शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

फिल्मों में गंभीर शायरी - कुछ शेर

हमारी हिंदी फिल्मो में अब वैसे काफी बदलाव आया हैं और अब गाने के बोल संवेदनशील कम रहा गए हैं । फिर भी कुछ पुराने और नए गानों में कई बार बहुत ही अच्छे शेर प्रयोग किये जाते हैं । इनमे से कुछ हैं :-

जिनको लगता हैं कि उनका चाहने वाला किसी और को पसंद करता हैं पर ऊपर से उनका होने का दिखावा करता हैं, उनके लिए दिलीप कुमार अभिनीत " आदमी " फिल्म के शीर्षक गीत से पहले की ये पंक्तिया प्रस्तुत हैं

तेरी मुहब्बत पे शक नहीं हैं तेरी वफाओं को मानता हूँ मगर तुझे किसकी आरज़ू हैं मैं ये हकीकत भी जानता हूँ


ये उनके लिए हैं जो अपने सपने तो लगभग पूरे कर लेते हैं । परन्तु मंजिल पाने के आखिरी चरण में जिन लोगों के लिए या जिन लोगों के साथ उन्होंने ये सपना देखा था वो अब उनके साथ ही नहीं हैं तो फिर उन्हें मंजिल पाने कि कोई चाह नहीं रहती । गाना आपने सुना होगा "मंजिलें अपने जगह हैं रास्ते अपनी जगह" । इस गाने से पहले ये शेर गाया गया हैं ।

मंजिलों पे आ के लुटते हैं दिलों के कारवां
कश्तिया साहिल पे अक्सर डूबती हैं प्यार कि


ये शेर मैंने गोविंदा की फिल्म गैम्बलर से लिए हैं दोनों ही शेर काफी अच्छी तरह से फिल्म में पेश किये हैं । पहला शेर झूठी हमदर्दी दिखने वाले लोगों के लिए हैं । और दूसरा अपने चाहने वालो से धोखा खाए हुए लोगों से हैं .
हर मोड़ पर मिल जाते हैं हमदर्द,

शायद मेरी बस्ती में अदाकार बहुत हैं


इस दौर में जिससे थी वफ़ा कि उम्मीद ,

आके उसी के हाथ का पत्थर लगा मुझे

अभी इस पोस्ट में थोड़ी ही सामग्री डाली हैं बाकि धीरे धीरे और भी फिल्म के गंभीर किस्म के शेर अगली पोस्टों में डालने की कोशिश करूँगा .

1 टिप्पणी:

kunwarji's ने कहा…

एक अच्छा संग्रह बनता जा रहा है ये अच्छी शायरी का!

ये सब एक जगह मिलना कही और मुश्किल सा है,

चार पंक्ति हमारी और से भी.



ये मैंने नुसरत फ़तेह अली खान कि ग़ज़ल में सुनी थी,

मुझे अछे लोग बहुत मिले मै तो उनके क़र्ज़ से मर गया,
अगर हो सके तो कभी-कभी तो खराब बन के मिला करो,



ये मैंने देवदास फिल्म में सुनी थी,

दिल के छालो को कोई अगर शायरी कहे तो परवाह नहीं,
तकलीफ तो तब होती है जब लोग वाह-वाह करते है!

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...