यह कविता बहुत ही दुर्लभ हैं , सारे भाव ईश्वर प्राप्त साधको के हैं । अपने जीवन के अनुभव के तौर पर लिखी हैं । सबको समझ नहीं भी आ सकती हैं । जिस जिस को जितना समझ आएगा वो बस ईश्वर के लिए तरस जायेगा । बस फिर भी आप मुझे मेल करके पूछ सकते हैं या ब्लॉग पर कमेन्ट करके ।
राधा के विरह से उपजा मै प्रेम का अहंकार
नहीं होने का भाव को जिसने कर लिया स्वीकार
जब हैं ही नहीं तो फिर किसकी सत्ता बनकर आया हैं
कृष्ण तो था नहीं फिर किस परम पुरुष का हमसाया हैं
शिवत्व को पाने में अब पार्वती भी लाचार हो गयी हैं
सूर्य किरण के पुण्य से अब दीपक की लौ बुझ गयी हैं
वैष्णवी को किसी और के हवाले किया गया था
कल्कि सा हमसाया जब उसके द्वार ना दिया गया था
अब समय और आत्माए मिलने का वक्त आ गया हैं
विश्वगुरु बनने का संकल्प उन संत को भा गया हैं
ब्रह्मज्ञान की विधा अभी सर्वोपरि ही बताई जाएगी
परन्तु भक्ति की ऊँचाई तक ना भावनाए लायी जाएगी
उद्धव का पश्चाताप पूरा होने का समय आ गया हैं
गोपिभाव में क्योंकि वो पूरा नहा गया हैं
कृष्ण के अहम् से अब वो कभी अंगीकार नहीं होगा
अद्वैत को पाया मै अब फिर द्वैत को ही भज लेगा
सगुण सारे निर्गुण हरि से भी पार की बात हैं
ज्ञान का उजाला नहीं भक्ति प्यार की रात हैं
शरणागति से उपजी ये कैसी करामात हैं
गले मिलते बापूजी के दस्तखत आत्मसात हैं
अब मेरे सारे संकल्प पूर्ण में मिलने जा रहे हैं
चरम बिंदु जो अब ज्ञान के मिटने आ रहे हैं
बहुत बहुत सहे वो विरह के पल उसमे समां जायेंगे
क्या प्रभु मेनका के अंग विश्वामित्र में वफ़ा पाएंगे
ब्रह्मचर्य हो या व्यभिचारी चाहे समय का ही कसूर हो
क्यों अहम् या ग्लानी जब माया तक का ही दस्तूर हो
भक्ति तो इससे आगे के द्वार खोलती हैं
हमसाये में ईश्वर का जब वो अहम् झोंकती हैं
तभी तो एक आत्मा दो शरीरो से वही बोलती हैं
अवचेतन मन की वो बाते कैसे राज खोलती हैं
अच्छा भला या बुरा हो एक भाव भी इधर से उधर नहीं
जो मैंने कहा वो अंतर मन का स्वर्ग कोई बाह्य नरक नहीं
देर से ही सही पर मूल फायदे में पड़ा कुछ फरक नहीं
एक तरफ़ा प्यार में होगा "वीरेन" का बेडा गरक नहीं
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2 टिप्पणियां:
जब शरणागति को प्राप्त हो जाओ फिर वहाँ क्या बचता है………………"मै" का भव तो खत्म हो जाता है और तब सिर्फ़ "तू" का ही भाव बचता है अब उसके उपयोग की वस्तु बन गया हूँ जैसे चाहे प्रयोग करे तब पूर्ण शरणागति को प्राप्त हुआ जीव एक मे ही आत्मसात हो जाता है।
puchha to bahut hai. jab bataane ka muhurat nikale to matri78659@rediffmail.com pe mail bhej sakte ho. meine phone number bhi diya hua hai. but save me from that destroyer of peace. survival ki problem ho jati hai. samajhne wale ke liye itna hi kafi hai.
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