गुरुदेव दया कर दो की अब मै इस कविता के भाव को पुर्णतः दिव्य बनाकर इसमें आपकी दीक्षा से आई समझ से अलौकिक बनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर सकू. जो भी लिखा जायेगा वो आपकी दया होगी . सब आपका दिया हुआ हैं . पर मेरी नासमझी गलतिया करा देती हैं . फिर भी बापूजी मै आपके शरणागत हूँ . यह आध्यात्मिक कविता किसी व्यक्ति विशेष के उत्तर में हैं कोई मनोरजन के लिए नहीं . वो सूचित कर दे कि उनका मुद्दा सुलझा कि नहीं . बाकि सभी ज्ञान भक्ति से साधको से निवेदन हैं कि त्रुटी बता दे , आपके श्री चरणों में नमन .
मेंरी नजरो में देखो तो यही रूप सर्वोत्तम हैं ,
परमपुरुष शिव के भी इष्ट मर्यादा पुरुषोतम हैं
दोनों भेदों से पार गुरु का निर्गुण अहम् हैं
चरम बिंदु हो या लघु वीरेन उसे दोनों सहन हैं
अपना ही हमसाया सबमे फिर परिवार की बात कहा रही
माता पिता भाई बहन नहीं बस दुनिया एक नदी की धार बही
पूर्णब्रह्म हैं गुरु वो पूरा प्रेम भी जानते हैं
पर हमारी ख़ुशी के लिए कभी कभी व्यवहार मानते हैं
नहीं तो हम गलत मतलब भी समझ जायेंगे
और मनमाने अर्थो से अपना ही अनर्थ कर जायेंगे
उनका गुरु बन जाना हमारा ही स्वार्थ हैं
बापूजी का जन्म तो ईश्वर प्रार्थना का परमार्थ हैं
रघुबीर की इच्छा से ही हनुमान का अंतस हिला होगा
सूक्ष्म रूप से ना शायद ना सीता का पता मिला होगा
पूरब पश्चिप की बात क्या प्रेमाभक्ति तो दिशाओ से भी पार हैं
पूर्ण सरलता के लिए तो ज्ञान भी एक पक्की दीवार हैं
बस शरणागति का एक राजमार्ग सब धर्मो का सार हैं
बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते तो गोपियों के लिए बस भार हैं
सबको कृष्ण जी मिले तो भी राधा का दिल ना टूटेगा
वो कृष्ण की चेतना हैं उसका प्यार अलग हो तो ही बंटेगा
राम के विरह से भरत में उपजी वो द्वापर के विरह की छवि हैं
सच्चे प्रेम का एक आराधक क्या "वीरेन " भी कोई कवि हैं
जो तुने सहा वो तेरी साधना के अंतिम पड़ाव में था
तू किसी को दोष ना दे तेरा हमसाया किसी छलाव में था
वृक्ष की जड़ और शाखाये सच्चे प्रेमी होने की निशानी हैं
उनकी एक गाड़ी के दो पहिये की बात ना मैंने कभी मानी हैं
वो कभी एक जैसे होते ही नहीं सम्पूरक होते हैं
या वो दोनों स्त्री पुरुष या दोनों नपुंसक होते हैं
बस यही था "गे " या "लेस्बियन" का व्यभिचार
मेरी इन गूढ़ बातो को तुम कर लेना स्वीकार
पर ये सब एक क्षणिक अवसाद से आया तुझमे विचार था
त्रिदेवो तक को खंडित किया जिसने वो मन का व्यभिचार था
गुरुत्व तो चेतना की धुरी हैं
विधा ज्ञान और भक्ति हर बार उनसे ही जुडी हैं
वो कृष्ण और राम से उपजे परमहंस हैं
कलयुग मानस में उपजे संतो के राजहंस हैं
उनसा निराला कभी हुआ ना हो सकता हैं
विश्वगुरु बनाना उनका नहीं ईश्वर का स्वार्थ हो सकता हैं
कोई कही जन्मे या मरे हमें ना व्यवहार में पड़ना हैं
ईश्वर खुद कर्म काट दे और झाड़ दे जो झड़ना हैं
बापूजी के वचनों ने ही तो हमेशा राह दिखाई हैं
वर्ना ज्ञान ने तो हमेशा ही नौका डुबाई हैं
शिष्य होने पर भी कहाँ उन्होंने बंधन लादे हैं
हममे ही कमी हैं जो उनके सामने से भागे हैं
इस जन्म का सारे जन्मो से जिन्होंने मुझे पार किया
वही मेरे बापू हैं जिन्होंने बस अपना मुझे स्वीकार किया
फिर भी बहन अपने फायदे के लिए पढ़ ले जो पढना हैं
सिर्फ तेरी मदद के लिए आया और क्या "वीरेन" ने काव्य गढ़ना हैं
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1 टिप्पणी:
बहुत सुन्दरता से भावों को संजोया है…………प्रेम क दिव्य रूप दिखाया है और सब गुरु के चरणो मे ही समर्पित होता है।
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