यह कविता मेरे एक आध्यत्मिक दोस्त ने भेजी थी पहले पैरा का थीम उसका हैं जो वैसे मैंने चेंज भी कर दिया . दुसरे पैरे से मेरे भाव हैं .
भगवान् को आने के लिए माहौल दिव्य पाया था
दर्द उनका अपना नहीं, भक्तो के हित वो जमीन पर आया था
कोई समझ ना सका जिम्मेदारी कितनी भयानक मिली थी
कीड़े से लेकर इंद्र तक की किरणें भरी हुई पड़ी थी
किस किस की भावनाएं सुनी होंगी, ये तो गिना नहीं जा सकता
भगवान् के सिवा किसी और से इतना सहा नहीं जा सकता
भगवान् सबकी सुनते हैं, भगवान् की कौन सुने प्यारे !
परमात्मा उन्हें सुनने योग्य स्वभाव मुझमे उतारें
मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
-- मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
Email:virender.zte@gmail.com
Blog:saralkumar.blogspot.com
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