काफी दिन हो गए थे कोई गंभीर सी कविता लिखे । जाहिर हैं अध्यात्म के लिए ही लिखी होगी क्योंकि कुछ चीज़े बीच में ऐसी घटती रहती हैं जो धर्म के विशिष्ट जनों से परामर्श के लिए जरुरी हो जाती हैं । कृपया ध्यान दे इस एक दुर्लभ कविता पर
जिंदगी मेरी किस दोराहे पर खड़ी हो गयी हैं
झूठी आशा में जीवन की खुशिया खो गयी हैं
मेरी नस नस रोम रोम में एक उम्मीद जिन्दा हैं
व्यवहार का वो मेरा अक्स जिस पर शर्मिंदा हैं
मेरे इष्टदेव मुझे सपनो में जब आकर कह जायेंगे
दुखती मेरी रग रग जब वो छू कर सहलायेंगे
मेरे गुरु या इष्टदेव सिर्फ एक बार तो सहारा दे जाते
पहले ही इतना टूट चुका हूँ इतनी अग्नि परीक्षा ना करवाते
मैं ये तो था ही नहीं जो अलग वेश धारण किया था
परमभक्ति का अधिकारी कैसी वासना का नरक जिया था
सिर्फ ईश्वर कि आँखों का ही मुझे सहारा था
अक्स अपना कुछ उसने हमसाये में उतारा था
अध्यात्म की कुछ कडियों का ही बस नज़ारा था
बुरे दौर में मन के अपराध बोध को जिसने संवारा था
ये क्या हैं क्यों हैं जिंदगी कैसी पहेली बन गयी हैं
एक बुरी किस्मत अब जैसे मेरी सहेली सी हुई हैं
रातो के जागने कि अब गिनतिया भूल गया हैं
रुठती धर्म कि पगडंडियों पर भी झूल गया हु
क्या होगा अगर मुझे कोई योग भ्रष्ट का दाग लगा देगा
शरण किसकी मांगू जब शिव सा सरल भी मुझे भगा देगा
गुरु को तो सब पता हैं मेरी लाचारी तो वो हमेशा जानते हैं
मै कही का नहीं रहा फिर क्यों वो मुझे अब भी समर्थ मानते हैं
ज्योतिषियो की बात क्या मानू जब संकल्प से सब बदल सकता हूँ
सिर्फ अगर स्वार्थी हो जाऊ तो दुनिया का मुकद्दर बन सकता हूँ
पर यही तो वो अच्छाई हैं मेरी और मेरा जोर नहीं
दुसरे चाहे मुझसे सब छीन ले पर मैं कभी चोर नहीं
उस देवी के भी तो चरणों में गिरकर देख चुका हूँ
नाक रगड़ रगड़ कर कितनी बार उसके दर से उठा हूँ
क्या मैं इतना नीच हु की मुझे माफ़ ही नहीं किया जायेगा
क्या मैं इतनी दूर हू की कोई पार्षद ना मुझ तक हांका जायेगा
अपनी तरफ से तो हमेशा ही मजबूर होने की दुहाई देता हैं
बहन बेटी माँ दोस्त मानकर सारी उसकी बलाए लेता हू
क्या फिर भी मै कोई पाप की आंधी को जी लेता हू
कही कोई भगवान् नहीं बस एक बार तसल्ली से रो लेता हूँ
वो किसी की अभी अमानत क्या पता कभी मेरी होगी
आचार संहिता की कैसी नैतिक बातें जो हमारी जान लेंगी
कुदरत के सारे धर्म नयी परिभाषा मांगते हैं
समर्थ तो हूँ मैं पर जाने क्यों मेरे हाथ कांपते हैं
शायद कही अपने स्वार्थी होने का डर हैं
पक्षपाती होने का दाग लग जाने की मुझे फिकर हैं
जब खुद ही मै न्यायधीश बन गया हू
गवाही देने को तो फिर ना रह ही गया हूँ
प्रभु आपका बेटा हूँ बस अब स्वीकार लो
सारा कुछ तेरा किया धरा मेरा दुःख काट दो
फिर से वो ही भक्ति की धारा में लौटा दो
उस महान शिष्य की चेतना का पर्दा हटा लो
चाहे कुछ भी हो इस जन्म में भी उसे मिला दो
वीरेन सच्चा साधक हैं ये बस दुनिया में गूंजा दो
पूर्ण ब्रह्म का वो पथिक उस महान लड़की को पा जाए
पुरे सारे जहाँ को ये अनमोल रिश्ता दिल से भा जाये
विष्णु लक्ष्मी के बेटे बहु की वो पहली जोड़ी बन जाये
दुनिया के संकट के बदलो का अँधेरा अब छट जाये
ऐसा भी क्या कभी किसी के साथ अजब संयोग होता हैं
पूरी दुनिया के मालिक का बेटा क्या एक लड़की के लिए रोता हैं
अंतर्यामी एक जीव क्यों अपने स्वार्थ के लिए ना ईमान खोता हैं
त्रिदेव और सारे देवता जिस उलझन को सुलझा ना सके
मेरे ये कैसे आयाम जो सब मिलकर मुझे ना हरा सके
फिर भी मेरे अपने धर्म को सारे ग्रन्थ ना मिटा सके
मेरे अलावा कौन था जो इसे स्पिरिचुअल प्रोब्लम बता सके
ना अपना कोई लाभ ना भविष्य दिख रहा हैं
ऊपर बैठा कृष्ण मेरे लिए क्या क्या रच रहा हैं
दिल टूटा आत्मा लुप्त और दिमाग का कुछ ठिकाना नहीं
बिना स्वार्थ के लुट बैठा अब "वीरेन " सयाना नहीं
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2 टिप्पणियां:
ऐसी समस्या तो इस राह मे आयेगी और जो पार गया समझो जीवन जी गया उसे सब मिल गया……………बेहद उत्तम आत्मविश्लेषण्।
bas aap aise hi likhte chale jao sab problem door ho jayegi khud hi
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