शनिवार, 15 जनवरी 2011

भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर कविता

भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर ये कविता लिखी हैं . आशा हैं धार्मिक लोगो को पसंद आएगी .

आत्मा जैसे परमात्मा की भक्ति को तरसती हैं
संतो की मेघो रुपी करुना दुनिया पर बरसती हैं
प्रभु तेरे हर अवतार को प्रार्थना करनी हैं
रोम रोम में तुझे शरण कि धारणा भरनी हैं .

सनकादि ऋषियो मुझे अपने जैसा बच्चा ही बना दो
भक्ति ज्ञान आपका भागवत स्वरुप मुझे भी जना दो
व्यास के सारे पुराणो में आई वो सारी धर्म ज्ञान कि बाते
पुत्र जिनके शुकदेव रोशन कर गए परीक्षित की शापित राते

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर भी दासी के भाग्य में पुत्र का सौभाग्य दिया
देवर्षि नारद बनकर आपने ये अनोखा निष्कपट भक्ति सूत्र लिख दिया
देवहूति और कर्दम के दाम्पत्य को तुमने धन्य कर दिया
नौ बहनों के एक भाई बनकर कपिल मुनि का सांख्य रच दिया

अनोखे पति पत्नी बनकर सुयज्ञ और लक्ष्मी का जोड़ा पाया
इतिहास जिसका रहस्य बस हमेशा शास्त्रों में खोजता पाया
सती अनसूया और अत्री मुनि के त्रिदेव स्वरुप दत्तात्रेय तुम बनकर आये
अपने अगले अवतार में जिसे मारना था उस हैहेयिवंश को सहस्त्रबाहु बनाये

नर नारायण का रूप धरकर धर्म मूर्ति को तप का फल दिया था
उर्वशी को जंघा से जन्म देकर इंद्र को शर्मिंदा निष्फल किया था
फिर इन्ही धर्म मूर्ति को एक और दूसरा जन्म आपने दे दिया था
और इन्ही पृश्नी और सुतपा का बेटा बन अपना नाम पृश्नी गर्भा ले लिया था

दुष्ट वेन की भुजा से फिर आपने पृथु बनकर संतो का कल्याण किया
एक दयावान राजा बनकर पृथ्वी को बेटी का सम्मान दिया
सौ सौ बेटो के पिता ऋषभदेव बने और बेटे जड़भरत को तिलक कराया
उस परम ज्ञानी ने ही तो अगले जन्म में रहूगन को मुक्त कराया

सागर मंथन से आरोग्य के प्रतीक वो पहले चिकित्सा प्रधान
परम औषधि को खुद लेकर प्रगटे धन्वन्तरी भगवान
अमृत वितरण पर सबको मोहित करने मोहिनी बन आये
असुर राहू के शीश को काटकर केतु दो रूप बनाये

हंस और हयग्रीव अवतार बनकर तुम बस उद्धार करने आते हो
सब रूप तुम्हारे यही तो तो समय समय पर जाता जाते हो
ये चौदह अंशावतार पूरे हुए हम इनको शीश नवाते हैं
अब उस निर्गुण भगवान के पूर्ण दस अवतारों की गाथाये गुणों में लाते हैं

इस कल्प की स्थापना करने को मनु जी को चुन लिया
मछली का रूप धरकर जल में खड़े खड़े जैसे प्रलय का युग जिया
फिर मंदराचल अपनी पीठ पर रखकर कछुए ने समुन्द्र मंथन करवा दिया
माता लक्ष्मी को अपनी जान अपनाया और देवो को कल्प वृक्ष दिलवा दिया

वराह बनकर पृथ्वी को जल से निकाल कर ले आये
इसी द्वंद्व युद्ध में हिरण्याक्ष के प्राण पखेरू आपने उडाये
पैंतीस हज़ार सालो की हिरन्यकश्यप की तपस्या पर बच्चा प्रह्लाद भारी पड़ा
अनोखे मौत के वरदान की शर्ते पूरी करने नरसिंह जैसा भयंकर रूप अनाड़ी बड़ा

नन्हे नन्हे पैरो वाले वामन को तीन कदम भूमि भी ना मिली
शुक्राचार्य के त्यागे राजा बलि को बस पाताल की शरण मिली
जमदग्नि का वो उग्र बेटा परशुराम जिसने ब्रह्माण्ड को हिला डाला
इक्कीस बार क्षत्रियो को समेटा और सहस्त्रबाहु को मिटा डाला

फिर वो परम भक्त भरत का भाई राजा राम बनकर आ गया
माता सीता के अपहर्ता रावन को मिटाने सगुण राम छा गया
वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिसे शिवजी ने पूजा था
लक्ष्मण और हनुमान के लिए वैसा इष्टदेव ना दूजा था

फिर वो मेरा अपना गोपियो वाला अर्जुन का सखा कृष्ण आया
जिसकी बस अभी याद आते आते दिल भर आया
यदुवंश और कुरुवंश को नष्ट करने जिसने महाभारत रचाया
परम अवतारों का वो शिरोमणि इतिहास में जिसने विश्वरूप दिखाया

जरा जन्म और व्याधि को जिसने बुध बनकर समझ लिया
उस परम संत ने अपने असली रूप को झटक लिया
अब कलयुग में परम तेजस्वी जो भयंकर युद्धों का नज़ारा रचेगा
और फिर वो कल्कि माता वैष्णोदेवी के जीवन का सहारा बनेगा

फिर भी हरि तो अनंत हैं और अनंत रहेगा .
"वीरेन " को आदेश हैं तो बस लिखता रहेगा


कोई भी गलती हो तो कृपया मार्गदर्शन करे .



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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

Email:virender.zte@gmail.com
Blog:saralkumar.blogspot.com

1 टिप्पणी:

vandana gupta ने कहा…

अरे वाह भगवान के सारे अवतार समेट दिये…………बहुत ही सुन्दर और भावमयी लगी ये रचना………बडी दूर की सोच लाये मगर सार्थक लाये।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...