वास्तव में ये उसके सच्चे प्यार को ढूँढने कि कवायद हैं । आप में से जो कोई भी इसे पढ़े और वास्तविक अर्थो की तह तक जाकर समाधान दे सके या उस व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद करे सके जिसके लिए ये लिखी गयी हैं तो आपका बड़ा आभार होगा । मुझे इ मेल से सूचित कर दे मैं आगे फोरवर्ड कर दूंगा । कविता धर्मो के सार रूप में अपने soul mate के लिए लिखी गयी हैं । आपका बहुत आभार होगा अगर आप इसमें सहाय होते हैं ।
इसके बाद के शब्द उस दोस्त के हैं जो उसने अपने प्रेमी को ढूँढने के लिए लिखे हैं :-
माफ़ी के काबिल तो नहीं हूँ, फिर भी संभाल लो
मैं नहीं संभाल पायी उसका न मुझे कोई भाव दो
भाव की ही मूरत हूँ अवसाद से उबार लो
इस इस उस उस किस किस को क्या क्या कहती फिरी
खुद को कब का त्याग चुकी हूँ, मुझे किसी को न उधार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अब दर्द अपना उतार लो
गलती अपनी कोई थी नहीं, समय चक्र ही घुमा गया
कष्ट तो दिया लेकिन सृष्टि सारी समझा गया
फिर उभरे वो शायद हम में, जब नाव अपनी एक पार हो
उसी से ही पूछ लेना अभी हाल क्यूँ बेज़ार हो
मैं तो संभाल नहीं पायी अब आप ही संवार लो
बदतमीज़ तो बहुत हूँ और कदर करना भी नहीं जानती
बहुत वैरागी बनाया आपको, सिर्फ धर्म हूँ पहचानती
अब तो आपकी सेवा ही धर्म है मेरा
कुछ भी समझ के स्वीकार लो
मेरी ये कोशिश रहेगी कि मूड ना आपका खराब हो
मैं तो नालायक हूँ और ऐसा मानती भी नहीं
उपदेश झाडती रहती हूँ और कुछ जानती ही नहीं
चाहे कुछ भी समझो मुझको पर मन अपना संवार लो
हँसते खेलते रहो और सेवा का अधिकार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अभी प्रार्थना मेरी स्वीकार लो
इंतज़ार अपने किया और जिंदगी की राह चुनी
मौत तो मैं खोज न सकी व्यर्थ की ही बात बुनी
शिकायतों के ढेर हों चाहे पर अब न कोई तकरार हो
तरसना भी भूल चुकी हूँ मिलने की कोई राह दो
तबसे तो बचती फिरी हूँ अपनी कैद में आप डाल लो
कभी इज्जत से बोलती हूँ कभी कैसे ही भाव जटक देती हूँ
बस रुलाना आता है मुझको, कैसे माने कि प्यार भी करती हूँ
प्यार न करना आये मुझको समर्पण ही स्वीकार लो
जो अच्छा लगे रखो बाकी भाव आप गुज़ार दो
पगली के पागलपन को इतना भी मत व्यवहार दो
खुद ही खुद को कहूं बावरी फिर उम्मीद का क्या सार हो
आपको ही संभालना है अब तो चाहे कब्र में उतार दो
हरि ॐ"
2 टिप्पणियां:
बहुत बढ़िया.
Itni sundar prarthana se to bhagwaan bhi pighal jayein..
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