रविवार, 12 सितंबर 2010

एक हास्य कविता - शादी के लिए लड़की ढूंढना

यह एक हास्य कविता हैं. सब कुछ वही सा हैं जो आमतौर पर किसी के जीवन में लड़की ढूँढने में होता हैं , मेरा दुःख आपका पूरा मनोरंजन करेगा .

सरल कुमार की अभी तक शादी नहीं हुई थी
कम से कम एक लड़की को तो बर्बादी नहीं छुई थी
फिर भी उसका एक लड़की ढूंढो अभियान चल रहा था
बेवक़ूफ़ दिमाग में ऐश्वर्या को पाने का ख्वाब पल रहा था

तो धीरे धीरे आना जाना लगने लगा
अपनी लुटिया डुबोने को सरल परिश्रम करने लगा .
एक एक कर के उम्मीदे सारी छूटती गयी
नीचे कविता बताएगी की कैसे किस्मत फूटती रही

टुनटुन की एक बहन देखने जो चला गया
सोफे में उसे बैठे देख भैंस होने का भ्रम लगा
पिछले जन्म की कोई हाथी पल्ले पड़ रही थी
बड़े दांतों से क्योंकि शराफत जो झड रही थी
एक बार इतनी काली लड़की का रिश्ता आया
साथ खड़े होने पर जैसे नज़र का टीका लगाया
पतली एक कन्या का जब विकल्प आया था
पंखे बंद करने पर ही उसे ढूंढ पाया था
पढ़ी लिखी एक वधु मिल रही थी
पांचवी फेल वो लड़की इसीलिए बिना दहेज़ मिल रही थी
पता नहीं इतने अच्छे रिश्ते क्यों मिल रहे थे
सरल के अरमान बस धीरे धीरे मर रहे थे

गुज़ारा चलाने को एक दो भैंस पाल रखी थी
पर रिश्ते वालो पर पशु प्रेमी होने की झूठी ढाल रखी थी
टूटी मेरी साईकिल देखकर गाड़ी पटरी से उतर रही थी
हीनभावना मेरी देखकर वो काली लड़की भी निखर रही थी

लड़की के पापा ने पूछा बेटा कितना कमाते हो
शकल तुम्हारी फटीचर पर क्या वेतन भी ऐसा ही पाते हो
मैंने बोला पैकेज तो कम्पनी में ठीक ठाक मिल जाता हैं
रोज की तनख्वाह में मेरा फटा जूता सिल जाता हैं
सैंतीस रुपये का भारी ओवर टाइम भी मिल जाता हैं
मुझे दिखाना पड़ा जैसे मेरा पैसा स्विस बैंक जाता हैं
मुझे यूँ तो अच्छे घरो के रिश्ते आते हैं
बस शकल मेरी देख वो ईद के चाँद हो जाते हैं
आखिर क्यों वो मुझे अपनी बेटी देने से मना करते हैं
क्या हुआ अगर मेरे गुण लगभग उनके नौकर रामू से मिलते हैं

सिर्फ ईश्वर एक सीधी सी लड़की बनाना भूल गया था
विवाहित होने का सपना भंवर में डूब गया था
बस इन्ही बातो को लेकर सरल जी उदास हैं
आएगी कोई प्रिया बस यही "वीरेन " को आस हैं


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

शनिवार, 11 सितंबर 2010

प्यार पर लिखी एक और उदास कविता - भाग इक्कीस

बस जीवन पर लिखी थोड़ी उदास सी पोयम हैं . किसी को पसंद आएगी किसी को नहीं . फिर भी पढ़ ले अपने कीमती समय को ख़राब करने के लिए

मुझे अपनी गलती समझ नहीं आई थी
दिल मेरा था पर क्यों चाहते परायी थी
मेरे पुण्य से ही तो उसका दीपक जगमगाया था
जिसमे मेरा अतीत आया वो मेरा हमसाया था
मेरे मन को प्यारी वो अमानत लौटा दी जाये
मेरी दुआ और मेरे पुण्य सारे मुझे फिर मिल जाये

कितनी तर्कों की मै डोर पकड़ पाया
वक्त ने कैसे इन रिश्तो में उलझाया
सब कुछ मेरे लिए तबाही का मंज़र था
मेरे दिल में ईश्वर का लगा खंजर था

दूर दूर से ही ईश्वर हंसकर भाग गया था
मेरे सुख और उसके दुःख बाँट गया था
इष्ट मंत्रो का मोल अब समझ आया था
गुप्त ही रखना था गुरु ने बताया था

किसी नज़रिए से कभी कोई सपनो में भी नहीं था
पर भाग्य मेरा लिखना वाला चित्रगुप्त भी कही था
ज्यादा अच्छा होना भी क्या बेबस कर गया था
जल उठा चिराग जो पुण्य का तेल रम गया था

नींद उसकी उड़ जाती जिसे परमात्मा कहा गया
दुःख निर्गुण का मुझ सगुण से ना सहा गया
टूटती हसरतो में मेरा सपना बहा जाता था
हे हरि बता तो सही मेरा उससे क्या नाता था

सही और गलत सोच का आधार कुछ भी नहीं था
मर्यादा का जब मंजर तोड़ने को छुआ तक नहीं था
सिर्फ धर्म ही नहीं लुटेरो में कृष्ण भी वही था
जिसकी कोई मदद कर पाता वो "वीरेन " नहीं था

ज्ञानी सारे भगवान् के बड़प्पन कि दुहाई देते रहे
प्रेम के दर्द को नासमझी कहने के स्वर सुनाई देते रहे
कहाँ इष्टदेव कहाँ गुरुवर और सद्ग्रंथो की शरण हटी
बस जिंदगी किसी चरित्रहीन दिल की रेखा पर मर मिटी

अपने दिल में बसी उन यादो को कैसे भुलाऊ
कोई भी विश्वास ना करेगा चाहे मैं मिट जाऊ
सपने जब टूटे तो दूसरा कोई मदद नहीं कर पाया
कितनी बार वीरेन यूँ ही तो ख़तम होता आया

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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कृष्ण प्रेम -कविता


आज एक साधक इंदु बहन की पोस्ट पढ़ी कृष्ण दर्शन पर .उसका लिंक ये हैं

अब मेरे जैसा कृष्ण से गहरी खुंदक खाया इन्सान कैसे उसकी बड़ाई सहन कर लेता आदतवश फिर कलम बगावत कर उठी उस काले कलूटे के लिए जो सुन्दर भी नहीं हैं , पर फिर भी दुनिया दीवानी हैं भला राधा जी जैसा गौरवर्ण चेहरा भी धोखा खा गया इसके छल में तो फिर हम जैसो को सावधान रहना चाहिए . हम अपना दिल क्यों उसको दे जो कुछ औकात रखता ही नहीं हैं . क्यों उसे सर पर चढ़ाये जिसे हमारी भावनाओ की कद्र ही नहीं हैं .

हे साधक बहन !
भ्रम ही तो हैं कृष्ण ,
दुनिया का हमें कुछ पता नहीं
और वो कुछ पता देता नहीं.
पास जाओ तो गायब हो जाता हैं ,
दूर जाओ तो पीछे लग जाता हैं.
उस छलिये से कैसा ये नाता हैं
धोखा देना हमें उसे बहुत भाता हैं
सूने मन का वो ना सहारा हुआ
फिर भी भक्त होकर मैं आवारा हुआ
राधा को पाना भी जिसे गंवारा ना
हुआ
उस कपटी कृष्ण का मैं दीवाना हुआ
बस ऐसा सी ही कुछ शिकायत जैसा हैं
प्यार की दुनिया का ये रब कैसा हैं
धुंधला बादल सा वो क्यों फट नहीं जाता हैं
उफनी नदी का किनारा क्यों कट नहीं जाता हैं
ईश्वर बना कृष्ण क्यों मेरे दर पर नहीं आता हैं
प्यार में जो हाथ बढाओ तो काट खाता हैं
कितनी परेशानी दी होगी तभी मुझसे सजा पाता हैं
कलम में घुसकर "वीरेन " की बस लिखा जाता हैं

रविवार, 5 सितंबर 2010

प्यार पर एक लम्बी कविता -भाग बीस

यह कविता बहुत लम्बी हैं . सारे विषय मिश्रित हैं पर आधार प्रेम ही हैं . असल में एक विषयवस्तु पर लिखी रचना छोटी होती जाती हैं . इस कविता के सारे अंश मेरे और मेरी एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के संवादों से बने हैं बल्कि सच तो यही हैं की सार भाग उसी का हैं मैं तो सिर्फ एक "कूरियर "वाला हु . उसे अगर थोडा सा भी समय मिले तो बताये की मैंने सब चीजों को क्रम में रखा या नहीं, कम से कम baat . पूरे तीन चार महीने के विभिन्न भावो को जोड़कर एक कविता बनी हैं. जब आपके पास कम से कम पंद्रह मिनट हो तो ही इसे पढ़े . इसमें ईश्वर, soulmate प्रेम , धर्म ,समाज, भक्ति का वर्णन मिलेगा . बहुत ही सरल शब्दों में लिखने की कोशिश की हैं . कुछ भी गलत सही आपको लग सकता हैं , फिर भी आध्यात्मिक मार्ग के शीर्ष लोग
मुझे मार्गदर्शन दे.

संवाद यहाँ से शुरू करता हूँ
उसके ही शब्दों से श्रीगणेश रटता हूँ

प्यारे दोस्त, तुम तो एक कवि हो

जब भी आती है एक धारा बहकर
कह जाती है कुछ बातें रुककर
न जाने फिर क्यूँ कलम उठ जाती है
जैसे सारे दर्द बहा ले जाती है
एक सुकून सा छा जाता है दम पर
एक सागर आ जाता है जमीं पर

सचमुच! तुम एक कवि ही हो
इश्वर की रचना की अद्भुत छवि भी हो
भाव तुम्हारे जब शब्द बन जाते हैं

पर कभी तुम ये तो रहस्य बताओ
उस कृष्ण से जरा ये राज तू खुलवाओ
अकेले में अर्जुन को गीता सुनाई थी
अधिकारी समझ ही तो शरण दिखाई थी
फिर ये सबको कैसे पता चली
झूठी ज्ञान गंगा की ये कैसे लहर उठी

कृष्ण ने कब कहा ये सारे दुनिया के लिए हैं
क्यों कर्मयोग की सभी ढोलक शोर किये हुए हैं
प्रेमयोग को लोगो ने क्यों जबरदस्ती बदनाम किया हैं
स्त्री पुरुष की सृजन प्रक्रिया को किसने दरकिनार किया हैं

यूँ तो लोग छोटी छोटी वस्तु की भी गुणवत्ता परखते हैं
फिर सृजन की इस प्रक्रिया में वे कैसे झेंपते हैं
शादियाँ क्यों सख्त परंपरा और झूठी नीवो पर खड़ी हैं
सच्ची आत्माओ को मिलाने वाली परंपरा तो धर्म से बड़ी हैं

कुछ रहस्य जैसे धर्म तो सृजन से ही शुरू होता हैं
संत परंपरा में कोई "सम्भोग से समाधी " का भी गुरु होता हैं
कैसे कोई सच्चा प्यार ऊँचाई पा सकता हैं
कैसे वो प्रभु को काम में दिखा सकता हैं
प्रभु तो जोड़ी बनने को ही तरस गए हैं
क्योंकि दम्पति सिर्फ तनसुख में बस गए हैं

ठीक से निभाया हुआ प्रेम ही पवित्र होता हैं
अपना सच्चा प्यार मिलने से सतचरित्र होता हैं
इन्सान पर मोक्ष नहीं रिश्तो का ऋण होता हैं
अपने सच्चे प्रेमी को पाने में क्यों जीव सोता हैं

जो हैं कब के बिछुड़े उनको मिलाना ही धर्म होता हैं
नहीं संभव एक जन्म तो उनका पुनर्जन्म होता हैं
मेरे पिता का भार मुझ पर अगर थोडा रह जायेगा
पास ही के किसी परिचित के गर्भ में आकर कह जायेगा

यही तेरा प्यार कभी मेरी मृत्यु से तू पहचान ना पाया
तेरा यही क़र्ज़ चुकाने तो सारे संयोग वैसे ही बना पाया
मैंने देखा सब कुछ ऐसे जैसे इतिहास दोहराता हैं
तारिख पर तारिख बदली पर घटना क्रम सारा मेल खाता हैं

कैसे कैसे ज्ञान और प्रेम के तुने बिंदु छुए
एक धार्मिक बहन के हमसाये भी मिला दिए
ग़लतफ़हमी और ज्ञान सारा कुछ मिला जुला
दिल और दिमाग के निर्णय में जीवन का सार घुला

हमारे तन के इन वस्त्रो में कैसे कैसे नगीने जड़े हैं
कहाँ कहाँ से आये भाव और नए रिश्ते बन पड़े हैं
भगवान् भी तो "वीरेन " जैसो की ही परीक्षा लेते हैं
जो साफ़ होते हैं वो वस्त्र ही तो धुला करते हैं

रिश्तो की कहानी एक जगह फिर आकर मिल गयी
सांसो के मिलते ही प्रेम की वो धरा फिर हिल गयी
खड़े होने को कोई आधार बनता नहीं दिख रहा था
कौन जाने ईश्वर किस कलम से प्रारब्ध लिख रहा था

लेकिन युवाओ को तो जिस्मानी प्यार की ही ललक पड़ी हैं
अरे सच्चा प्यार तो आखिरी ज्ञान को लाने वाली जादू झड़ी हैं
एक गलत मिलन ना सुलझने वाली गांठे छोड़ जाता हैं
विज्ञान का तो पता नहीं पर धर्म में इसे पाप कहा जाता हैं
सच्चे प्यार ना मिल जाने से जीवन मरने लग जाता हैं
सुलझाएगा कृष्ण क्योंकि गलत मिलन से प्यार मर जाता हैं

अपने हमसाये को हम इसीलिए सदा सबमे ढूंढते हैं
इसीलिए धर्म को प्रेम और विज्ञान को अणु सूझते हैं
भाषा अलग हैं पर लक्ष्य एक ही हैं
दृष्टा दो हैं पर सदा साक्ष्य एक ही हैं
धर्म और विज्ञान भी एक दिन मिल ही जायेंगे
राधा और कृष्ण का जब वो सारा सार पी पाएंगे


बात यही ख़त्म नहीं होती कही तो गांठे खुली हैं
वहां भी जोड़ दे तो आगे उलझन बड़ी हैं
अमावस के साये तो कभी मिल नहीं पाते हैं
उनके ना मिलने से दुनिया के चित्र कुछ घुल जाते हैं

ऐसी ही कहानी से मेरी दोस्त तू रूबरू हुई
दुनिया बचाने की वो किस्मत तेरे सुपुर्द हुई
कुछ यादो को जोड़ते जोड़ते एक कहानी सी बन गयी
किसी नए इन्सान के पुण्य से प्रेम कहानी सी बन गयी

विश्वामित्र की परीक्षा हो तो मेनका जीत ही जाती हैं
प्रभु की यही इच्छा होती हैं क्योंकि आत्मा मीत पाती हैं
ब्रह्मचर्य के मार्ग से एकाग्रता को पाने का तरीका होता हैं
पर प्रेम तो बस छोटे रस्ते से ईश्वर को पाने का सलीका होता हैं

अष्टांगयोग के बड़े बड़े नियम और विधान हमसे ना पाले जायेगे
प्रभु ने बहाया जिस प्रेम सागर में बस डूब कर मर जायेंगे
उसके हैं वो चाहे तो छीन ले जिंदगी या हमें तार दे
ताकत नहीं झेलने की बस संसार के ना अब भार दे

मुझे अपनी जॉब शादी घर की भी परवाह नहीं
सिर्फ ईश्वर ने प्रेम में फंसाया बाकि मेरा व्यवहार सही
एक दोस्त ही तो सच्चा प्यार सिखा गयी थी
ख़ुशी थी वो की अब पहले जैसी नहीं थी

अन्दर तक उसकी चेतना को बदलने का संघर्ष था
त्याग मेरा ज्यादा था पर ईश्वर से कहा कुछ फ़र्ज़ था
रोग जब परमात्मा दे तो कहाँ माया में मर्ज़ था
मुक्तता की ओर बढती आत्माओ में नाम दर्ज था

मेरी याददाश्त ओर साधक होने का एक बस बोध था
बस इतना ही मेरा प्रयास ना पुनर्जन्म का शोध था
भविष्य भूत वर्तमान के पार भी कुछ आयाम हैं
आत्मा के मोती जहाँ मिल सकते नायाब हैं

दुनियादारी के तरीक से हमारी ये कविता समझ ना आ पायेगी
सिर्फ एक नयी आध्यात्मिक सोच ही कुछ राज छलका जाएगी

इस दिल में मैंने प्यार पनपने ही नहीं दिया था
राम रहीम सा एक इंसान बनने ही नहीं दिया था
राधा कृष्ण मिल ही ना सके ये कैसी घडी हैं
"वीरेन " यहाँ मर रहा हैं ओर तुम्हे उसकी तरक्की की पड़ी हैं हैं .

ये वैसे तो बहुत लम्बी हो सकती थी क्योंकि मेरी उस साधक बहन ने इतना मैटर दिया हैं की कभी ख़त्म ही नहीं होता . मुझे पता नहीं आप में कितने लोग इसे पढेंगे ओर कितनो को ये समझ में आयेगे . जिसके लिए लिखा जा रहा हैं वो बस लाभ उठाये . जिन्हें बोरिंग लगा वो मुझे माफ़ कर दे .


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

प्यार पर कविता भाग-19


पिछली कड़ी में ही ये उन्नीसवी कविता हैं .


मेरे कंधे पर जब तुम सर रखती थी
तेरे लिए मेरी एक कविता बनती थी
साथ मेरे होने से तेरी किस्मत हंसती थी
तन्हाईयां ना तब तेरा दामन डसती थी

तेरे भावो को अपने शब्द दिए थे
तेरे सुखो के सारे रस्ते खोल दिए थे
सपनो को तेरे मैंने अपने नैन दिए थे
तू उड़ने लगी जब तो पंख दिए थे

मैं सबंधो की मर्यादा का ध्यान रखता था
आखिरी साँस तक तेरी राह तकता था
तेरे रोम रोम पाने को को मेरा दिल तरसता था
तेरी खुशबु में बह जाने को मेरा अंतस तड़पता था
तुझे छूने को मेरा अंग अंग मचलता था
तेरी ओर आने को एक लावा धधकता था

फिर जब तुने कुछ भी ना कहा था
तब मैंने ये क्या भूचाल सहा था
भविष्य का तुझे कहाँ पता था
इसीलिए मैंने इसे एकतरफा कहा था

शायद मेरे इतने जन्म ख़राब ना होते
तेरे जज़्बात अगर पहले मचले होते
मेरे अध्यात्म के यु झमेले ना होते
दुखो के मेरे यु सवेरे ना होते

कृष्ण राधा सा ही तो मेरा प्यार था
तेरी हर साँस पर मरना स्वीकार था
शिव और शक्ति का ही तो बस मिल जाना था
भूली राह पर ही तो लौट फिर कर आना था

मै ऐसा नहीं ना मुझे ये शोभा देता था
मेरा क्या स्वार्थ जो तेरे दुःख झेल लेता था
नैतिकता का कौन सा मानदंड तोड़ देता था
सिर्फ अपना भला करना ही तो छोड़ देता था

सूरज किरण होकर चिराग से रौशनी खोजती थी
प्रकाश की तू स्वामी और अँधेरे में सोचती थी
क्या कभी सच्चा प्यार बिना जन्मो के बंधन से मिलता हैं
किस्मत जगी तेरे जीवन में "वीरेन "आ गया लगता हैं

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सोमवार, 23 अगस्त 2010

इश्वर से खुंदक खायी हुई कविता .

मेरे कई ऑनलाइन साधक दोस्त हैं जो इश्वर की चापलूसी में ज्यादा व्यस्त रहते हैं . अब मेरे जैसे घमंडी व्यक्ति से तो कुछ सहन होता नहीं हैं , इसीलिए उनके विरोध में खड़ा हो जाता हु की क्यों ईश्वर की झूठी बड़ाई कर रहे हो भाई . इसी विषय को लेकर एक कविता रच डाली , आशा हैं आपको बिलकुल पसंद नहीं आएगी ( इससे मुझे क्या )


उस ईश्वर से इतना क्यों प्यार हैं
ना जिसे सच्चो की दरकार हैं
वृन्दावन का ग्वाला हमें ना कुछ समझता हैं
तभी तो ऊंची ऊंची धर्म-दुकानों पर सजता हैं
मेरे प्यार पर वो कभी पिघला नहीं
कैसा मानू कि वो छलिया नहीं

आँखे उसके लिए रो रो कर सूज गयी थी
इंतज़ार करते करते जब हिम्मत टूट गयी थी
संसार कि हर ख़ुशी जब रूठ गयी थी
उस ग्वाले के हाथो मेरी किस्मत फूट गयी थी

ना मेरी भावनाओ को वो कभी मान दे पाया
सिर्फ मैंने उससे माँगा था अपना हमसाया
मेरे प्यार को भी उसने कर दिया पराया
दुखती मेरी नस नस में दर्द भर आया

तब क्यों ना ईश्वर को अपने परम होने का ज्ञान हुआ
भोली राधा जी को बस छोड़ देना उसे आसान हुआ
ना उसे कभी हमारे प्यार कि कद्र थी
जलते हमारे सारे दिन और राते सर्द थी

जब भी उस कृष्ण की कोई चापलूसी करने आएगा
सच कहता हु ना मेरे व्यंग्य से बच जायेगा
मेरी हस्ती कुछ नहीं पर उसकी भी तो रहने ना दूंगा
मेरा हक़ तो ना मिल पाया उसके हक़ भी तो ना दूंगा

वो एक भ्रम और दुखियो को भुला बैठा व्यापारी हैं
गरीबो का जल नहीं अमीरों की मदिरा स्वीकारी हैं
अगर प्यारा हैं तो दूर क्यों रहता हैं
जिम्मा उसका हैं फिर मेरा मन क्यों वियोग सहता हैं

कही कभी किसी रोज़ रहा चलता मिल जायेगा
सच कहू तो बिना डांट खाए ना हिल पायेगा
तब मैं इतना रुलाऊंगा कि हाथ जोड़ लेगा
आखिर में अपना मुह मेरी ओर मोड़ देगा .
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

रविवार, 1 अगस्त 2010

प्रभु नारायण से प्रार्थना cum शिकायत

ये कविता मेरी तरह के कुछ इश्वर साधको के लिए हैं जो जटिल परिस्थितियो में कुछ दुर्लभ भावो को महसूस करते हैं । कई बार कुछ बाते तर्कों से परे हो जाती हैं और मन को निचोड़ कर रख देती हैं । पूरी की पूरी कविता किसी की अमानत हैं । उसी का धन्यवाद हैं जो उसने मुझे छूट दी हैं लिखने की जो मैं श्री नारायण और आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ

प्यारे नारायण तुम जागते क्यों नहीं हो यार
कैसे बताऊ तुम्हे तुम ही समझा दो प्यार

क्यों मुझसे कहते हो कि कोई भी मुझसे शादी कर ले
क्या कीड़ी मकोड़ी भी इतने लायक कि मुझ ब्रह्म को वर ले
खुद अहम् में जकड़े हो पर इलज़ाम मुझे दे रहे हो
कितनी तरह से कह रहा हु पर हाथ ना तुम दे रहे हो

देखना किसी दिन कोई भूला दृश्य याद आएगा
गीता भागवत ना कोई फ़िल्मी नाटक आपको भायेगा
आपसे दूर रहकर भी मैंने क्या क्या जहर पिया हैं
शिव ही नीलकंठ हैं इस धारणा को झूठा किया हैं

पता नहीं ईश्वर के सब साधको में मेरी ही क्यों परीक्षा हुई
जिस दौर का फल मिलना नहीं उन्ही कर्मो की तितिक्षा हुई
पापो के भार से जिनके हिमालय भी नन्हे हो गए थे
मर्यादा शिखरों पर ऐसे चरित्रहीन खड़े हो गए थे

पिता के संकल्प से बनी ये एक पुत्र की प्रेम कहानी थी
कृष्ण ही यहाँ ढूंढता रह गया खो गयी मीरा दीवानी थी
सब कुछ सही होते होते आखिरी दम पर किस्मत पलटी थी
नजरो का धोखा लोगो को मार गया वर्ना कहाँ पृथ्वी चपटी थी

ना सपने ना मजबूरियां बस आपसे गहरा प्यार हैं
देवी देवता भी जगे नहीं दूर बहुत अवतार हैं

ग्लोबलायीजेशन करने वाले लोक लोकांतर तक क्यों नहीं जाते हैं
उड़नतश्तरी से डरने वाले क्यों त्रिदेव से अनभिज्ञ रह जाते हैं
मशीनों की नज़रो से क्यों सच जांचा जा रहा हैं
निर्जीवो से क्यों आखिर सजीव आँका जा रहा हैं

हे हरि जब तक जागते नहीं मुझे घुमाते रहोगे
मेरे करीब आते ही फिर मुझसे कहोगे
मैं तो सो रहा था तुमने जगाया क्यों नहीं
सृष्टि का भार अकेले उठाया मुझे बताया क्यों नहीं

काश आपको याद होगा हमने क्या तय किया था
पर सो आप गए थे और मैंने किस्मत का भय जिया था
आपकी माया ने मुझे सजा देकर आत्मा को भटका दिया था
कसूर मेरा सच्चा होना था इसीलिए फांसी पर लटका दिया था

सब आयामों में आपके साथ हूँ बस इसीलिए ख़राब हूँ
ऐसी वैसी कोई वस्तु नहीं आपके कर्मो का हिसाब हूँ
समय का एक पहिया जो हमेशा तेरे साथ चलता हैं
मैं हू एक झरना जो तेरे पर्वतो पर बहता हैं

चरणों में अर्पित हूँ बस अब तो स्वीकार करो
फिर भी तेरी गुंडागर्दी , ठुकरा दो या प्यार करो


!! हरि शरणम् !!
!! वीरेन्द्र !!

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...