शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

भजन- नाथ थारे शरण पड़ी दासी ( स्वामी रामसुखदास जी )

पूज्य संत श्री रामसुखदास जी महाराज जी 2005 में ब्रह्मलीन हो चुके हैं । जो लोग स्वामी रामसुखदास जी के बारे में नहीं जानते वे कृपया धार्मिक संस्था " गीताप्रेस गोरखपुर " से छपने वाले साहित्य से सन्दर्भ प्राप्त कर सकते हैं । हम सब संस्कार चैनल पर उनके सत्संग भजन सुनते ही रहते हैं । सुबह सुबह उनका छः बजे के आस पास एक भजन आता था वो बहुत ही मनभावन हैं । इसमें भक्त की करुन प्रार्थना हैं अपने भगवान् के प्रति । भजन हैं :-
नाथ थारे शरण पड़ी दासी, नाथ थारे शरण पड़ी दासी
मोहे कर दो भवसागर से पार का दो जन्म मरण फांसी

नाथ मैं बहुत कष्ट पायी ,भटक भटक चौरासी योनी बिन ख्वाबे पायी

मिटा दो दुख्हों की राशी ,मोहे भवसागर से पार...
नाथ मैं पाप बहुत कीन्हा , संसारी भोगों की आशा ने दुःख बहुत दीन्हा

कामना हैं सत्यानाशी ,मोहे भवसागर से पार ......

नाथ मैं भक्ति नहीं कीन्ही ,झूठे भोगों की तृष्णा ने उम्र खो दीन्ही

दुःख मिटाओ हे अविनाशी , मोहे भवसागर से पार ........

नाथ अब सब आशा टूटी ,थारे श्रीचरणों की भक्ति एक हैं संजीवनी बूटी

हूँ नित दर्शन की प्यासी , मोहे भवसागर से पार ................

पंथी हूँ मैं उस पथ का

यह गीत सिर्फ sad song सुनने वालो ने ही सुना होगा । और इसके दर्द को महसूस भी वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने कदम दर कदम सिर्फ दुःख ही दुःख देखा होगा । मेरी यह पोस्ट आपको निराश करेगी क्योंकि इसमें कही से भी कोई positive aspect नहीं हैं । असल में किसी दुसरे के दुःख को कभी भी judge नहीं किया जा सकता ।
सिर्फ आपने अगर दुःख को जीया हो तो ही ढंग से sad songs के lyrics की बड़ाई करने का मन करता हैं ।
किशोर कुमार की आवाज़ में गाये गए इस गीत के बोल बहुत ही लाजवाब हैं

पंथी हूँ मैं उस पथ का , अंत नहीं जिसका
आस मेरी हैं जिसकी दिशा आधार मेरे मन का
संगी साथी मेरे अंधियारे उजियारे
मुझको राह दिखाए पलछिन के फुल्झारे
पथिक मेरे पथ के सब तारे
और नीला आकाश

इस पथ पर देखे कितने सुख दुःख के मेले
फूल चुने कभी खुशिओं के कभी कांटो से खेले
जाने कब तक चलना हैं मुझे इस जीवन के साथ
पंथी हूँ मैं उस पथ का ................

फिल्मों में गंभीर शायरी - कुछ शेर

हमारी हिंदी फिल्मो में अब वैसे काफी बदलाव आया हैं और अब गाने के बोल संवेदनशील कम रहा गए हैं । फिर भी कुछ पुराने और नए गानों में कई बार बहुत ही अच्छे शेर प्रयोग किये जाते हैं । इनमे से कुछ हैं :-

जिनको लगता हैं कि उनका चाहने वाला किसी और को पसंद करता हैं पर ऊपर से उनका होने का दिखावा करता हैं, उनके लिए दिलीप कुमार अभिनीत " आदमी " फिल्म के शीर्षक गीत से पहले की ये पंक्तिया प्रस्तुत हैं

तेरी मुहब्बत पे शक नहीं हैं तेरी वफाओं को मानता हूँ मगर तुझे किसकी आरज़ू हैं मैं ये हकीकत भी जानता हूँ


ये उनके लिए हैं जो अपने सपने तो लगभग पूरे कर लेते हैं । परन्तु मंजिल पाने के आखिरी चरण में जिन लोगों के लिए या जिन लोगों के साथ उन्होंने ये सपना देखा था वो अब उनके साथ ही नहीं हैं तो फिर उन्हें मंजिल पाने कि कोई चाह नहीं रहती । गाना आपने सुना होगा "मंजिलें अपने जगह हैं रास्ते अपनी जगह" । इस गाने से पहले ये शेर गाया गया हैं ।

मंजिलों पे आ के लुटते हैं दिलों के कारवां
कश्तिया साहिल पे अक्सर डूबती हैं प्यार कि


ये शेर मैंने गोविंदा की फिल्म गैम्बलर से लिए हैं दोनों ही शेर काफी अच्छी तरह से फिल्म में पेश किये हैं । पहला शेर झूठी हमदर्दी दिखने वाले लोगों के लिए हैं । और दूसरा अपने चाहने वालो से धोखा खाए हुए लोगों से हैं .
हर मोड़ पर मिल जाते हैं हमदर्द,

शायद मेरी बस्ती में अदाकार बहुत हैं


इस दौर में जिससे थी वफ़ा कि उम्मीद ,

आके उसी के हाथ का पत्थर लगा मुझे

अभी इस पोस्ट में थोड़ी ही सामग्री डाली हैं बाकि धीरे धीरे और भी फिल्म के गंभीर किस्म के शेर अगली पोस्टों में डालने की कोशिश करूँगा .

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

अलविदा ( दसविदानिया ) ( कैलाश खेर की आवाज़ में )

कुछ फिल्म और गीत हमेशा लीक से हटकर बनाये जाते हैं । इन्ही में से एक हैं फिल्म " दास विदानिया "। ये फिल्म हालीवुड फिल्म द बकेट लिस्ट से प्रेरित हैं ।

शीर्षक कुछ अजीबो गरीब हैं । असल में रूसी भाषा में do svidaniya का मतलब अलविदा होता हैं । इस फिल्म का अलविदा वाला गाना एक तरह से क्लाइमेक्स भी हैं । थोडा इसकी कहानी आपको बता दूँ जिससे आप lyrics की पृष्ठभूमि को समझ सकें ।

इस फिल्म का नायक विनय पाठक ( फेम खोंसला का घोंसला और भेजा फ्राय ) एक Multi-national company में Manager होता हैं । उसका छोटा भाई लव मैरिज करने के कारन इससे अलग रहता हैं । इसकी शादी नहीं होती हैं । इनकी मम्मी अक्सर बीमार भी रहती हैं । इसका बॉस सौरभ शुक्ला हमेशा बस इसे तंग करता रहता हैं साथ में कम्पनी कर्मचारी भी कोई ज्यादा सहयोग नहीं देते हैं ।

कहानी में और बड़ी मुसीबत होती हैं जब इसे पता चलता हैं की इसे कैंसर हैं । यहाँ पर इस फिल्म का ये अलविदा वाला गीत शुरू होता हैं , हालाँकि ये आगे भी थोडा थोडा दोहराया जाता हैं . अपनी पिटी पिटाई जिंदगी में बदलाव लाने के लिए ये चार पांच चीज़ें मरने से पहले करने की सोचता हैं जैसे पुरानी मित्र को आई लव यू बोलना , एक बड़ी कार लेना , विदेश यात्रा , बॉस को बेईज्ज़त करना और बेस्ट फ्रेंड से मिलना ।

ये सारे अरमान पूरे करता हैं पर दोस्त के पास जब विदेश जाता हैं तो दोस्त की पत्नी सोचती हैं की ये शायद केंसर का इलाज़ करने आया हैं तो बेचारा दोस्त का घर छोड़ देता हैं । वहां एक रूसी लड़की इसकी पिटाई कर देती हैं , तभी यह अलविदा वाला गाना शुरू होता हैं । इसके बाद ये आत्महत्या करने के लिए नदी में डूबने की कोशिश करता हैं की तभी यही रूसी लड़की इसकी जान बचाती हैं और इसकी दोस्त बन जाती हैं । फिल्म वैसे सबको पसंद नहीं आ सकती हैं ।

गीत के बोल ये हैं , ( स्वर कैलाश खेर का हैं )

जग सूना सूना ठहरा सा , मेरा सपना अपना गहरा गहरा सा

सारे शहर की जगमग के भीतर हैं अँधेरा

हर मुस्कान के पीछे छुपा हुआ गम का चेहरा

यही हैं सच तो हर पल को जी लूँ मैं जीभर के

और हंस हंस के ये कह दूँ दुखों के पत्थर से

अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा

कोई वक्त के आगे हारा हारा सा

कोई प्यार में फिरता मारा मारा सा

दिल के रिश्तों में क्यूँ दर्द हमेशा मिलता हैं

और क्यूँ काँटों पर ही फूल सुखों का खिलता हैं

यही हैं सच तो मैं इस सच को ही अपनाऊंगा

मर भी जाऊँगा तो मैं प्यार अमर कर जाऊंगा

अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा

जिंदगी ना मिल अजनबी बनके

बंदगी शामिल हर दुआ बनके

मरने से पहले वो अपने सारे बिल आदि पूरे जमा करा देता हैं । एक आखिरी सपना अख़बार में नाम छपना - इसके लिए वो एडवांस में अखबार में पैसा देता हैं अपनी मृत्यु के बाद रस्म पगड़ी के विज्ञापन का । इस तरह वो संतुष्ट होकर मर जाता हैं ।

हम ना समझे थे ( गर्दिश )

आप सभी ने जैकी श्रोफ और अमरीश पूरी द्वारा अभिनीत फिल्म गर्दिश के बारे में ज्यादा नहीं सुना होगा । 1993 में बनी ये फिल्म बड़ी ही वास्तविक सी लगती हैं ।

इसका मूल विषय यह हैं कि एक शिक्षित युवक जैकी श्रोफ का पिता एक पुलिस सिपाही अमरीश पूरी हमेशा ये सपना देखता हैं कि उसका बेटा उसके ही थाने सीनियर अफसर बनकर आया हैं । परन्तु जैसा कि हम मिडल क्लास लोगों के साथ होता हैं ये परिवार भी कुछ ऐसे ही हालत देखता हैं । बेरोज़गारी से त्रस्त युवक जब अपने पिता का अपमान देखता हैं तो एक गुंडे से भिड जाता हैं आत्म सम्मान के लिए। फिर इसका पिता इसके ही खिलाफ हो जाता हैं कि क्या जरुरत थी ये सब करने क़ी ।

और दुखद पहलु ये कि जैकी श्रोफ पर पुलिस केस दर्ज हो जाता हैं जो उसके पुलिस अफसर बनने के सपने को तोड़ देता हैं । आस पास के इलाके में जैकी श्रोफ एक गुंडे के तौर पर मशहूर हो जाता हैं जो वो और उसका परिवार कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था।

इन्ही पंक्तियों में जैकी श्रोफ का दर्द बयान करता एक गीत उभरता हैं जो इस फिल्म की जान हैं और हमारे जैसे टूटे हुए सपने झेलने वालो को भावुक बना देता हैं , स्वर बाल सुब्रहमन्यम का हैं और गीत लिखा हैं जावेद अख्तर ने । इन पंक्तिओं का भाव बस यही हैं की जब हमारे जीवन का सबसे बड़ा सपना टूट जाता हैं तो कैसा लगता हैं .

हम ना समझे थे बात इतनी सी ,
ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की

आरज़ू हमने की तो गम पाए ,रौशनी साथ लायी थी साए
साए गहरे थे रौशनी हलकी ।, हम ना समझे .........

सिर्फ वीरानी सिर्फ तन्हाई जिंदगी हमको ये कहाँ लायी
खो गयी हमसे राह मंजिल की , हम ना समझे ......

क्या कोई बेचे क्या कोई बांटे अपने दामन में सिर्फ हैं कांटे
और दुकाने हैं सिर्फ फूलों की , हम ना समझे ......

मुझे ये गीत बहुत भाता हैं क्योंकि कभी कभी मुझे अपनी कहानी भी लगता हैं . गाने का लिंक नीचे दिया गया हैं कृपया सुन कर देखिये
http://www.youtube.com/watch?v=kEqvffo-DrQ

दर्शन दो घनश्याम -भजन

हम सभी ने थोडा बहुत नरसी भगत या नरसी मेहता के बारे में सुना हैं । सौराष्ट्र गुजरात में इन्होने पंद्रहवी सदी में जन्म लिया था । इन्हें सूर्यवंशी भगवान् श्रीराम के पूर्वज राजा मुचुकंद का पुनर्जन्म माना गया । भगवान् कृष्ण ने इनके वरदान के प्रभाव से कालयवन जैसे राक्षस को भस्म किया था । फिर भगवान् कृष्ण ने अगले जन्म में भक्ति का वरदान दिया जिससे यही राजा मुचुकंद भक्त नरसी मेहता के रूप में आये । इनके भजन बहुत लोकप्रिय हैं । " वैष्णव जन तो तेने रे कहिये जे पीर परायी जाने रे " वाला भजन तो महात्मा गाँधी जी ने आत्मसात किया था । इनके ऊपर जो 1957 में "नरसी भगत फिल्म बनी थी जिसमे ये नीचे वाला भजन लिखा गया था । कुछ लोगों ने "slumdog millionarie" फिल्म देखने के बाद इसे सूरदास जी का भजन मान लिया जो एक गलत तथ्य हैं । नरसी भगत फिल्म का भजन ये हैं :-

दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे

मन मंदिर की जोत जगा दो घटघट बासी रे

मन्दिर मन्दिर मूरत तेरी ,फिर भी दिखे ना सूरत तेरी

युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ,दर्शन दो ...........

द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले

अँधा देखे लंगड़ा चलकर पहुंचे काशी रे ,दर्शन दो ..........

पानी पीकर प्यास बुझाऊ नैनों को कैसे समझाउं

आँख मिचौनी छोडो अब मन के बासी रे ,दर्शन दो .....

निर्बल के बल धन निर्धन के तुम रखवाले भक्त जनो के

तेरे भजन में सब सुख पाऊ मिटे उदासी रे , दर्शन दो ......

नाम जपे पर तुझे ना जाने उनको भी तू अपना माने

तेरी दया का अंत नहीं हैं हे दुःख नाशी रे , दर्शन दो .........

आज फैसला तेरे द्वार पर मेरी जीत हैं तेरी हार पर

हर जीत हैं तेरी मैं तो चरण उपासी रे , दर्शन दो ......

द्वार खड़ा कब से मतवाला मांगे तुमसे हार तुम्हारी

नरसी की ये विनती सुनलो भक्त विलासी रे , दर्शन दो ...

लाज ना लुट जाये प्रभु तेरी नाथ करो ना दया में देरी

तीन लोक छोडो अब कर दो गंगा निवासी रे


दर्शन दो घनश्याम नाथ

मोरी अँखियाँ प्यासी रे .................

बुधवार, 13 जनवरी 2010

दैनिक कड़ियाँ भाग एक

यह विषय असल में मैंने अपने जीवन कि रोजमर्रा के हालातो से उठे ख्यालो को लिखने के लिए के लिया हैं
और वैसे भी आप सभी जानते हैं कि कुछ बातो को ज्यादा शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता हैंवे बस छोटी हो सकती हैं पर महत्व उनका बहुत अधिक होता हैंमैंने सोचा कि इन पर कोई बड़ी पोस्ट लिखना संभव ना हो तो कम से कम ऐसी तीन चार बातों को मिलाकर लिखने से कुछ तो प्रासंगिक होगाये दैनिक कडिया Tweeter या माइक्रो पोस्ट जैसी होंगी । इसमें जो बातें थोड़ी व्यंग्य जैसी होंगी उनमे सरल का नाम डाल दूंगा और बाकि तो जीवन में घटी हुई बातों में किसी के नाम कि आवश्यकता ही नहीं होंगी . जिंदगी में बीते रोज के सुख दुःख के अनुभव मैं दैनिक कडिया के क्रमशः भागों में पोस्ट करता रहूँगा .


कई ऑटो / टैक्सी वाले अधिक से अधिक सवारी भरने के चक्कर में बिलकुल अधर्म पर उतर जाते हैं . ऑटो में ठूंस ठूंस कर भरी सवारियो के बीच बस हमारा धैर्य कई बार जवाब दे जाता हैं , आँखों से दुनिया की झलक पाने के लिए सवारिओं के बीच में से दुनिया की झलक मिल जाती हैं और हमारे मन को नरक की


फोटोग्राफर कहता हैं आपका फेस ठीक नहीं हैं , सरल कहता हैं कि मुझे पता हैं , फोटोग्राफर चिढ जाता हैं कि बेवक़ूफ़ फिर अब तक कुछ किया क्यों नहीं ठीक करने के लिए । सरल सफाई देता हैं टाइम नहीं मिला हालाँकि वो जानता हैं कि वो पूरी दुनिया का सबसे खाली व्यक्ति हैं ।


पता नहीं क्यूँ 3500 करोड़ रुपये के शुद्ध लाभ के नीचे दबी कंपनी अगर सरल को 1414 रुपये और 56 पैसे का इन्क्रीमेंट दे तो हो सकता हैं आर्थिक मंदी का शिकार हो सकती हैंपर एक सवाल सरल के मन में उठता हैं की आज अगर कम्पनी लाभ में हैं लेकिन बाजार की आर्थिक मंदी के कारन मेरी सेलरी नहीं बढ़ा रही हैं लेकिन अगर एक साल बाद आर्थिक तेजी गयी तो क्या कंपनी घाटे में रहने कारन फिर सेलरी नहीं बढ़ाएगीबेमतलब का झूठा तूफ़ान सिर्फ कम्पनिओं ने अपने फायदे के लिए फैलाया हुआ हैं


एक आशंका जताई जा रही हैं की हमारे देश में सोचे समझे तरीके से स्वायिन फ्लू को फैलाया गयापूरे दो महीने चैनलो और सरकारों ने हमें जानबूझकर दवाईयों के नाम बतायेखुद बहार से आने वाले लोगो पर कोई फुलप्रूफ चेकिंग जैसा काम नहीं कियाऊपर से हमें समाचारों में निश्चित रहने को कहा गया की फलां फलां अमेरिकेन कम्पनी से बात हो गयी हैं , दवाई की कोई कमी नहीं होने दी जायेगीजबकि T B या कैंसर से इससे भी जयादा लोग मरते हैंपर बाहरी दवाई कम्पनी से मिली सरकार और मीडिया चैनल पैसा खा चुके थेऔर जब पूरा माहौल तैयार हो गया तो कोई टेंसन लेने को तैयार नहींअब तो मरीजों की संख्या भी शायद लाखों लोगों को पार कर चुकी हैं फिर कोई सरकार या चैनल संवेदनशील क्यूँ नहीं होतातब तो सात आठ मरीजों के लिए भी प्रेस कांफ्रेंस होती थीहमारे बेशर्म स्वास्थ्य विभाग ने कहा था की हमें कोई चिंता नहीं बस एक दो हफ्तों में हम नियंत्रण पा लेंगेपता नहीं जैसे हमारे देश में सरकार हैं भी या नहीं

कसाब को तो आप सभी जानते ही हैंउस को देश में LIVE टेलीकास्ट के जरिये सबने देखा थावो अंतिम अकेला आतंकवादी जो बचा थाउसने खुद गुनाह कबूल किया थादेश पर हमला जैसा सबसे बड़ा अपराध , जिसके देश के सब नागरिक चश्मदीद गवाह और उसे मुजरिम साबित करने के लिए सरकार ने उसकी ही सेवा में पन्द्रह करोड़ रुपये और एक वकील लगा दिएजबकि एक आम नागरिक कभी भी अपने रोज के झगड़ों के लिए वकील की फीस नहीं दे सकता हैंइस केस में साबित करने के लिए पता नहीं अभी क्या बचा हैं

ऐसी ही कुछ दिल को छूने वाली बातें आपके साथ शेयर करता रहूँगा । शीर्षक दैनिक कड़ियाँ ही रहेगा बस भाग का क्रम बढ़ता रहेगा ।



सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...