शनिवार, 3 जुलाई 2010

आज एक ब्लॉग पर एक साधक बहन को इश्वर कि बड़ाई करते सुना जो मेरे जैसे ईर्ष्यालु से सहन नहीं हुआ । अपनी इसी टिपण्णी को कविता का रूप दे दिया । कविता छोटी हैं अब क्या करू ईश्वर से थोडा डर भी तो लगता हैं कि कही ज्यादा खुंदक ना जाये और मेरी वाट ना लगा दे ( भाई मैं भी थोडा प्रोफेशनल हूँ )
प्रिय साधक बहन ,

कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं

वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं

भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं

क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा

फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

बुधवार, 30 जून 2010

हमारे ईश्वर और समाज ( एक कविता )

कविता थोड़ी लम्बी हैं । शुरू कि पंक्तियो में ईश्वर कि ही बाते हैं, अंत में सामाजिक विसंगतियां कविता का रूप लेती हैं । आशा हैं आपको ज्यादा पसंद नहीं आएगी क्योंकि ये depression भरी हैं ।

मुझको प्यारे प्रभु के विरह का भक्तियोग था
दुनिया कि नजरो में ये एक मानसिक रोग था

ईश्वर जब मेरा अपना हैं तो क्यों ना कमी निकालू
जब तक पूरा मन खाली ना हो दो चार ताने दे डालू

फिर भी मेरा हरि मुझे सपनो में पुकारेगा
आँखों में आंसू ले मुझे मनाने जायेगा

मुझसे कहता हैं कि मुझे मिलने को उसका भी दिल तरसता हैं

प्रेम में मुझे बहा ले जाने को उसका एक झरना तरसता हैं

चाहे निर्गुण या सगुण दोनों ही मेरे तो साध्य हो गए
मेरी भक्ति की विधा पर टूटने को रिवाज बाध्य हो गए

इष्ट संग एक हो जाने को आत्मा में संकल्प हुआ था
तभी प्रेम की एक झलक ने मुझे अंदर तक छुआ था

सबमे समाया श्रीहरि एक आनंद का जरिया था
चुन लाया प्यार के मोती जिससे वो भक्ति का दरिया था

शब्दों में ना पढूंगा सिर्फ भावो को पाउँगा
वो ना मेरे पास आये तो खुद चला जाऊंगा

उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहूगा
मैं शिकायत करू तो भी तो तेरा ही रहूँगा
समां चुका तुझमे चाहे जीऊंगा या मरूँगा

अब थोड़ी मन की भड़ास सुना देता हूँ
दिल की खटास से प्यास बुझा देता हूँ

तिल तिल कर मरती मेरी जिंदगी देखिये
टूटते सपने वाली एक दुनिया सहेजिये
मेरे सारे अन्यायों के बीच ईश्वर कहाँ था
उजडती रोज़ किस्मत वो मेरा जहाँ था

सुन्दर चेहरा उनका उन्नति में सहायक था
प्रतिभा और परिश्रम ने जो दौर झेला वो भयानक था
शराब पीना सामाजिक हो गया था
इसीलिए मैं असामाजिक बन रो गया था

चरित्रवान होना मेरे लिए संतो ने ही चाहा था
पर कुछ ने इसे इगो प्रोब्लम कहा था

ऐसे लोगो से भी क्या शिकायत जिनमे मूर्खता के साये हैं
सिर्फ चेहरे की खाते हैं , ये नहीं पता दुनिया में क्यों आये हैं

अंतिम सत्य तो मृत्यु हैं क्या उसकी तैयारी उनकी हैं
दो गज में दफ़न हो जायेगे सारी दुनिया जिनकी हैं

सरल कहो या वीरेन कहो , आयाम से पार वाली बात कह गया
जो हरि ना झेल पाए , वो तो उन आसुओ को भी सह गया



!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
virender.zte@gmail.com

सोमवार, 28 जून 2010

फुटबाल और हमारी वसुधैव कुटुम्बकम कि सोच (व्यंग्य cum यथार्थ )



ये पोस्ट मैंने नीरज बधवार जी की पोस्ट को पढ़ कर लिखी हैं । इसका लिंक नीचे हैं

http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html

जैसा की आप जानते होंगे की हमारे भारत के फूटबाल कोच ने कहा हैं की हम भी 2018 में विश्वकप में भाग लेंगे परजैसे हमारे काम हैं उसे देखकर तो लगता हैं की 18002 तक भी नहीं स्लोवेनिया और स्लोवाकिया जैसे देश भीकितना अच्छा खेल रहे हैं हम तो हर रोज़ एक टीम चुन लेते हैं कभी जर्मनी कभी अर्जेंटीना कभी ब्राज़ील और उनकेसुख दुःख में बीयर या टिशु पेपर यूज़ करते हैं

उधार कि पसंद ही हमारी महान संस्कृति हैं हमें तो वैसे ही आस पड़ोस के लोगो कि जिंदगी में ही जीवन बितानाहोता हैं अपने घर की तो सुध ही लेने की फ़िक्र नहीं होती ले दे कर एक आलसी खेल क्रिकेट पकड़ रखा हैं जो सुबहनौ से पांच तक खेलते हैं और पांच दिन के बाद ड्रा को भी रोमांचक कह लेते हैं कम्पनिया सारी क्रिकेट पर हीमेहरबान हैं सचिन के साथ के दुसरे विदेशी खिलाडी कब के अलविदा कह चुके हैं पर भारतीय संस्कृति के चलतेसचिन जी शायद पचपन या अठावन में स्वैच्छिक सेवानिवृति लेंगे उससे पहले कोई उन्हें हटाएगा तो "गृह युद्ध " ," राजनीति " , " क्षेत्रवाद " ," जय महाराष्ट्र " जैसे जुमले हवा में लहरायेगे

अर्जेंटीना या ब्राज़ील से रोंदे जाने की नौबत हम पर नहीं आएगी क्योंकि हममे तो सारी प्रतिभा चापलूसी को लेकर हीहोगी शायद ऐसा होगा की ग्यारह खिलाडियो में खेल माफिया के रिश्तेदार भर जायेगे ऐसा नहीं हैं की भारत मेंखेलो को कोई बढ़ावा नहीं दिया जाता बल्कि राजनीति में कितने "खेल " होते हैं ऊपर से खेल को भी हम खेल कीतरह ही लेते हैं बातो में सारी चीजों को गोल गोल घुमाना हमारी संस्कृति हैं

वैसे मेरे ख्याल से तो हमें खुश होना चाहिए की पाकिस्तान का भी यही हाल हैं और इस बार तो हमारा परम मित्र रूसभी नहीं खेल रहा हैं सारे पडोसी देशो को भी अकेला नहीं छोड़ा जा सकता हैं फिर फूटबाल से हाथ पैर टूटने काखतरा हैं आँख वांख फूट गयी तो भारत में तो इलाज़ भी संभव नहीं हैं डेढ़ घंटे का भी कोई खेल होता हैं इतने मेंतो हम वार्म अप होते हैं
फूटबाल कुल मिलाकर हमारे राष्ट्रिय हित में नहीं लगता एक दिक्कत ये भी हैं की हमारे सामान्य ज्ञान केसोफ्टवेयर अपडेट नहीं हैं क्योंकि मेरे आँखे ब्राज़ील कि टीम में पेले और रोनाल्डो को नहीं देख पा रही हैं पता नहींमाराडोना को बेंच पर बिना फूटबाल ड्रेस के बिठाया गया हैं बेकहम भी बेचारा बेंच पर बैठा हैं जब इतने अच्छेखिलाडियो का टीम में स्थान नहीं हैं तो फिर ऐसे फ़िज़ूल गेम पर क्यों एनर्जी बेकार कि जाये अच्छा मेरी चाय ठंडीहो रही हैं मैं चलता हूँ

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!जय हिंद !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

एक दोस्त कि भेजी हुई प्यार पर सच्ची कविता ( प्यार भाग सत्रह )

यह कविता मेरी एक दोस्त ने ईश्वर प्रेरित विधान से संग होकर कुछ अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए भेजी हैं ।
वास्तव में ये उसके सच्चे प्यार को ढूँढने कि कवायद हैं । आप में से जो कोई भी इसे पढ़े और वास्तविक अर्थो की तह तक जाकर समाधान दे सके या उस व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद करे सके जिसके लिए ये लिखी गयी हैं तो आपका बड़ा आभार होगा । मुझे इ मेल से सूचित कर दे मैं आगे फोरवर्ड कर दूंगा । कविता धर्मो के सार रूप में अपने soul mate के लिए लिखी गयी हैं । आपका बहुत आभार होगा अगर आप इसमें सहाय होते हैं ।

इसके बाद के शब्द उस दोस्त के हैं जो उसने अपने प्रेमी को ढूँढने के लिए लिखे हैं :-

माफ़ी के काबिल तो नहीं हूँ, फिर भी संभाल लो
मैं नहीं संभाल पायी उसका न मुझे कोई भाव दो
भाव की ही मूरत हूँ अवसाद से उबार लो

इस इस उस उस किस किस को क्या क्या कहती फिरी
खुद को कब का त्याग चुकी हूँ, मुझे किसी को न उधार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अब दर्द अपना उतार लो

गलती अपनी कोई थी नहीं, समय चक्र ही घुमा गया
कष्ट तो दिया लेकिन सृष्टि सारी समझा गया

फिर उभरे वो शायद हम में, जब नाव अपनी एक पार हो
उसी से ही पूछ लेना अभी हाल क्यूँ बेज़ार हो
मैं तो संभाल नहीं पायी अब आप ही संवार लो

बदतमीज़ तो बहुत हूँ और कदर करना भी नहीं जानती
बहुत वैरागी बनाया आपको, सिर्फ धर्म हूँ पहचानती

अब तो आपकी सेवा ही धर्म है मेरा
कुछ भी समझ के स्वीकार लो
मेरी ये कोशिश रहेगी कि मूड ना आपका खराब हो

मैं तो नालायक हूँ और ऐसा मानती भी नहीं
उपदेश झाडती रहती हूँ और कुछ जानती ही नहीं

चाहे कुछ भी समझो मुझको पर मन अपना संवार लो
हँसते खेलते रहो और सेवा का अधिकार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अभी प्रार्थना मेरी स्वीकार लो

इंतज़ार अपने किया और जिंदगी की राह चुनी
मौत तो मैं खोज न सकी व्यर्थ की ही बात बुनी

शिकायतों
के ढेर हों चाहे पर अब न कोई तकरार हो
तरसना भी भूल चुकी हूँ मिलने की कोई राह दो
तबसे तो बचती फिरी हूँ अपनी कैद में आप डाल लो

कभी इज्जत से बोलती हूँ कभी कैसे ही भाव जटक देती हूँ
बस रुलाना आता है मुझको, कैसे माने कि प्यार भी करती हूँ

प्यार न करना आये मुझको समर्पण ही स्वीकार लो
जो अच्छा लगे रखो बाकी भाव आप गुज़ार दो
पगली के पागलपन को इतना भी मत व्यवहार दो

खुद ही खुद को कहूं बावरी फिर उम्मीद का क्या सार हो
आपको ही संभालना है अब तो चाहे कब्र में उतार दो
हरि ॐ"

शुक्रवार, 25 जून 2010

क्या तेरी जिंदगी में मैं भी कही हूँ ( प्रेम कविता भाग सोलह )

जो इस कड़ी में लिखी कविता को पहली बार पढ़ रहे हैं , उनके लिए पंद्रहवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html

तेरी जिंदगी में क्या मैं भी कही हूँ
भूल गया जो तुझे वो शख्स नहीं हूँ

जिंदगी में मैंने तुझे क्यों वर लिया था,
चेहरा तेरा क्यों आँखों में भर लिया था
ईश्वर ने मुझे ये क्या गम दिया था ,
माहौल
को जिसने मेरे नम किया था

तू तो कभी समझ भी नहीं पायेगी
मौत का वो मंजर किसने जीया था
कविताओ से भी ना वो भाव मिलेंगे ,
जहर तेरे हिस्से का क्यों मैंने पीया था

तुम सदा हंसती खिलखिलाती रहो
गलतियो को तेरी मैं सुधार लूँगा
बस दुःख तेरे छीनकर सारे ,
अपने सारे सुख तुझे उधार दूंगा

जितना भी दुःख तुझे महसूस हुआ होगा ,
वो तो मेरे वाले की बस झलक ही थी
तीन जन्म और तीन आत्माओ की बात
तुझे बस एक प्रेम कथा की भनक सी थी

मैंने तो अपनी तकदीरो का रंग बदलते देखा हैं
प्यार की मंजिलो पर नसीबो को बिखरते देखा हैं

शिव जी के विधान को भी कभी बदल दिया था
पर तेरे जीवन में ना कभी दखल दिया था

कभी कभी मन करता हैं कि एक संकल्प कर ही डालू
माया के उस दौर को बस अभी मसल ही डालू

तब तू देखे कि मेरे प्यार और त्याग से ना कुछ बड़ा होता हैं
"वीरेन" की आत्मा में समाया जब श्री हरि खड़ा होता हैं

मंगलवार, 22 जून 2010

राष्ट्र प्रेम- मेरे भारत देश को सम्पर्पित

आज कुछ मन किया कि उस वतन को भी रूह में बसाये जिसकी हवा से सांसे उस खुदा ने बख्शी हैं । देशभक्ति का जज्बा उन परिवारों से पूछो जिन्होंने देश के लिए अपने सपूत , भाई , पिता राष्ट्र कि रक्षा में झोंक दिए । हालाँकि राजनीति कि तो बुराई लिखने कि मेरी आदत हैं । पर फिर भी मैंने पूरी कोशिश हैं बचने की । एक सच्चे देशवासी होने के नाते मैंने कोशिश की हैं की जो लिखू वो भारतीय के शब्द हो किसी हिन्दू मुस्लिम के नहीं नहीं तो आजकल धर्म और देश की प्राथमिकता की परिभाषाओ ने संदेह के सिवा कुछ नहीं दिया हैं ।

तुम रास्ता तो बनो रोड़े तो हट जायेंगे
प्रताप तो चुनो चेतक तो छंट जायेंगे

क्रिकेट में ना उलझो प्यारो ,देश के लिए भी कोई खेल हो जाये
सत्ता भले फूट डलवाती रहे , हिन्दू मुस्लिम में बस मेल हो जाये
भारतीयों पर अब भी विदेशी ही तो राज कर रहे हैं
घाघ चरित्र वाले कुछ दलाल भ्रष्ट सत्ता कि गुलामी कर रहे हैं


जनाधार जिनका नहीं भविष्य उन्हें बताया जा रहा हैं
छिपी हुई नीतिओ से राम का अतीत भी मिटाया जा रहा हैं
लोकतंत्र को ये कैसा संविधान बताया जा रहा हैं
वोट से नहीं उत्तराधिकार से नेता लाया जा रहा हैं

क्या करेंगे ये महिलाओ का तैंतीस फ़ीसदी आरक्षण
मुद्दों से बस ध्यान बंटाया जा रहा हैं
सुलग रहा अंदर अंदर मेरा भारत
झूठी संवेदनाओ से उसे बुझाया जा रहा हैं


ना कर पाए जो शहीदों की विधवाओ का सम्मान
संसद पर उन कायरो ने हंगामा मचाया हुआ हैं
चापलूसी और नपुंसकता ही रह गए राजनीति के मायने
सर्वोच्च पदों पर तभी तो ऐसो को बिठाया गया हैं

सत्ता के नशे में जो जनता को भुलाने जा रहा हैं
इतिहास उनकी अब धुल उड़ाने रहा हैं
बाजुओ में ताकत नहीं इन विदेशी गुलामो की
कायरता को शांति की चादर से छुपाया जा रहा हैं

ना जरुरत हमें लड़ाई लिए भेड़ो के देश की
देशभक्त तो एक अकेला शेर ही होना चाहिए
गैरत अगर बची हैं तो सच्चे लोग साथ हो ले
बदलाव अगर भारत में लाना हैं जान से हाथ धो ले

हर जन्म में तेरे लिए मातृभूमि मिट जाऊंगा
इस जन्म में भी सरहद पर वीर बन काम आऊंगा
कोई ना जाने मेरे बारे में इस बात कि परवाह नहीं
देश के लिए जलते शोलो में भी "वीरेन " को आह नहीं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...