मंगलवार, 31 अगस्त 2010

प्यार पर कविता भाग-19


पिछली कड़ी में ही ये उन्नीसवी कविता हैं .


मेरे कंधे पर जब तुम सर रखती थी
तेरे लिए मेरी एक कविता बनती थी
साथ मेरे होने से तेरी किस्मत हंसती थी
तन्हाईयां ना तब तेरा दामन डसती थी

तेरे भावो को अपने शब्द दिए थे
तेरे सुखो के सारे रस्ते खोल दिए थे
सपनो को तेरे मैंने अपने नैन दिए थे
तू उड़ने लगी जब तो पंख दिए थे

मैं सबंधो की मर्यादा का ध्यान रखता था
आखिरी साँस तक तेरी राह तकता था
तेरे रोम रोम पाने को को मेरा दिल तरसता था
तेरी खुशबु में बह जाने को मेरा अंतस तड़पता था
तुझे छूने को मेरा अंग अंग मचलता था
तेरी ओर आने को एक लावा धधकता था

फिर जब तुने कुछ भी ना कहा था
तब मैंने ये क्या भूचाल सहा था
भविष्य का तुझे कहाँ पता था
इसीलिए मैंने इसे एकतरफा कहा था

शायद मेरे इतने जन्म ख़राब ना होते
तेरे जज़्बात अगर पहले मचले होते
मेरे अध्यात्म के यु झमेले ना होते
दुखो के मेरे यु सवेरे ना होते

कृष्ण राधा सा ही तो मेरा प्यार था
तेरी हर साँस पर मरना स्वीकार था
शिव और शक्ति का ही तो बस मिल जाना था
भूली राह पर ही तो लौट फिर कर आना था

मै ऐसा नहीं ना मुझे ये शोभा देता था
मेरा क्या स्वार्थ जो तेरे दुःख झेल लेता था
नैतिकता का कौन सा मानदंड तोड़ देता था
सिर्फ अपना भला करना ही तो छोड़ देता था

सूरज किरण होकर चिराग से रौशनी खोजती थी
प्रकाश की तू स्वामी और अँधेरे में सोचती थी
क्या कभी सच्चा प्यार बिना जन्मो के बंधन से मिलता हैं
किस्मत जगी तेरे जीवन में "वीरेन "आ गया लगता हैं

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सोमवार, 23 अगस्त 2010

इश्वर से खुंदक खायी हुई कविता .

मेरे कई ऑनलाइन साधक दोस्त हैं जो इश्वर की चापलूसी में ज्यादा व्यस्त रहते हैं . अब मेरे जैसे घमंडी व्यक्ति से तो कुछ सहन होता नहीं हैं , इसीलिए उनके विरोध में खड़ा हो जाता हु की क्यों ईश्वर की झूठी बड़ाई कर रहे हो भाई . इसी विषय को लेकर एक कविता रच डाली , आशा हैं आपको बिलकुल पसंद नहीं आएगी ( इससे मुझे क्या )


उस ईश्वर से इतना क्यों प्यार हैं
ना जिसे सच्चो की दरकार हैं
वृन्दावन का ग्वाला हमें ना कुछ समझता हैं
तभी तो ऊंची ऊंची धर्म-दुकानों पर सजता हैं
मेरे प्यार पर वो कभी पिघला नहीं
कैसा मानू कि वो छलिया नहीं

आँखे उसके लिए रो रो कर सूज गयी थी
इंतज़ार करते करते जब हिम्मत टूट गयी थी
संसार कि हर ख़ुशी जब रूठ गयी थी
उस ग्वाले के हाथो मेरी किस्मत फूट गयी थी

ना मेरी भावनाओ को वो कभी मान दे पाया
सिर्फ मैंने उससे माँगा था अपना हमसाया
मेरे प्यार को भी उसने कर दिया पराया
दुखती मेरी नस नस में दर्द भर आया

तब क्यों ना ईश्वर को अपने परम होने का ज्ञान हुआ
भोली राधा जी को बस छोड़ देना उसे आसान हुआ
ना उसे कभी हमारे प्यार कि कद्र थी
जलते हमारे सारे दिन और राते सर्द थी

जब भी उस कृष्ण की कोई चापलूसी करने आएगा
सच कहता हु ना मेरे व्यंग्य से बच जायेगा
मेरी हस्ती कुछ नहीं पर उसकी भी तो रहने ना दूंगा
मेरा हक़ तो ना मिल पाया उसके हक़ भी तो ना दूंगा

वो एक भ्रम और दुखियो को भुला बैठा व्यापारी हैं
गरीबो का जल नहीं अमीरों की मदिरा स्वीकारी हैं
अगर प्यारा हैं तो दूर क्यों रहता हैं
जिम्मा उसका हैं फिर मेरा मन क्यों वियोग सहता हैं

कही कभी किसी रोज़ रहा चलता मिल जायेगा
सच कहू तो बिना डांट खाए ना हिल पायेगा
तब मैं इतना रुलाऊंगा कि हाथ जोड़ लेगा
आखिर में अपना मुह मेरी ओर मोड़ देगा .
-
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

रविवार, 1 अगस्त 2010

प्रभु नारायण से प्रार्थना cum शिकायत

ये कविता मेरी तरह के कुछ इश्वर साधको के लिए हैं जो जटिल परिस्थितियो में कुछ दुर्लभ भावो को महसूस करते हैं । कई बार कुछ बाते तर्कों से परे हो जाती हैं और मन को निचोड़ कर रख देती हैं । पूरी की पूरी कविता किसी की अमानत हैं । उसी का धन्यवाद हैं जो उसने मुझे छूट दी हैं लिखने की जो मैं श्री नारायण और आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ

प्यारे नारायण तुम जागते क्यों नहीं हो यार
कैसे बताऊ तुम्हे तुम ही समझा दो प्यार

क्यों मुझसे कहते हो कि कोई भी मुझसे शादी कर ले
क्या कीड़ी मकोड़ी भी इतने लायक कि मुझ ब्रह्म को वर ले
खुद अहम् में जकड़े हो पर इलज़ाम मुझे दे रहे हो
कितनी तरह से कह रहा हु पर हाथ ना तुम दे रहे हो

देखना किसी दिन कोई भूला दृश्य याद आएगा
गीता भागवत ना कोई फ़िल्मी नाटक आपको भायेगा
आपसे दूर रहकर भी मैंने क्या क्या जहर पिया हैं
शिव ही नीलकंठ हैं इस धारणा को झूठा किया हैं

पता नहीं ईश्वर के सब साधको में मेरी ही क्यों परीक्षा हुई
जिस दौर का फल मिलना नहीं उन्ही कर्मो की तितिक्षा हुई
पापो के भार से जिनके हिमालय भी नन्हे हो गए थे
मर्यादा शिखरों पर ऐसे चरित्रहीन खड़े हो गए थे

पिता के संकल्प से बनी ये एक पुत्र की प्रेम कहानी थी
कृष्ण ही यहाँ ढूंढता रह गया खो गयी मीरा दीवानी थी
सब कुछ सही होते होते आखिरी दम पर किस्मत पलटी थी
नजरो का धोखा लोगो को मार गया वर्ना कहाँ पृथ्वी चपटी थी

ना सपने ना मजबूरियां बस आपसे गहरा प्यार हैं
देवी देवता भी जगे नहीं दूर बहुत अवतार हैं

ग्लोबलायीजेशन करने वाले लोक लोकांतर तक क्यों नहीं जाते हैं
उड़नतश्तरी से डरने वाले क्यों त्रिदेव से अनभिज्ञ रह जाते हैं
मशीनों की नज़रो से क्यों सच जांचा जा रहा हैं
निर्जीवो से क्यों आखिर सजीव आँका जा रहा हैं

हे हरि जब तक जागते नहीं मुझे घुमाते रहोगे
मेरे करीब आते ही फिर मुझसे कहोगे
मैं तो सो रहा था तुमने जगाया क्यों नहीं
सृष्टि का भार अकेले उठाया मुझे बताया क्यों नहीं

काश आपको याद होगा हमने क्या तय किया था
पर सो आप गए थे और मैंने किस्मत का भय जिया था
आपकी माया ने मुझे सजा देकर आत्मा को भटका दिया था
कसूर मेरा सच्चा होना था इसीलिए फांसी पर लटका दिया था

सब आयामों में आपके साथ हूँ बस इसीलिए ख़राब हूँ
ऐसी वैसी कोई वस्तु नहीं आपके कर्मो का हिसाब हूँ
समय का एक पहिया जो हमेशा तेरे साथ चलता हैं
मैं हू एक झरना जो तेरे पर्वतो पर बहता हैं

चरणों में अर्पित हूँ बस अब तो स्वीकार करो
फिर भी तेरी गुंडागर्दी , ठुकरा दो या प्यार करो


!! हरि शरणम् !!
!! वीरेन्द्र !!

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

कुछ खबरों ने थोडा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं

कुछ खबरों ने थोडा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं जैसे पंद्रह करोड़ रुपये कसाब के ऊपर खर्चरेल मंत्रालय कि बेलगाम गाड़िया और जवाबदेही के नाम पर बयानबाजिया जो सास बहु के झगड़ो से ऊपर कि संवेदनशीलता भी नहीं रखती

अभी एक दो और नए नए कर सुनने को मिल रहे हैं जो सिर्फ हिन्दू तीर्थ यात्राओ पर लगेंगेहरियाणा में आई बाढ़ से बुरा हाल पर पता नहीं कुछ सरकारी भाषण मीडिया में रहे हैं कि सरकार ने बाढ़ से निपटने के सारे इन्तेजाम कर लिए हैं फिर हमारे मुख्यमंत्री सोनिया माता के दरबार में मत्था टेकने क्यों गए हैं कि एक हज़ार करोड़ रुपये कि जरुरत हैं
लेकिन कुछ और विवादस्पद काम हैं जो धर्मनिरपेक्षता कि झूठी नीतिओ के चलते भुगतना सिर्फ हिन्दुओ को ही हैं , और इसमें सहिष्णु हिन्दू ही बाद में धोखा खाता हैं .अब हुसैन वाली बात को ही ले । एक विक्षिप्त बूढ़े ने जानबूझकर चित्र बनाये और अभिव्यक्ति की आड़ में बच गया , सच में भले ही लोग शिव सेना या श्री राम सेना के व्यवहार पर चिंता जताए पर सच में ऐसे संगठन हैं तभी हिन्दू थोड़े रक्षा करने में सक्षम हैं नहीं तो हिन्दू धर्म को तो शांति , सद्भाव के नाम पर चबा जाने वाले मुस्लिम और इसाई संगठन कम नहीं हैं .

दुःख इस बात का हैं की राष्ट्र विरोधी ये सारे काम मस्जिदों , गिरिजाघरो और कांग्रेस , वाम पार्टियो में खुले आम देखे जा सकते हैं . जामा मस्जिद दिल्ली के भाषण यदा कदा चर्चा में रहते ही हैं . फिर भी देखिये शरियत और जेहाद की ओट लेकर कुछ भी गन्दा काम करिए . एक एन जी ओ खोलिए और देश विदेश का बेहिसाब पैसा खाए आपसे कोई टैक्स भी नहीं लेगा .

हिन्दू संत और साध्वी झूठे स्कैंडलो में फंसाए जाएँगे जबकि दुनिया के चर्चो में थोक के भाव जो नन और प्रीस्ट सबंध उजागर होते हैं उनकी कोई सुध नहीं लेता हैं । हाथ में एक के 47 लेकर भी कुछ इस्लामी युवक कहते हैं की इस्लाम शांति का धर्म हैं और वो तो कुरान को समझते हैं , पर हमारे हिन्दू संत जो सस्ते दामो पर दवाई उपलब्ध करवा देंगे , फ्री में लोगो के मनोबल को बढ़ाने के लिए खुद दुःख सह लेंगे , बिना किसी सरकारी सहायता के सेवा कार्य जारी रखेंगे . फिर भी कभी उन पर झूठे हत्या आरोप , झूठे चरित्रहीनता के आरोप लगवा देंगे . गोली चलाता कसाब मासूम लगता हैं . सेवा कार्यो में लगा संत मतलबी और पैसे का लोभी लगता हैं . ऐसे कितने ही घिनोने काम हैं जिन पर आप हमेशा प्रकाश डालते रहते हैं .

राष्ट्र की रक्षा जैसे सिर्फ हिन्दुओ का ही काम हैं , यहाँ के मुस्लिम और इसाई हमेशा धर्म को तरजीह देते रहेंगे । फिर भी आशा करते हैं की हमारा भारत चंद कांग्रेसी चापलूसों के हाथो बर्बाद न हो
सच्चे भारतीय शायद 2011 का इंतज़ार कर रहे हैंशायद कुछ पहले जाते तो थोड़ी रहत मिल जाती
,
मनमोहन सिंह जी कही इस दीन दुनिया में कही हैं भी कि नहीं जो जनता से ये कहने कि हिम्मत करेकि मेरी नहीं चलती हैं जबकि ये बात नर्सरी के बच्चे को भी पता हैं कि मैडम कि सरकार रूप क्लास में कितनीचलती हैं ,

बुधवार, 14 जुलाई 2010

लड़की तो हमेशा मुक्त ही जन्मती हैं- मेरी कविता एक अलग सन्दर्भ

पहली बार शायद इस तरह के विषय पर कविता लिख पाया । ईश्वर कि कृपा हैं अगर आपको अच्छी लगे तो ।

लड़की तो हमेशा मुक्त ही जन्मती हैं
पूर्ण ब्रह्म में ही सदा उसकी चेतना रमती हैं

तभी शास्त्रों ने कहा होगा की वो पूजा ना करे
ईश्वर उसका अर्धांग और वो पति दूजा ना करे
ना जरुरत उसे व्रत उपवास और सन्यास की
बड़ी बड़ी बातो या ज्ञान के विन्यास की

बांटे सदा प्रेम और सौहार्द के भाव को
भूल जाये अपने अध्यात्म के चाव को
बस सरलता से बहने दे जीवन की नाव को
बस ना भूले अपने लज्जा के गाँव को

इसी परंपरा में तो गोपिओ का जन्म हुआ था
नतमस्तक जिनके आगे देवो का भी अहम् हुआ था
खुद शिव जी को भी गोपी बन रास में आना पड़ा
बस ब्रज कण बनने को ब्रह्मा जी को जाना पड़ा

माँ बहन बेटी बनकर भी वो तो सब बन्धनों से पार हैं
ऐसी निष्काम सेवा करने में तो पुरुष भी लाचार हैं
उसकी विनम्रता में ही
उसका तेज समाया हैं
खुद श्री हरि ने माया से स्त्री को बनाया हैं

virender.zte@gmail.com
!! श्री हरि : !!

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

परमेश्वर को पति रूप में पाने की इच्छा को व्यक्त करती एक कविता

यह कविता मेरी एक मित्र ने भेजी हैं जिन्हें परम तत्व का साक्षात्कार हो चुका हैं , उनका अभिप्राय अपने निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान को सगुण रूप में वरण करने के लिए काफी मार्मिक बन पड़ा हैं । आपको पसंद ना भी आये तो मेरे आनंद में कोई कमी होने वाली नहीं हैं । कविता समझ में आ जाये तो ढीठ बन जाये और मुझे कुछ ना बताये । बस पढ़े और सोचे , कि इश्वर से प्यार करने का क्या क्या भाव हो सकता हैं ,। पहले कविता में वो मेरी खिंचाई करती हैं फिर इश्वर की , तो आपके श्री चरणों में समर्पित :-

कविता लिखना छोडो भाई
पहले करवाओ मेरी विदाई
क्या कोई राजकुमार राजा होने को तरस गया है?
और एक राजा सच्चे वैराग से बरस गया है?
रिमझिम सा उठता एक संकल्प मुझे खींचता है
दुनिया का असली राजा अपना हक छीनता है
मुझे क्या पड़ी किसी छलिये से दिल लगाने की
नाम तो बताया नहीं क्या उम्मीद हो घर बसने की
मैं क्यूँ जाऊं किसी गुरुद्वार
मेरा तो हक है पति का प्यार
कितनी ही बार अलग नाम से मिलता है
उसी नाम को स्वीकारूं तो फिर जलता है
असली पहचान पूछूं तो शक्की समझता है
उसे नहीं पहचान पाई, बस ये ही रटता है
असली कहानी तो खुद उसे ही पता नहीं
ऐसे ही बदनाम कर रहा है, मैं तो उस से खफा नहीं
बहुवचन क्यूँ लगाऊं वो तो एक ही एक है
प्रकृति है रंग बिरंगी, उसी के रूप अनेक हैं
स्त्री तो सिर्फ प्रकृति का रूप है ये सबको ज्ञात है
पुरुषों की जात दो ही हैं ये मुझे विश्वास है
मैंने तो कबका उन्हें चुन लिया था
कितने फेरे लिए उधेड़े अनेक का रूप क्यूँ धर लिया था
अपनी इज्जत करवाने के लिए क्या शब्द ही काफी नहीं
खुद को बहुवचन बना लेना क्या ये शिवजी की जाति नहीं
फिर भी मुझे उनकी जाति समझनी जरूरी है
क्यूंकि मैं तो एक ही हूँ, न बँट सकना मेरी मजबूरी है
ऐसा नहीं कि किसी के भी भाव मुझे द्वैत का एहसास करवाएं
सिर्फ वो ही अलग प्राणी हैं, विश्वास हो तो प्राणपति हो जाएँ
किसी किसी से न प्रार्थना करुँगी
वीरेन चाहे तो बात करवाए, वर्ना बात ही न करुँगी
हरि ॐ

शनिवार, 10 जुलाई 2010

अपनी आत्मा बेच चुकी सरकार और मीडिया से दिल कि भड़ास ( कौन सुनेगा हमारी )

एक साधारण आम मध्यमवर्गीय भारतीय कि तरह मैं भी महंगाई की मार से परेशान हूँ । सच कहू पांच साल पहले जिस दस पंद्रह हज़ार में घर चल रहा था अब वो बीस पच्चीस तक पहुँच गया हैं , पर मेरी तनख्वाह तो नहीं बढ़ी हैं ।
अब नीचे मैं अपना दुःख शुरू करता हूँ
हे हमारे देश के सोये हुए प्रधानमंत्री ( श्रीमती सोनिया गाँधी सही रहेगा शायद )
मुझे अब तक समझ नहीं आया कि आप लोग हमारे दुःख दूर करने के लिए सत्ता में हैं या बढ़ाने के लिए । एक सूची देखिये जिन्होंने मेरा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं ।

एक :::::::महंगाई बढती जा रही हैं पर क्या आपकी सरकार कि जवाबदेही नहीं हैं क्याबी जे पी ने जो बंद किया था उसका भी मुझे तो नुक्सान ही हुआ क्योंकि हमारी कंपनी उसका किसी और दिन में शिफ्ट कर लेगीपर आप ने और मीडिया ने मिलकर बस तोड़ फोड़ को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया मेरी कमर टूट चुकी गृहस्थी पर कोई ध्यान नहीं दिया

दो
::: रोज़ रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं पर पता नहीं आप पाकिस्तान से मीटिंग में व्यस्त हैं , पूरे साठ साल से तो आप लोग यही कर रहे हो पर एक समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हो , साठ साल कि ढोंगी शांति से तो साठ दिन का सच्चा युद्ध ठीक हैंवैसे भी सैनिक भी तो हमारे परिवारों पर के ही मरेंगे , आप तो हमारे बस दुःख में शरीक होने के लिए एकदम सफ़ेद कपड़ो में आओगे , बिके हुए मीडिया चैनलों पर देशभक्ति की दुहाई दोगे , जबकि आपे बेटा बेटी कही स्विट्ज़रलैंड में जमा पैसो की रसीद कटवा रहे होंगे

तीन
:::::मुझे बताये की ममता बैनर्जी जी का हम क्या करेट्रेनों पर सुरक्षा की कमी होने से नक्सल हमलो में तेजी हो रही हैं पर वो कह रही हैं कि रेलवे का इससे कुछ लेना देना नहीं हैंमुझे डर हैं कि कल यही आपकी पार्टी के हर मंत्री ने कहना हैं कि आर्मी में घोटाला हुआ हैं पर रक्षा मंत्रालय का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं

चार
:::हम पढ़ते आये हैं कि देश में लोकतंत्र हैं और जनता के वोटो से चुनकर आये नेता ही देश चलते हैंआपको कहाँ कि जनता ने चुना हैं , किस मैडम को संविधान ने अधिकार दे दिया हैं कि वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी इच्छा से बना देती हैं , एक अरब लोगो के वोटो कि कोई कीमत नहींअब तो हद और भी हो गयी जो एक नासमझ से लगने वाले (और जिसे भारत कि आत्मा के बारे में पता नहीं हैं ) लड़के को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते कि वजह से हमारे ऊपर थोपा जाने वाला हैं

पांच
:::::हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया कम पत्रकारिता शायद आपने खरीद लिया हैंनहीं तो पिछले साल इतनी कमरतोड़ महंगाई के बाद भी आप कैसे जीत गएपिछले मुख्य चुनाव आयुक्त आपकी सरकार में मंत्री हैं और नए वाले सिर्फ आपके प्रति वफादारक्या सच में आपने वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी तो नहीं करवाई क्योंकि आम आदमी तो सच में बताऊ इतना परेशान था कि सिर्फ आपको हटाने को तैयार था

छः
::::::आपकी सरकारों के लोग कुछ ना कुछ बयान देते रहे पर हमारे घावो पर मरहम नहीं बल्कि नमक छिडकने जैसा काम किया , सारे बयान तो मैं नहीं लिख पाउँगा क्योंकि आप लोगो ने थोक में काम किया हैं , फिर भी गूगल पर सर्च मार ले शीला दीक्षित , शरद पवार आदि के बारे में

सात
:::::::::::माननीय सोनिया गाँधी ने कभी प्रधानमंत्री पद को त्यागा और संत बनीपर मुझे तो लगता हैं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को तो वो जब चाहे हड़का सकती हैं तो उनका त्याग मानने का मेरा दिल नहीं करताक्योंकि दरअसल वो तो बड़े पद पर हैं इनसे .

आठ
::::वैसे तो बाते और भी हैं पर बस ये कि आपकी सरकार में चापलूसी कि हद इतनी गिर गयी हैं कि सिर्फ एक परिवार का गुणगान करके प्रधानमन्त्री पद तक पाया जा सकता हैंमुझे दुःख होता हैं जब मैं एक आम भारतीय को देखता हूँ पर मीडिया हमारा या तो प्रियंका गाँधी के गालो के डिम्पल दिखा रहा होता हैं या उनकी साड़ी या उनकी चुनाव वाले दिन कि जींस टॉप कि बिंदास छवि

सबसे
ज्यादा दुःख मुझे उस दिन हुआ था और यकीन हुआ था कि हमारा पूरा देश नपुंसक हैं जिस दिन सोनिया गाँधी के साथ मनमोहन किसी शोक सभा सी में बैठे हुए थे तो प्रियंका गाँधी के बेटे के जूते के फीते बांधकर नेहरु गाँधी परिवार का क़र्ज़ अदा कर रहे थेक्या राष्ट्राध्यक्ष ऐसा होता हैं

मुझे पता हैं मेरी हर बात थोड़ी कांग्रेस और गाँधी परिवार के खिलाफ लगी होगी , पर क्या जो मेरे जैसे साधारण आदमी को इतने मुद्देदिख रहे हैं वो उन्हें प्रधानमन्त्री होकर भी नहीं देख सकते । हम तो अपने भारत के वर्तमान संतो को सुनने के बाद ही कोल्ड ड्रिंक तक को पीने में अपराध बोध महसूस करते हैं , एक पैसा किसी के हक़ का नहीं लेना चाहते हैं , नॉन वेज क्या अंडा भी नहीं खाते , सिर्फ धार्मिक स्थलों पर ही जाते हैं । सिर्फ इतनी साधारण सी जिंदगी हमारी सुरक्षित करने कि जिम्मेदारी किसी सरकार से नहीं हो पा रही हैं तो क्या उसे डूब कर नहीं मर जाना चाहिए । क्यों आत्महत्या नहीं कर लेते सारे मंत्री जो हमारे प्रतिनिधि होने कि नौटंकी करते हैं और मैडम के तलवे चाटने को मरे रहते हैं । ये वही शरद पवार हैं जो कभी कोंग्रेस से मैडम कि वजह से अलग हुए थे और आज देखो इनकी दुम उग आई हैं

बहुत बाते हैं इतनी कि सारी जिंदगी लिख सकता हूँ , बस थोड़े लिखे को ज्यादा समझना
और एक बात कीमते सरकार बढ़ा रही हैं पर फिर ढीठ बयान भी दे देती हैं कि कीमते नहीं घटेगी क्योंकि पैसे खा चुकी होगी शायद । पर मेरी सेलरी बढ़ाने की जब बात आती हैं तो दो साल से आर्थिक मंदी का बहाना बना लेती हैं । हमारा घटिया प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री या राष्ट्रपति कभी कभी जब बयान देता हैं की दुश्मन का मुहतोड़ जवाब देंगे तो उनकी पतली और मरी मरी सी आवाज़ सुनकर हंसी आ जाती हैं कि जिनकी आवाज़ तक गले से नहीं निकल रही हैं ये क्या देश संभाल रहे होंगे ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...