैं और नए वाले सिर्फ आपके प्रति वफादार । क्या सच में आपने वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी तो नहीं करवाई क्योंकि आम आदमी तो सच में बताऊ इतना परेशान था कि सिर्फ आपको हटाने को तैयार था
छः ::::::आपकी सरकारों के लोग कुछ ना कुछ बयान देते रहे पर हमारे घावो पर मरहम नहीं बल्कि नमक छिडकने जैसा काम किया , सारे बयान तो मैं नहीं लिख पाउँगा क्योंकि आप लोगो ने थोक में काम किया हैं , फिर भी गूगल पर सर्च मार ले शीला दीक्षित , शरद पवार आदि के बारे में ।
सात :::::::::::माननीय सोनिया गाँधी ने कभी प्रधानमंत्री पद को त्यागा और संत बनी । पर मुझे तो लगता हैं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को तो वो जब चाहे हड़का सकती हैं तो उनका त्याग मानने का मेरा दिल नहीं करता । क्योंकि दरअसल वो तो बड़े पद पर हैं इनसे .
आठ ::::वैसे तो बाते और भी हैं पर बस ये कि आपकी सरकार में चापलूसी कि हद इतनी गिर गयी हैं कि सिर्फ एक परिवार का गुणगान करके प्रधानमन्त्री पद तक पाया जा सकता हैं । मुझे दुःख होता हैं जब मैं एक आम भारतीय को देखता हूँ पर मीडिया हमारा या तो प्रियंका गाँधी के गालो के डिम्पल दिखा रहा होता हैं या उनकी साड़ी या उनकी चुनाव वाले दिन कि जींस टॉप कि बिंदास छवि ।
सबसे ज्यादा दुःख मुझे उस दिन हुआ था और यकीन हुआ था कि हमारा पूरा देश नपुंसक हैं जिस दिन सोनिया गाँधी के साथ मनमोहन किसी शोक सभा सी में बैठे हुए थे तो प्रियंका गाँधी के बेटे के जूते के फीते बांधकर नेहरु गाँधी परिवार का क़र्ज़ अदा कर रहे थे । क्या राष्ट्राध्यक्ष ऐसा होता हैं
मुझे पता हैं मेरी हर बात थोड़ी कांग्रेस और गाँधी परिवार के खिलाफ लगी होगी , पर क्या जो मेरे जैसे साधारण आदमी को इतने मुद्देदिख रहे हैं वो उन्हें प्रधानमन्त्री होकर भी नहीं देख सकते । हम तो अपने भारत के वर्तमान संतो को सुनने के बाद ही कोल्ड ड्रिंक तक को पीने में अपराध बोध महसूस करते हैं , एक पैसा किसी के हक़ का नहीं लेना चाहते हैं , नॉन वेज क्या अंडा भी नहीं खाते , सिर्फ धार्मिक स्थलों पर ही जाते हैं । सिर्फ इतनी साधारण सी जिंदगी हमारी सुरक्षित करने कि जिम्मेदारी किसी सरकार से नहीं हो पा रही हैं तो क्या उसे डूब कर नहीं मर जाना चाहिए । क्यों आत्महत्या नहीं कर लेते सारे मंत्री जो हमारे प्रतिनिधि होने कि नौटंकी करते हैं और मैडम के तलवे चाटने को मरे रहते हैं । ये वही शरद पवार हैं जो कभी कोंग्रेस से मैडम कि वजह से अलग हुए थे और आज देखो इनकी दुम उग आई हैं
बहुत बाते हैं इतनी कि सारी जिंदगी लिख सकता हूँ , बस थोड़े लिखे को ज्यादा समझना । और एक बात कीमते सरकार बढ़ा रही हैं पर फिर ढीठ बयान भी दे देती हैं कि कीमते नहीं घटेगी क्योंकि पैसे खा चुकी होगी शायद । पर मेरी सेलरी बढ़ाने की जब बात आती हैं तो दो साल से आर्थिक मंदी का बहाना बना लेती हैं । हमारा घटिया प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री या राष्ट्रपति कभी कभी जब बयान देता हैं की दुश्मन का मुहतोड़ जवाब देंगे तो उनकी पतली और मरी मरी सी आवाज़ सुनकर हंसी आ जाती हैं कि जिनकी आवाज़ तक गले से नहीं निकल रही हैं ये क्या देश संभाल रहे होंगे ।
शनिवार, 10 जुलाई 2010
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
प्यार भाग अठारह - कुछ कुछ पुनर्जन्म की बाते
कविता थोड़ी रहस्यमय सी हैं , बस कुछ बाते बन गयी , इश्वर माफ़ करे क्योंकि कुछ जगह ज्यादा हो गया । जो आप में से रहस्य समझ जाये । वो उत्तर दे दे । एक ने तो देना ही हैं क्योंकि वो तो अध्यात्म का सिरमौर हैं ।
वो नदी के समन्दर में मिलने कि बाते
खुली छत पर वो तारे भरी राते
अँधेरे जब मेरे सारे खिल जाते
उसे याद याद करते आंसू आ जाते
तब मैं सोचता कि प्यार मेरा चुना हुआ नहीं था
फिर भी तबाह होना होगा सुना हुआ कहीं था
संग जहाँ ईश्वर होना था साया अपना भी नहीं था
स्वीकारा क्योंकि पिछले जन्म का नाता कही था
भविष्य क्या देखू जब भूतकाल में नीव रखी गयी
जिसका मैं जीवत्व उसकी हत्या की नीव रची गयी
दोष उसका था ही नहीं जिम्मेदारी तो सबकी बनती थी
कुटुम्बी दायरों में रोज किसी की तकदीर लुटती थी
आँखों के सामने होते भी मेरी आंखे देख ना पाई
बहुत गहराई आत्मा एक दोस्त के अक्स से छलक पाई
समय बदल गया था तो चरित्र के मायने बदल गए थे
सिर्फ एक बार के स्पर्श से मेरे सवाल मचल गए थे
वो वही था जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था
मन्नते जिसकी लेकर वृन्दावन में भटक रहा था
क्यों ब्रज की भूमि का शनिदेव उसको प्यारा था
अंतिम दम तक वो इष्टदेव जो हुआ ना हमारा था
जमीन आसमान भी जहाँ मिला करते हैं
क्षितिज कि परिभाषा वहां दिया करते हैं
चिराग कहा वीरेन जैसे सूरज से बढ़कर होगा
जीव कि तो बात कहाँ ब्रह्म से वो चढ़कर होगा
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!श्री हरि माफ़ करे मुझे!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पर मैं भी क्या करू अब कोई रास्ते ही नहीं बचे हैं
वो नदी के समन्दर में मिलने कि बाते
खुली छत पर वो तारे भरी राते
अँधेरे जब मेरे सारे खिल जाते
उसे याद याद करते आंसू आ जाते
तब मैं सोचता कि प्यार मेरा चुना हुआ नहीं था
फिर भी तबाह होना होगा सुना हुआ कहीं था
संग जहाँ ईश्वर होना था साया अपना भी नहीं था
स्वीकारा क्योंकि पिछले जन्म का नाता कही था
भविष्य क्या देखू जब भूतकाल में नीव रखी गयी
जिसका मैं जीवत्व उसकी हत्या की नीव रची गयी
दोष उसका था ही नहीं जिम्मेदारी तो सबकी बनती थी
कुटुम्बी दायरों में रोज किसी की तकदीर लुटती थी
आँखों के सामने होते भी मेरी आंखे देख ना पाई
बहुत गहराई आत्मा एक दोस्त के अक्स से छलक पाई
समय बदल गया था तो चरित्र के मायने बदल गए थे
सिर्फ एक बार के स्पर्श से मेरे सवाल मचल गए थे
वो वही था जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था
मन्नते जिसकी लेकर वृन्दावन में भटक रहा था
क्यों ब्रज की भूमि का शनिदेव उसको प्यारा था
अंतिम दम तक वो इष्टदेव जो हुआ ना हमारा था
जमीन आसमान भी जहाँ मिला करते हैं
क्षितिज कि परिभाषा वहां दिया करते हैं
चिराग कहा वीरेन जैसे सूरज से बढ़कर होगा
जीव कि तो बात कहाँ ब्रह्म से वो चढ़कर होगा
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!श्री हरि माफ़ करे मुझे!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पर मैं भी क्या करू अब कोई रास्ते ही नहीं बचे हैं
शनिवार, 3 जुलाई 2010
आज एक ब्लॉग पर एक साधक बहन को इश्वर कि बड़ाई करते सुना जो मेरे जैसे ईर्ष्यालु से सहन नहीं हुआ । अपनी इसी टिपण्णी को कविता का रूप दे दिया । कविता छोटी हैं अब क्या करू ईश्वर से थोडा डर भी तो लगता हैं कि कही ज्यादा खुंदक ना जाये और मेरी वाट ना लगा दे ( भाई मैं भी थोडा प्रोफेशनल हूँ )
प्रिय साधक बहन ,
कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं
वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं
भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं
क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा
फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
प्रिय साधक बहन ,
कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं
वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं
भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं
क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा
फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
बुधवार, 30 जून 2010
हमारे ईश्वर और समाज ( एक कविता )
कविता थोड़ी लम्बी हैं । शुरू कि पंक्तियो में ईश्वर कि ही बाते हैं, अंत में सामाजिक विसंगतियां कविता का रूप लेती हैं । आशा हैं आपको ज्यादा पसंद नहीं आएगी क्योंकि ये depression भरी हैं ।
मुझको प्यारे प्रभु के विरह का भक्तियोग था
दुनिया कि नजरो में ये एक मानसिक रोग था
ईश्वर जब मेरा अपना हैं तो क्यों ना कमी निकालू
जब तक पूरा मन खाली ना हो दो चार ताने दे डालू
फिर भी मेरा हरि मुझे सपनो में पुकारेगा
आँखों में आंसू ले मुझे मनाने आ जायेगा
मुझसे कहता हैं कि मुझे मिलने को उसका भी दिल तरसता हैं
प्रेम में मुझे बहा ले जाने को उसका एक झरना तरसता हैं
चाहे निर्गुण या सगुण दोनों ही मेरे तो साध्य हो गए
मेरी भक्ति की विधा पर टूटने को रिवाज बाध्य हो गए
इष्ट संग एक हो जाने को आत्मा में संकल्प हुआ था
तभी प्रेम की एक झलक ने मुझे अंदर तक छुआ था
सबमे समाया श्रीहरि एक आनंद का जरिया था
चुन लाया प्यार के मोती जिससे वो भक्ति का दरिया था
शब्दों में ना पढूंगा सिर्फ भावो को पाउँगा
वो ना मेरे पास आये तो खुद चला जाऊंगा
उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहूगा
मैं शिकायत करू तो भी तो तेरा ही रहूँगा
समां चुका तुझमे चाहे जीऊंगा या मरूँगा
अब थोड़ी मन की भड़ास सुना देता हूँ
दिल की खटास से प्यास बुझा देता हूँ
तिल तिल कर मरती मेरी जिंदगी देखिये
टूटते सपने वाली एक दुनिया सहेजिये
मेरे सारे अन्यायों के बीच ईश्वर कहाँ था
उजडती रोज़ किस्मत वो मेरा जहाँ था
सुन्दर चेहरा उनका उन्नति में सहायक था
प्रतिभा और परिश्रम ने जो दौर झेला वो भयानक था
शराब पीना सामाजिक हो गया था
इसीलिए मैं असामाजिक बन रो गया था
चरित्रवान होना मेरे लिए संतो ने ही चाहा था
पर कुछ ने इसे इगो प्रोब्लम कहा था
ऐसे लोगो से भी क्या शिकायत जिनमे मूर्खता के साये हैं
सिर्फ चेहरे की खाते हैं , ये नहीं पता दुनिया में क्यों आये हैं
अंतिम सत्य तो मृत्यु हैं क्या उसकी तैयारी उनकी हैं
दो गज में दफ़न हो जायेगे सारी दुनिया जिनकी हैं
सरल कहो या वीरेन कहो , आयाम से पार वाली बात कह गया
जो हरि ना झेल पाए , वो तो उन आसुओ को भी सह गया
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
virender.zte@gmail.com
मुझको प्यारे प्रभु के विरह का भक्तियोग था
दुनिया कि नजरो में ये एक मानसिक रोग था
ईश्वर जब मेरा अपना हैं तो क्यों ना कमी निकालू
जब तक पूरा मन खाली ना हो दो चार ताने दे डालू
फिर भी मेरा हरि मुझे सपनो में पुकारेगा
आँखों में आंसू ले मुझे मनाने आ जायेगा
मुझसे कहता हैं कि मुझे मिलने को उसका भी दिल तरसता हैं
प्रेम में मुझे बहा ले जाने को उसका एक झरना तरसता हैं
चाहे निर्गुण या सगुण दोनों ही मेरे तो साध्य हो गए
मेरी भक्ति की विधा पर टूटने को रिवाज बाध्य हो गए
इष्ट संग एक हो जाने को आत्मा में संकल्प हुआ था
तभी प्रेम की एक झलक ने मुझे अंदर तक छुआ था
सबमे समाया श्रीहरि एक आनंद का जरिया था
चुन लाया प्यार के मोती जिससे वो भक्ति का दरिया था
शब्दों में ना पढूंगा सिर्फ भावो को पाउँगा
वो ना मेरे पास आये तो खुद चला जाऊंगा
उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहूगा
मैं शिकायत करू तो भी तो तेरा ही रहूँगा
समां चुका तुझमे चाहे जीऊंगा या मरूँगा
अब थोड़ी मन की भड़ास सुना देता हूँ
दिल की खटास से प्यास बुझा देता हूँ
तिल तिल कर मरती मेरी जिंदगी देखिये
टूटते सपने वाली एक दुनिया सहेजिये
मेरे सारे अन्यायों के बीच ईश्वर कहाँ था
उजडती रोज़ किस्मत वो मेरा जहाँ था
सुन्दर चेहरा उनका उन्नति में सहायक था
प्रतिभा और परिश्रम ने जो दौर झेला वो भयानक था
शराब पीना सामाजिक हो गया था
इसीलिए मैं असामाजिक बन रो गया था
चरित्रवान होना मेरे लिए संतो ने ही चाहा था
पर कुछ ने इसे इगो प्रोब्लम कहा था
ऐसे लोगो से भी क्या शिकायत जिनमे मूर्खता के साये हैं
सिर्फ चेहरे की खाते हैं , ये नहीं पता दुनिया में क्यों आये हैं
अंतिम सत्य तो मृत्यु हैं क्या उसकी तैयारी उनकी हैं
दो गज में दफ़न हो जायेगे सारी दुनिया जिनकी हैं
सरल कहो या वीरेन कहो , आयाम से पार वाली बात कह गया
जो हरि ना झेल पाए , वो तो उन आसुओ को भी सह गया
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
virender.zte@gmail.com
सोमवार, 28 जून 2010
फुटबाल और हमारी वसुधैव कुटुम्बकम कि सोच (व्यंग्य cum यथार्थ )
ये पोस्ट मैंने नीरज बधवार जी की पोस्ट को पढ़ कर लिखी हैं । इसका लिंक नीचे हैं
http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html
जैसा की आप जानते होंगे की हमारे भारत के फूटबाल कोच ने कहा हैं की हम भी 2018 में विश्वकप में भाग लेंगे परजैसे हमारे काम हैं उसे देखकर तो लगता हैं की 18002 तक भी नहीं । स्लोवेनिया और स्लोवाकिया जैसे देश भीकितना अच्छा खेल रहे हैं । हम तो हर रोज़ एक टीम चुन लेते हैं कभी जर्मनी कभी अर्जेंटीना कभी ब्राज़ील और उनकेसुख दुःख में बीयर या टिशु पेपर यूज़ करते हैं ।
उधार कि पसंद ही हमारी महान संस्कृति हैं । हमें तो वैसे ही आस पड़ोस के लोगो कि जिंदगी में ही जीवन बितानाहोता हैं । अपने घर की तो सुध ही लेने की फ़िक्र नहीं होती । ले दे कर एक आलसी खेल क्रिकेट पकड़ रखा हैं जो सुबहनौ से पांच तक खेलते हैं और पांच दिन के बाद ड्रा को भी रोमांचक कह लेते हैं । कम्पनिया सारी क्रिकेट पर हीमेहरबान हैं । सचिन के साथ के दुसरे विदेशी खिलाडी कब के अलविदा कह चुके हैं पर भारतीय संस्कृति के चलतेसचिन जी शायद पचपन या अठावन में स्वैच्छिक सेवानिवृति लेंगे उससे पहले कोई उन्हें हटाएगा तो "गृह युद्ध " ," राजनीति " , " क्षेत्रवाद " ," जय महाराष्ट्र " जैसे जुमले हवा में लहरायेगे ।
अर्जेंटीना या ब्राज़ील से रोंदे जाने की नौबत हम पर नहीं आएगी क्योंकि हममे तो सारी प्रतिभा चापलूसी को लेकर हीहोगी । शायद ऐसा होगा की ग्यारह खिलाडियो में खेल माफिया के रिश्तेदार भर जायेगे । ऐसा नहीं हैं की भारत मेंखेलो को कोई बढ़ावा नहीं दिया जाता बल्कि राजनीति में कितने "खेल " होते हैं ऊपर से खेल को भी हम खेल कीतरह ही लेते हैं । बातो में सारी चीजों को गोल गोल घुमाना हमारी संस्कृति हैं ।
वैसे मेरे ख्याल से तो हमें खुश होना चाहिए की पाकिस्तान का भी यही हाल हैं और इस बार तो हमारा परम मित्र रूसभी नहीं खेल रहा हैं । सारे पडोसी देशो को भी अकेला नहीं छोड़ा जा सकता हैं । फिर फूटबाल से हाथ पैर टूटने काखतरा हैं । आँख वांख फूट गयी तो भारत में तो इलाज़ भी संभव नहीं हैं । डेढ़ घंटे का भी कोई खेल होता हैं । इतने मेंतो हम वार्म अप होते हैं ।
फूटबाल कुल मिलाकर हमारे राष्ट्रिय हित में नहीं लगता । एक दिक्कत ये भी हैं की हमारे सामान्य ज्ञान केसोफ्टवेयर अपडेट नहीं हैं क्योंकि मेरे आँखे ब्राज़ील कि टीम में पेले और रोनाल्डो को नहीं देख पा रही हैं । पता नहींमाराडोना को बेंच पर बिना फूटबाल ड्रेस के बिठाया गया हैं । बेकहम भी बेचारा बेंच पर बैठा हैं । जब इतने अच्छेखिलाडियो का टीम में स्थान नहीं हैं तो फिर ऐसे फ़िज़ूल गेम पर क्यों एनर्जी बेकार कि जाये । अच्छा मेरी चाय ठंडीहो रही हैं मैं चलता हूँ ।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!जय हिंद !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
एक दोस्त कि भेजी हुई प्यार पर सच्ची कविता ( प्यार भाग सत्रह )
यह कविता मेरी एक दोस्त ने ईश्वर प्रेरित विधान से संग होकर कुछ अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए भेजी हैं ।
वास्तव में ये उसके सच्चे प्यार को ढूँढने कि कवायद हैं । आप में से जो कोई भी इसे पढ़े और वास्तविक अर्थो की तह तक जाकर समाधान दे सके या उस व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद करे सके जिसके लिए ये लिखी गयी हैं तो आपका बड़ा आभार होगा । मुझे इ मेल से सूचित कर दे मैं आगे फोरवर्ड कर दूंगा । कविता धर्मो के सार रूप में अपने soul mate के लिए लिखी गयी हैं । आपका बहुत आभार होगा अगर आप इसमें सहाय होते हैं ।
इसके बाद के शब्द उस दोस्त के हैं जो उसने अपने प्रेमी को ढूँढने के लिए लिखे हैं :-
गलती अपनी कोई थी नहीं, समय चक्र ही घुमा गया
फिर उभरे वो शायद हम में, जब नाव अपनी एक पार हो
बदतमीज़ तो बहुत हूँ और कदर करना भी नहीं जानती
अब तो आपकी सेवा ही धर्म है मेरा
मैं तो नालायक हूँ और ऐसा मानती भी नहीं
चाहे कुछ भी समझो मुझको पर मन अपना संवार लो
इंतज़ार अपने किया और जिंदगी की राह चुनी
शिकायतों के ढेर हों चाहे पर अब न कोई तकरार हो
प्यार न करना आये मुझको समर्पण ही स्वीकार लो
खुद ही खुद को कहूं बावरी फिर उम्मीद का क्या सार हो
वास्तव में ये उसके सच्चे प्यार को ढूँढने कि कवायद हैं । आप में से जो कोई भी इसे पढ़े और वास्तविक अर्थो की तह तक जाकर समाधान दे सके या उस व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद करे सके जिसके लिए ये लिखी गयी हैं तो आपका बड़ा आभार होगा । मुझे इ मेल से सूचित कर दे मैं आगे फोरवर्ड कर दूंगा । कविता धर्मो के सार रूप में अपने soul mate के लिए लिखी गयी हैं । आपका बहुत आभार होगा अगर आप इसमें सहाय होते हैं ।
इसके बाद के शब्द उस दोस्त के हैं जो उसने अपने प्रेमी को ढूँढने के लिए लिखे हैं :-
माफ़ी के काबिल तो नहीं हूँ, फिर भी संभाल लो
मैं नहीं संभाल पायी उसका न मुझे कोई भाव दो
भाव की ही मूरत हूँ अवसाद से उबार लो
इस इस उस उस किस किस को क्या क्या कहती फिरी
खुद को कब का त्याग चुकी हूँ, मुझे किसी को न उधार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अब दर्द अपना उतार लो
गलती अपनी कोई थी नहीं, समय चक्र ही घुमा गया
कष्ट तो दिया लेकिन सृष्टि सारी समझा गया
फिर उभरे वो शायद हम में, जब नाव अपनी एक पार हो
उसी से ही पूछ लेना अभी हाल क्यूँ बेज़ार हो
मैं तो संभाल नहीं पायी अब आप ही संवार लो
बदतमीज़ तो बहुत हूँ और कदर करना भी नहीं जानती
बहुत वैरागी बनाया आपको, सिर्फ धर्म हूँ पहचानती
अब तो आपकी सेवा ही धर्म है मेरा
कुछ भी समझ के स्वीकार लो
मेरी ये कोशिश रहेगी कि मूड ना आपका खराब हो
मैं तो नालायक हूँ और ऐसा मानती भी नहीं
उपदेश झाडती रहती हूँ और कुछ जानती ही नहीं
चाहे कुछ भी समझो मुझको पर मन अपना संवार लो
हँसते खेलते रहो और सेवा का अधिकार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अभी प्रार्थना मेरी स्वीकार लो
इंतज़ार अपने किया और जिंदगी की राह चुनी
मौत तो मैं खोज न सकी व्यर्थ की ही बात बुनी
शिकायतों के ढेर हों चाहे पर अब न कोई तकरार हो
तरसना भी भूल चुकी हूँ मिलने की कोई राह दो
तबसे तो बचती फिरी हूँ अपनी कैद में आप डाल लो
कभी इज्जत से बोलती हूँ कभी कैसे ही भाव जटक देती हूँ
बस रुलाना आता है मुझको, कैसे माने कि प्यार भी करती हूँ
प्यार न करना आये मुझको समर्पण ही स्वीकार लो
जो अच्छा लगे रखो बाकी भाव आप गुज़ार दो
पगली के पागलपन को इतना भी मत व्यवहार दो
खुद ही खुद को कहूं बावरी फिर उम्मीद का क्या सार हो
आपको ही संभालना है अब तो चाहे कब्र में उतार दो
हरि ॐ"
शुक्रवार, 25 जून 2010
क्या तेरी जिंदगी में मैं भी कही हूँ ( प्रेम कविता भाग सोलह )
जो इस कड़ी में लिखी कविता को पहली बार पढ़ रहे हैं , उनके लिए पंद्रहवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html
तेरी जिंदगी में क्या मैं भी कही हूँ
भूल गया जो तुझे वो शख्स नहीं हूँ
जिंदगी में मैंने तुझे क्यों वर लिया था,
चेहरा तेरा क्यों आँखों में भर लिया था
ईश्वर ने मुझे ये क्या गम दिया था ,
माहौल को जिसने मेरे नम किया था
तू तो कभी समझ भी नहीं पायेगी
मौत का वो मंजर किसने जीया था
कविताओ से भी ना वो भाव मिलेंगे ,
जहर तेरे हिस्से का क्यों मैंने पीया था
तुम सदा हंसती खिलखिलाती रहो
गलतियो को तेरी मैं सुधार लूँगा
बस दुःख तेरे छीनकर सारे ,
अपने सारे सुख तुझे उधार दूंगा
जितना भी दुःख तुझे महसूस हुआ होगा ,
वो तो मेरे वाले की बस झलक ही थी
तीन जन्म और तीन आत्माओ की बात
तुझे बस एक प्रेम कथा की भनक सी थी
मैंने तो अपनी तकदीरो का रंग बदलते देखा हैं
प्यार की मंजिलो पर नसीबो को बिखरते देखा हैं
शिव जी के विधान को भी कभी बदल दिया था
पर तेरे जीवन में ना कभी दखल दिया था
कभी कभी मन करता हैं कि एक संकल्प कर ही डालू
माया के उस दौर को बस अभी मसल ही डालू
तब तू देखे कि मेरे प्यार और त्याग से ना कुछ बड़ा होता हैं
"वीरेन" की आत्मा में समाया जब श्री हरि खड़ा होता हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html
तेरी जिंदगी में क्या मैं भी कही हूँ
भूल गया जो तुझे वो शख्स नहीं हूँ
जिंदगी में मैंने तुझे क्यों वर लिया था,
चेहरा तेरा क्यों आँखों में भर लिया था
ईश्वर ने मुझे ये क्या गम दिया था ,
माहौल को जिसने मेरे नम किया था
तू तो कभी समझ भी नहीं पायेगी
मौत का वो मंजर किसने जीया था
कविताओ से भी ना वो भाव मिलेंगे ,
जहर तेरे हिस्से का क्यों मैंने पीया था
तुम सदा हंसती खिलखिलाती रहो
गलतियो को तेरी मैं सुधार लूँगा
बस दुःख तेरे छीनकर सारे ,
अपने सारे सुख तुझे उधार दूंगा
जितना भी दुःख तुझे महसूस हुआ होगा ,
वो तो मेरे वाले की बस झलक ही थी
तीन जन्म और तीन आत्माओ की बात
तुझे बस एक प्रेम कथा की भनक सी थी
मैंने तो अपनी तकदीरो का रंग बदलते देखा हैं
प्यार की मंजिलो पर नसीबो को बिखरते देखा हैं
शिव जी के विधान को भी कभी बदल दिया था
पर तेरे जीवन में ना कभी दखल दिया था
कभी कभी मन करता हैं कि एक संकल्प कर ही डालू
माया के उस दौर को बस अभी मसल ही डालू
तब तू देखे कि मेरे प्यार और त्याग से ना कुछ बड़ा होता हैं
"वीरेन" की आत्मा में समाया जब श्री हरि खड़ा होता हैं
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...