गुरुवार, 21 जनवरी 2010

हम ना समझे थे ( गर्दिश )

आप सभी ने जैकी श्रोफ और अमरीश पूरी द्वारा अभिनीत फिल्म गर्दिश के बारे में ज्यादा नहीं सुना होगा । 1993 में बनी ये फिल्म बड़ी ही वास्तविक सी लगती हैं ।

इसका मूल विषय यह हैं कि एक शिक्षित युवक जैकी श्रोफ का पिता एक पुलिस सिपाही अमरीश पूरी हमेशा ये सपना देखता हैं कि उसका बेटा उसके ही थाने सीनियर अफसर बनकर आया हैं । परन्तु जैसा कि हम मिडल क्लास लोगों के साथ होता हैं ये परिवार भी कुछ ऐसे ही हालत देखता हैं । बेरोज़गारी से त्रस्त युवक जब अपने पिता का अपमान देखता हैं तो एक गुंडे से भिड जाता हैं आत्म सम्मान के लिए। फिर इसका पिता इसके ही खिलाफ हो जाता हैं कि क्या जरुरत थी ये सब करने क़ी ।

और दुखद पहलु ये कि जैकी श्रोफ पर पुलिस केस दर्ज हो जाता हैं जो उसके पुलिस अफसर बनने के सपने को तोड़ देता हैं । आस पास के इलाके में जैकी श्रोफ एक गुंडे के तौर पर मशहूर हो जाता हैं जो वो और उसका परिवार कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था।

इन्ही पंक्तियों में जैकी श्रोफ का दर्द बयान करता एक गीत उभरता हैं जो इस फिल्म की जान हैं और हमारे जैसे टूटे हुए सपने झेलने वालो को भावुक बना देता हैं , स्वर बाल सुब्रहमन्यम का हैं और गीत लिखा हैं जावेद अख्तर ने । इन पंक्तिओं का भाव बस यही हैं की जब हमारे जीवन का सबसे बड़ा सपना टूट जाता हैं तो कैसा लगता हैं .

हम ना समझे थे बात इतनी सी ,
ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की

आरज़ू हमने की तो गम पाए ,रौशनी साथ लायी थी साए
साए गहरे थे रौशनी हलकी ।, हम ना समझे .........

सिर्फ वीरानी सिर्फ तन्हाई जिंदगी हमको ये कहाँ लायी
खो गयी हमसे राह मंजिल की , हम ना समझे ......

क्या कोई बेचे क्या कोई बांटे अपने दामन में सिर्फ हैं कांटे
और दुकाने हैं सिर्फ फूलों की , हम ना समझे ......

मुझे ये गीत बहुत भाता हैं क्योंकि कभी कभी मुझे अपनी कहानी भी लगता हैं . गाने का लिंक नीचे दिया गया हैं कृपया सुन कर देखिये
http://www.youtube.com/watch?v=kEqvffo-DrQ

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