पहली बार शायद इस तरह के विषय पर कविता लिख पाया । ईश्वर कि कृपा हैं अगर आपको अच्छी लगे तो ।
लड़की तो हमेशा मुक्त ही जन्मती हैं
पूर्ण ब्रह्म में ही सदा उसकी चेतना रमती हैं
तभी शास्त्रों ने कहा होगा की वो पूजा ना करे
ईश्वर उसका अर्धांग और वो पति दूजा ना करे
ना जरुरत उसे व्रत उपवास और सन्यास की
बड़ी बड़ी बातो या ज्ञान के विन्यास की
बांटे सदा प्रेम और सौहार्द के भाव को
भूल जाये अपने अध्यात्म के चाव को
बस सरलता से बहने दे जीवन की नाव को
बस ना भूले अपने लज्जा के गाँव को
इसी परंपरा में तो गोपिओ का जन्म हुआ था
नतमस्तक जिनके आगे देवो का भी अहम् हुआ था
खुद शिव जी को भी गोपी बन रास में आना पड़ा
बस ब्रज कण बनने को ब्रह्मा जी को जाना पड़ा
माँ बहन बेटी बनकर भी वो तो सब बन्धनों से पार हैं
ऐसी निष्काम सेवा करने में तो पुरुष भी लाचार हैं
उसकी विनम्रता में ही उसका तेज समाया हैं
खुद श्री हरि ने माया से स्त्री को बनाया हैं
virender.zte@gmail.com
!! श्री हरि : !!
बुधवार, 14 जुलाई 2010
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
परमेश्वर को पति रूप में पाने की इच्छा को व्यक्त करती एक कविता
यह कविता मेरी एक मित्र ने भेजी हैं जिन्हें परम तत्व का साक्षात्कार हो चुका हैं , उनका अभिप्राय अपने निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान को सगुण रूप में वरण करने के लिए काफी मार्मिक बन पड़ा हैं । आपको पसंद ना भी आये तो मेरे आनंद में कोई कमी होने वाली नहीं हैं । कविता समझ में आ जाये तो ढीठ बन जाये और मुझे कुछ ना बताये । बस पढ़े और सोचे , कि इश्वर से प्यार करने का क्या क्या भाव हो सकता हैं ,। पहले कविता में वो मेरी खिंचाई करती हैं फिर इश्वर की , तो आपके श्री चरणों में समर्पित :-
कविता लिखना छोडो भाई
पहले करवाओ मेरी विदाई
क्या कोई राजकुमार राजा होने को तरस गया है?
और एक राजा सच्चे वैराग से बरस गया है?
रिमझिम सा उठता एक संकल्प मुझे खींचता है
दुनिया का असली राजा अपना हक छीनता है
मुझे क्या पड़ी किसी छलिये से दिल लगाने की
नाम तो बताया नहीं क्या उम्मीद हो घर बसने की
मैं क्यूँ जाऊं किसी गुरुद्वार
मेरा तो हक है पति का प्यार
कितनी ही बार अलग नाम से मिलता है
उसी नाम को स्वीकारूं तो फिर जलता है
असली पहचान पूछूं तो शक्की समझता है
उसे नहीं पहचान पाई, बस ये ही रटता है
असली कहानी तो खुद उसे ही पता नहीं
ऐसे ही बदनाम कर रहा है, मैं तो उस से खफा नहीं
बहुवचन क्यूँ लगाऊं वो तो एक ही एक है
प्रकृति है रंग बिरंगी, उसी के रूप अनेक हैं
स्त्री तो सिर्फ प्रकृति का रूप है ये सबको ज्ञात है
पुरुषों की जात दो ही हैं ये मुझे विश्वास है
मैंने तो कबका उन्हें चुन लिया था
कितने फेरे लिए उधेड़े अनेक का रूप क्यूँ धर लिया था
अपनी इज्जत करवाने के लिए क्या शब्द ही काफी नहीं
खुद को बहुवचन बना लेना क्या ये शिवजी की जाति नहीं
फिर भी मुझे उनकी जाति समझनी जरूरी है
क्यूंकि मैं तो एक ही हूँ, न बँट सकना मेरी मजबूरी है
ऐसा नहीं कि किसी के भी भाव मुझे द्वैत का एहसास करवाएं
सिर्फ वो ही अलग प्राणी हैं, विश्वास हो तो प्राणपति हो जाएँ
किसी किसी से न प्रार्थना करुँगी
वीरेन चाहे तो बात करवाए, वर्ना बात ही न करुँगी
हरि ॐ
शनिवार, 10 जुलाई 2010
अपनी आत्मा बेच चुकी सरकार और मीडिया से दिल कि भड़ास ( कौन सुनेगा हमारी )
एक साधारण आम मध्यमवर्गीय भारतीय कि तरह मैं भी महंगाई की मार से परेशान हूँ । सच कहू पांच साल पहले जिस दस पंद्रह हज़ार में घर चल रहा था अब वो बीस पच्चीस तक पहुँच गया हैं , पर मेरी तनख्वाह तो नहीं बढ़ी हैं ।
अब नीचे मैं अपना दुःख शुरू करता हूँ
हे हमारे देश के सोये हुए प्रधानमंत्री ( श्रीमती सोनिया गाँधी सही रहेगा शायद ) ।
मुझे अब तक समझ नहीं आया कि आप लोग हमारे दुःख दूर करने के लिए सत्ता में हैं या बढ़ाने के लिए । एक सूची देखिये जिन्होंने मेरा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं ।
एक :::::::महंगाई बढती जा रही हैं पर क्या आपकी सरकार कि जवाबदेही नहीं हैं क्या । बी जे पी ने जो बंद किया था उसका भी मुझे तो नुक्सान ही हुआ क्योंकि हमारी कंपनी उसका किसी और दिन में शिफ्ट कर लेगी । पर आप ने और मीडिया ने मिलकर बस तोड़ फोड़ को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया मेरी कमर टूट चुकी गृहस्थी पर कोई ध्यान नहीं दिया ।
दो ::: रोज़ रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं पर पता नहीं आप पाकिस्तान से मीटिंग में व्यस्त हैं , पूरे साठ साल से तो आप लोग यही कर रहे हो पर एक समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हो , साठ साल कि ढोंगी शांति से तो साठ दिन का सच्चा युद्ध ठीक हैं । वैसे भी सैनिक भी तो हमारे परिवारों पर के ही मरेंगे , आप तो हमारे बस दुःख में शरीक होने के लिए एकदम सफ़ेद कपड़ो में आओगे , बिके हुए मीडिया चैनलों पर देशभक्ति की दुहाई दोगे , जबकि आपे बेटा बेटी कही स्विट्ज़रलैंड में जमा पैसो की रसीद कटवा रहे होंगे ।
तीन :::::मुझे बताये की ममता बैनर्जी जी का हम क्या करे । ट्रेनों पर सुरक्षा की कमी होने से नक्सल हमलो में तेजी हो रही हैं पर वो कह रही हैं कि रेलवे का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं । मुझे डर हैं कि कल यही आपकी पार्टी के हर मंत्री ने कहना हैं कि आर्मी में घोटाला हुआ हैं पर रक्षा मंत्रालय का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं ।
चार :::हम पढ़ते आये हैं कि देश में लोकतंत्र हैं और जनता के वोटो से चुनकर आये नेता ही देश चलते हैं । आपको कहाँ कि जनता ने चुना हैं , किस मैडम को संविधान ने अधिकार दे दिया हैं कि वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी इच्छा से बना देती हैं , एक अरब लोगो के वोटो कि कोई कीमत नहीं । अब तो हद और भी हो गयी जो एक नासमझ से लगने वाले (और जिसे भारत कि आत्मा के बारे में पता नहीं हैं ) लड़के को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते कि वजह से हमारे ऊपर थोपा जाने वाला हैं ।
पांच :::::हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया कम पत्रकारिता शायद आपने खरीद लिया हैं । नहीं तो पिछले साल इतनी कमरतोड़ महंगाई के बाद भी आप कैसे जीत गए । पिछले मुख्य चुनाव आयुक्त आपकी सरकार में मंत्री हैं और नए वाले सिर्फ आपके प्रति वफादार । क्या सच में आपने वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी तो नहीं करवाई क्योंकि आम आदमी तो सच में बताऊ इतना परेशान था कि सिर्फ आपको हटाने को तैयार था
छः ::::::आपकी सरकारों के लोग कुछ ना कुछ बयान देते रहे पर हमारे घावो पर मरहम नहीं बल्कि नमक छिडकने जैसा काम किया , सारे बयान तो मैं नहीं लिख पाउँगा क्योंकि आप लोगो ने थोक में काम किया हैं , फिर भी गूगल पर सर्च मार ले शीला दीक्षित , शरद पवार आदि के बारे में ।
सात :::::::::::माननीय सोनिया गाँधी ने कभी प्रधानमंत्री पद को त्यागा और संत बनी । पर मुझे तो लगता हैं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को तो वो जब चाहे हड़का सकती हैं तो उनका त्याग मानने का मेरा दिल नहीं करता । क्योंकि दरअसल वो तो बड़े पद पर हैं इनसे .
आठ ::::वैसे तो बाते और भी हैं पर बस ये कि आपकी सरकार में चापलूसी कि हद इतनी गिर गयी हैं कि सिर्फ एक परिवार का गुणगान करके प्रधानमन्त्री पद तक पाया जा सकता हैं । मुझे दुःख होता हैं जब मैं एक आम भारतीय को देखता हूँ पर मीडिया हमारा या तो प्रियंका गाँधी के गालो के डिम्पल दिखा रहा होता हैं या उनकी साड़ी या उनकी चुनाव वाले दिन कि जींस टॉप कि बिंदास छवि ।
सबसे ज्यादा दुःख मुझे उस दिन हुआ था और यकीन हुआ था कि हमारा पूरा देश नपुंसक हैं जिस दिन सोनिया गाँधी के साथ मनमोहन किसी शोक सभा सी में बैठे हुए थे तो प्रियंका गाँधी के बेटे के जूते के फीते बांधकर नेहरु गाँधी परिवार का क़र्ज़ अदा कर रहे थे । क्या राष्ट्राध्यक्ष ऐसा होता हैं
मुझे पता हैं मेरी हर बात थोड़ी कांग्रेस और गाँधी परिवार के खिलाफ लगी होगी , पर क्या जो मेरे जैसे साधारण आदमी को इतने मुद्देदिख रहे हैं वो उन्हें प्रधानमन्त्री होकर भी नहीं देख सकते । हम तो अपने भारत के वर्तमान संतो को सुनने के बाद ही कोल्ड ड्रिंक तक को पीने में अपराध बोध महसूस करते हैं , एक पैसा किसी के हक़ का नहीं लेना चाहते हैं , नॉन वेज क्या अंडा भी नहीं खाते , सिर्फ धार्मिक स्थलों पर ही जाते हैं । सिर्फ इतनी साधारण सी जिंदगी हमारी सुरक्षित करने कि जिम्मेदारी किसी सरकार से नहीं हो पा रही हैं तो क्या उसे डूब कर नहीं मर जाना चाहिए । क्यों आत्महत्या नहीं कर लेते सारे मंत्री जो हमारे प्रतिनिधि होने कि नौटंकी करते हैं और मैडम के तलवे चाटने को मरे रहते हैं । ये वही शरद पवार हैं जो कभी कोंग्रेस से मैडम कि वजह से अलग हुए थे और आज देखो इनकी दुम उग आई हैं
बहुत बाते हैं इतनी कि सारी जिंदगी लिख सकता हूँ , बस थोड़े लिखे को ज्यादा समझना । और एक बात कीमते सरकार बढ़ा रही हैं पर फिर ढीठ बयान भी दे देती हैं कि कीमते नहीं घटेगी क्योंकि पैसे खा चुकी होगी शायद । पर मेरी सेलरी बढ़ाने की जब बात आती हैं तो दो साल से आर्थिक मंदी का बहाना बना लेती हैं । हमारा घटिया प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री या राष्ट्रपति कभी कभी जब बयान देता हैं की दुश्मन का मुहतोड़ जवाब देंगे तो उनकी पतली और मरी मरी सी आवाज़ सुनकर हंसी आ जाती हैं कि जिनकी आवाज़ तक गले से नहीं निकल रही हैं ये क्या देश संभाल रहे होंगे ।
अब नीचे मैं अपना दुःख शुरू करता हूँ
हे हमारे देश के सोये हुए प्रधानमंत्री ( श्रीमती सोनिया गाँधी सही रहेगा शायद ) ।
मुझे अब तक समझ नहीं आया कि आप लोग हमारे दुःख दूर करने के लिए सत्ता में हैं या बढ़ाने के लिए । एक सूची देखिये जिन्होंने मेरा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं ।
एक :::::::महंगाई बढती जा रही हैं पर क्या आपकी सरकार कि जवाबदेही नहीं हैं क्या । बी जे पी ने जो बंद किया था उसका भी मुझे तो नुक्सान ही हुआ क्योंकि हमारी कंपनी उसका किसी और दिन में शिफ्ट कर लेगी । पर आप ने और मीडिया ने मिलकर बस तोड़ फोड़ को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया मेरी कमर टूट चुकी गृहस्थी पर कोई ध्यान नहीं दिया ।
दो ::: रोज़ रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं पर पता नहीं आप पाकिस्तान से मीटिंग में व्यस्त हैं , पूरे साठ साल से तो आप लोग यही कर रहे हो पर एक समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हो , साठ साल कि ढोंगी शांति से तो साठ दिन का सच्चा युद्ध ठीक हैं । वैसे भी सैनिक भी तो हमारे परिवारों पर के ही मरेंगे , आप तो हमारे बस दुःख में शरीक होने के लिए एकदम सफ़ेद कपड़ो में आओगे , बिके हुए मीडिया चैनलों पर देशभक्ति की दुहाई दोगे , जबकि आपे बेटा बेटी कही स्विट्ज़रलैंड में जमा पैसो की रसीद कटवा रहे होंगे ।
तीन :::::मुझे बताये की ममता बैनर्जी जी का हम क्या करे । ट्रेनों पर सुरक्षा की कमी होने से नक्सल हमलो में तेजी हो रही हैं पर वो कह रही हैं कि रेलवे का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं । मुझे डर हैं कि कल यही आपकी पार्टी के हर मंत्री ने कहना हैं कि आर्मी में घोटाला हुआ हैं पर रक्षा मंत्रालय का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं ।
चार :::हम पढ़ते आये हैं कि देश में लोकतंत्र हैं और जनता के वोटो से चुनकर आये नेता ही देश चलते हैं । आपको कहाँ कि जनता ने चुना हैं , किस मैडम को संविधान ने अधिकार दे दिया हैं कि वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी इच्छा से बना देती हैं , एक अरब लोगो के वोटो कि कोई कीमत नहीं । अब तो हद और भी हो गयी जो एक नासमझ से लगने वाले (और जिसे भारत कि आत्मा के बारे में पता नहीं हैं ) लड़के को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते कि वजह से हमारे ऊपर थोपा जाने वाला हैं ।
पांच :::::हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया कम पत्रकारिता शायद आपने खरीद लिया हैं । नहीं तो पिछले साल इतनी कमरतोड़ महंगाई के बाद भी आप कैसे जीत गए । पिछले मुख्य चुनाव आयुक्त आपकी सरकार में मंत्री हैं और नए वाले सिर्फ आपके प्रति वफादार । क्या सच में आपने वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी तो नहीं करवाई क्योंकि आम आदमी तो सच में बताऊ इतना परेशान था कि सिर्फ आपको हटाने को तैयार था
छः ::::::आपकी सरकारों के लोग कुछ ना कुछ बयान देते रहे पर हमारे घावो पर मरहम नहीं बल्कि नमक छिडकने जैसा काम किया , सारे बयान तो मैं नहीं लिख पाउँगा क्योंकि आप लोगो ने थोक में काम किया हैं , फिर भी गूगल पर सर्च मार ले शीला दीक्षित , शरद पवार आदि के बारे में ।
सात :::::::::::माननीय सोनिया गाँधी ने कभी प्रधानमंत्री पद को त्यागा और संत बनी । पर मुझे तो लगता हैं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को तो वो जब चाहे हड़का सकती हैं तो उनका त्याग मानने का मेरा दिल नहीं करता । क्योंकि दरअसल वो तो बड़े पद पर हैं इनसे .
आठ ::::वैसे तो बाते और भी हैं पर बस ये कि आपकी सरकार में चापलूसी कि हद इतनी गिर गयी हैं कि सिर्फ एक परिवार का गुणगान करके प्रधानमन्त्री पद तक पाया जा सकता हैं । मुझे दुःख होता हैं जब मैं एक आम भारतीय को देखता हूँ पर मीडिया हमारा या तो प्रियंका गाँधी के गालो के डिम्पल दिखा रहा होता हैं या उनकी साड़ी या उनकी चुनाव वाले दिन कि जींस टॉप कि बिंदास छवि ।
सबसे ज्यादा दुःख मुझे उस दिन हुआ था और यकीन हुआ था कि हमारा पूरा देश नपुंसक हैं जिस दिन सोनिया गाँधी के साथ मनमोहन किसी शोक सभा सी में बैठे हुए थे तो प्रियंका गाँधी के बेटे के जूते के फीते बांधकर नेहरु गाँधी परिवार का क़र्ज़ अदा कर रहे थे । क्या राष्ट्राध्यक्ष ऐसा होता हैं
मुझे पता हैं मेरी हर बात थोड़ी कांग्रेस और गाँधी परिवार के खिलाफ लगी होगी , पर क्या जो मेरे जैसे साधारण आदमी को इतने मुद्देदिख रहे हैं वो उन्हें प्रधानमन्त्री होकर भी नहीं देख सकते । हम तो अपने भारत के वर्तमान संतो को सुनने के बाद ही कोल्ड ड्रिंक तक को पीने में अपराध बोध महसूस करते हैं , एक पैसा किसी के हक़ का नहीं लेना चाहते हैं , नॉन वेज क्या अंडा भी नहीं खाते , सिर्फ धार्मिक स्थलों पर ही जाते हैं । सिर्फ इतनी साधारण सी जिंदगी हमारी सुरक्षित करने कि जिम्मेदारी किसी सरकार से नहीं हो पा रही हैं तो क्या उसे डूब कर नहीं मर जाना चाहिए । क्यों आत्महत्या नहीं कर लेते सारे मंत्री जो हमारे प्रतिनिधि होने कि नौटंकी करते हैं और मैडम के तलवे चाटने को मरे रहते हैं । ये वही शरद पवार हैं जो कभी कोंग्रेस से मैडम कि वजह से अलग हुए थे और आज देखो इनकी दुम उग आई हैं
बहुत बाते हैं इतनी कि सारी जिंदगी लिख सकता हूँ , बस थोड़े लिखे को ज्यादा समझना । और एक बात कीमते सरकार बढ़ा रही हैं पर फिर ढीठ बयान भी दे देती हैं कि कीमते नहीं घटेगी क्योंकि पैसे खा चुकी होगी शायद । पर मेरी सेलरी बढ़ाने की जब बात आती हैं तो दो साल से आर्थिक मंदी का बहाना बना लेती हैं । हमारा घटिया प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री या राष्ट्रपति कभी कभी जब बयान देता हैं की दुश्मन का मुहतोड़ जवाब देंगे तो उनकी पतली और मरी मरी सी आवाज़ सुनकर हंसी आ जाती हैं कि जिनकी आवाज़ तक गले से नहीं निकल रही हैं ये क्या देश संभाल रहे होंगे ।
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
प्यार भाग अठारह - कुछ कुछ पुनर्जन्म की बाते
कविता थोड़ी रहस्यमय सी हैं , बस कुछ बाते बन गयी , इश्वर माफ़ करे क्योंकि कुछ जगह ज्यादा हो गया । जो आप में से रहस्य समझ जाये । वो उत्तर दे दे । एक ने तो देना ही हैं क्योंकि वो तो अध्यात्म का सिरमौर हैं ।
वो नदी के समन्दर में मिलने कि बाते
खुली छत पर वो तारे भरी राते
अँधेरे जब मेरे सारे खिल जाते
उसे याद याद करते आंसू आ जाते
तब मैं सोचता कि प्यार मेरा चुना हुआ नहीं था
फिर भी तबाह होना होगा सुना हुआ कहीं था
संग जहाँ ईश्वर होना था साया अपना भी नहीं था
स्वीकारा क्योंकि पिछले जन्म का नाता कही था
भविष्य क्या देखू जब भूतकाल में नीव रखी गयी
जिसका मैं जीवत्व उसकी हत्या की नीव रची गयी
दोष उसका था ही नहीं जिम्मेदारी तो सबकी बनती थी
कुटुम्बी दायरों में रोज किसी की तकदीर लुटती थी
आँखों के सामने होते भी मेरी आंखे देख ना पाई
बहुत गहराई आत्मा एक दोस्त के अक्स से छलक पाई
समय बदल गया था तो चरित्र के मायने बदल गए थे
सिर्फ एक बार के स्पर्श से मेरे सवाल मचल गए थे
वो वही था जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था
मन्नते जिसकी लेकर वृन्दावन में भटक रहा था
क्यों ब्रज की भूमि का शनिदेव उसको प्यारा था
अंतिम दम तक वो इष्टदेव जो हुआ ना हमारा था
जमीन आसमान भी जहाँ मिला करते हैं
क्षितिज कि परिभाषा वहां दिया करते हैं
चिराग कहा वीरेन जैसे सूरज से बढ़कर होगा
जीव कि तो बात कहाँ ब्रह्म से वो चढ़कर होगा
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!श्री हरि माफ़ करे मुझे!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पर मैं भी क्या करू अब कोई रास्ते ही नहीं बचे हैं
वो नदी के समन्दर में मिलने कि बाते
खुली छत पर वो तारे भरी राते
अँधेरे जब मेरे सारे खिल जाते
उसे याद याद करते आंसू आ जाते
तब मैं सोचता कि प्यार मेरा चुना हुआ नहीं था
फिर भी तबाह होना होगा सुना हुआ कहीं था
संग जहाँ ईश्वर होना था साया अपना भी नहीं था
स्वीकारा क्योंकि पिछले जन्म का नाता कही था
भविष्य क्या देखू जब भूतकाल में नीव रखी गयी
जिसका मैं जीवत्व उसकी हत्या की नीव रची गयी
दोष उसका था ही नहीं जिम्मेदारी तो सबकी बनती थी
कुटुम्बी दायरों में रोज किसी की तकदीर लुटती थी
आँखों के सामने होते भी मेरी आंखे देख ना पाई
बहुत गहराई आत्मा एक दोस्त के अक्स से छलक पाई
समय बदल गया था तो चरित्र के मायने बदल गए थे
सिर्फ एक बार के स्पर्श से मेरे सवाल मचल गए थे
वो वही था जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था
मन्नते जिसकी लेकर वृन्दावन में भटक रहा था
क्यों ब्रज की भूमि का शनिदेव उसको प्यारा था
अंतिम दम तक वो इष्टदेव जो हुआ ना हमारा था
जमीन आसमान भी जहाँ मिला करते हैं
क्षितिज कि परिभाषा वहां दिया करते हैं
चिराग कहा वीरेन जैसे सूरज से बढ़कर होगा
जीव कि तो बात कहाँ ब्रह्म से वो चढ़कर होगा
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!श्री हरि माफ़ करे मुझे!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पर मैं भी क्या करू अब कोई रास्ते ही नहीं बचे हैं
शनिवार, 3 जुलाई 2010
आज एक ब्लॉग पर एक साधक बहन को इश्वर कि बड़ाई करते सुना जो मेरे जैसे ईर्ष्यालु से सहन नहीं हुआ । अपनी इसी टिपण्णी को कविता का रूप दे दिया । कविता छोटी हैं अब क्या करू ईश्वर से थोडा डर भी तो लगता हैं कि कही ज्यादा खुंदक ना जाये और मेरी वाट ना लगा दे ( भाई मैं भी थोडा प्रोफेशनल हूँ )
प्रिय साधक बहन ,
कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं
वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं
भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं
क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा
फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
प्रिय साधक बहन ,
कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं
वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं
भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं
क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा
फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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