रविवार, 5 सितंबर 2010

प्यार पर एक लम्बी कविता -भाग बीस

यह कविता बहुत लम्बी हैं . सारे विषय मिश्रित हैं पर आधार प्रेम ही हैं . असल में एक विषयवस्तु पर लिखी रचना छोटी होती जाती हैं . इस कविता के सारे अंश मेरे और मेरी एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के संवादों से बने हैं बल्कि सच तो यही हैं की सार भाग उसी का हैं मैं तो सिर्फ एक "कूरियर "वाला हु . उसे अगर थोडा सा भी समय मिले तो बताये की मैंने सब चीजों को क्रम में रखा या नहीं, कम से कम baat . पूरे तीन चार महीने के विभिन्न भावो को जोड़कर एक कविता बनी हैं. जब आपके पास कम से कम पंद्रह मिनट हो तो ही इसे पढ़े . इसमें ईश्वर, soulmate प्रेम , धर्म ,समाज, भक्ति का वर्णन मिलेगा . बहुत ही सरल शब्दों में लिखने की कोशिश की हैं . कुछ भी गलत सही आपको लग सकता हैं , फिर भी आध्यात्मिक मार्ग के शीर्ष लोग
मुझे मार्गदर्शन दे.

संवाद यहाँ से शुरू करता हूँ
उसके ही शब्दों से श्रीगणेश रटता हूँ

प्यारे दोस्त, तुम तो एक कवि हो

जब भी आती है एक धारा बहकर
कह जाती है कुछ बातें रुककर
न जाने फिर क्यूँ कलम उठ जाती है
जैसे सारे दर्द बहा ले जाती है
एक सुकून सा छा जाता है दम पर
एक सागर आ जाता है जमीं पर

सचमुच! तुम एक कवि ही हो
इश्वर की रचना की अद्भुत छवि भी हो
भाव तुम्हारे जब शब्द बन जाते हैं

पर कभी तुम ये तो रहस्य बताओ
उस कृष्ण से जरा ये राज तू खुलवाओ
अकेले में अर्जुन को गीता सुनाई थी
अधिकारी समझ ही तो शरण दिखाई थी
फिर ये सबको कैसे पता चली
झूठी ज्ञान गंगा की ये कैसे लहर उठी

कृष्ण ने कब कहा ये सारे दुनिया के लिए हैं
क्यों कर्मयोग की सभी ढोलक शोर किये हुए हैं
प्रेमयोग को लोगो ने क्यों जबरदस्ती बदनाम किया हैं
स्त्री पुरुष की सृजन प्रक्रिया को किसने दरकिनार किया हैं

यूँ तो लोग छोटी छोटी वस्तु की भी गुणवत्ता परखते हैं
फिर सृजन की इस प्रक्रिया में वे कैसे झेंपते हैं
शादियाँ क्यों सख्त परंपरा और झूठी नीवो पर खड़ी हैं
सच्ची आत्माओ को मिलाने वाली परंपरा तो धर्म से बड़ी हैं

कुछ रहस्य जैसे धर्म तो सृजन से ही शुरू होता हैं
संत परंपरा में कोई "सम्भोग से समाधी " का भी गुरु होता हैं
कैसे कोई सच्चा प्यार ऊँचाई पा सकता हैं
कैसे वो प्रभु को काम में दिखा सकता हैं
प्रभु तो जोड़ी बनने को ही तरस गए हैं
क्योंकि दम्पति सिर्फ तनसुख में बस गए हैं

ठीक से निभाया हुआ प्रेम ही पवित्र होता हैं
अपना सच्चा प्यार मिलने से सतचरित्र होता हैं
इन्सान पर मोक्ष नहीं रिश्तो का ऋण होता हैं
अपने सच्चे प्रेमी को पाने में क्यों जीव सोता हैं

जो हैं कब के बिछुड़े उनको मिलाना ही धर्म होता हैं
नहीं संभव एक जन्म तो उनका पुनर्जन्म होता हैं
मेरे पिता का भार मुझ पर अगर थोडा रह जायेगा
पास ही के किसी परिचित के गर्भ में आकर कह जायेगा

यही तेरा प्यार कभी मेरी मृत्यु से तू पहचान ना पाया
तेरा यही क़र्ज़ चुकाने तो सारे संयोग वैसे ही बना पाया
मैंने देखा सब कुछ ऐसे जैसे इतिहास दोहराता हैं
तारिख पर तारिख बदली पर घटना क्रम सारा मेल खाता हैं

कैसे कैसे ज्ञान और प्रेम के तुने बिंदु छुए
एक धार्मिक बहन के हमसाये भी मिला दिए
ग़लतफ़हमी और ज्ञान सारा कुछ मिला जुला
दिल और दिमाग के निर्णय में जीवन का सार घुला

हमारे तन के इन वस्त्रो में कैसे कैसे नगीने जड़े हैं
कहाँ कहाँ से आये भाव और नए रिश्ते बन पड़े हैं
भगवान् भी तो "वीरेन " जैसो की ही परीक्षा लेते हैं
जो साफ़ होते हैं वो वस्त्र ही तो धुला करते हैं

रिश्तो की कहानी एक जगह फिर आकर मिल गयी
सांसो के मिलते ही प्रेम की वो धरा फिर हिल गयी
खड़े होने को कोई आधार बनता नहीं दिख रहा था
कौन जाने ईश्वर किस कलम से प्रारब्ध लिख रहा था

लेकिन युवाओ को तो जिस्मानी प्यार की ही ललक पड़ी हैं
अरे सच्चा प्यार तो आखिरी ज्ञान को लाने वाली जादू झड़ी हैं
एक गलत मिलन ना सुलझने वाली गांठे छोड़ जाता हैं
विज्ञान का तो पता नहीं पर धर्म में इसे पाप कहा जाता हैं
सच्चे प्यार ना मिल जाने से जीवन मरने लग जाता हैं
सुलझाएगा कृष्ण क्योंकि गलत मिलन से प्यार मर जाता हैं

अपने हमसाये को हम इसीलिए सदा सबमे ढूंढते हैं
इसीलिए धर्म को प्रेम और विज्ञान को अणु सूझते हैं
भाषा अलग हैं पर लक्ष्य एक ही हैं
दृष्टा दो हैं पर सदा साक्ष्य एक ही हैं
धर्म और विज्ञान भी एक दिन मिल ही जायेंगे
राधा और कृष्ण का जब वो सारा सार पी पाएंगे


बात यही ख़त्म नहीं होती कही तो गांठे खुली हैं
वहां भी जोड़ दे तो आगे उलझन बड़ी हैं
अमावस के साये तो कभी मिल नहीं पाते हैं
उनके ना मिलने से दुनिया के चित्र कुछ घुल जाते हैं

ऐसी ही कहानी से मेरी दोस्त तू रूबरू हुई
दुनिया बचाने की वो किस्मत तेरे सुपुर्द हुई
कुछ यादो को जोड़ते जोड़ते एक कहानी सी बन गयी
किसी नए इन्सान के पुण्य से प्रेम कहानी सी बन गयी

विश्वामित्र की परीक्षा हो तो मेनका जीत ही जाती हैं
प्रभु की यही इच्छा होती हैं क्योंकि आत्मा मीत पाती हैं
ब्रह्मचर्य के मार्ग से एकाग्रता को पाने का तरीका होता हैं
पर प्रेम तो बस छोटे रस्ते से ईश्वर को पाने का सलीका होता हैं

अष्टांगयोग के बड़े बड़े नियम और विधान हमसे ना पाले जायेगे
प्रभु ने बहाया जिस प्रेम सागर में बस डूब कर मर जायेंगे
उसके हैं वो चाहे तो छीन ले जिंदगी या हमें तार दे
ताकत नहीं झेलने की बस संसार के ना अब भार दे

मुझे अपनी जॉब शादी घर की भी परवाह नहीं
सिर्फ ईश्वर ने प्रेम में फंसाया बाकि मेरा व्यवहार सही
एक दोस्त ही तो सच्चा प्यार सिखा गयी थी
ख़ुशी थी वो की अब पहले जैसी नहीं थी

अन्दर तक उसकी चेतना को बदलने का संघर्ष था
त्याग मेरा ज्यादा था पर ईश्वर से कहा कुछ फ़र्ज़ था
रोग जब परमात्मा दे तो कहाँ माया में मर्ज़ था
मुक्तता की ओर बढती आत्माओ में नाम दर्ज था

मेरी याददाश्त ओर साधक होने का एक बस बोध था
बस इतना ही मेरा प्रयास ना पुनर्जन्म का शोध था
भविष्य भूत वर्तमान के पार भी कुछ आयाम हैं
आत्मा के मोती जहाँ मिल सकते नायाब हैं

दुनियादारी के तरीक से हमारी ये कविता समझ ना आ पायेगी
सिर्फ एक नयी आध्यात्मिक सोच ही कुछ राज छलका जाएगी

इस दिल में मैंने प्यार पनपने ही नहीं दिया था
राम रहीम सा एक इंसान बनने ही नहीं दिया था
राधा कृष्ण मिल ही ना सके ये कैसी घडी हैं
"वीरेन " यहाँ मर रहा हैं ओर तुम्हे उसकी तरक्की की पड़ी हैं हैं .

ये वैसे तो बहुत लम्बी हो सकती थी क्योंकि मेरी उस साधक बहन ने इतना मैटर दिया हैं की कभी ख़त्म ही नहीं होता . मुझे पता नहीं आप में कितने लोग इसे पढेंगे ओर कितनो को ये समझ में आयेगे . जिसके लिए लिखा जा रहा हैं वो बस लाभ उठाये . जिन्हें बोरिंग लगा वो मुझे माफ़ कर दे .


--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

8 टिप्‍पणियां:

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

REALLY WRITTEN IN MORE DEPTH OF PIOUS lOVE. VERY NICE & TOO IMPRESSIVE THANKS

हमारीवाणी ने कहा…

बढ़िया कविता है.


क्या आप ब्लॉग संकलक हमारीवाणी.कॉम के सदस्य हैं?

vandana gupta ने कहा…

्वीरेन
सुनाया तो अर्जुन को था मगर तुम भूल रहे हो संजय को उसे भी तो दिव्य दृष्टि दी थी तो गीता ज्ञान कैसे ना सारे जहान मे फ़ैलता और फिर अर्जुन कौन सा मारा गया था वो तो ज़िन्दा था ना तो कैसे सोच लिया कि उसने इस अनमोल ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखा होगा………………अभी बहुत सी चीजें हम सब के लिये अन्जानी हैं और उसी मे हम भ्रम पाल लेते हैं जबकि तथ्य तक पहुँच नही पाते हैं………………जिसने कृष्ण को जान लिया उसके लिये और कुछ जानना बाकी नही रहता और ना ही दुविधायें बाकी रहती हैं मन मे………………मगर उसी को जानना नामुमकिन है…………बडे बडे ॠषि नही जान पाये तो हम तुम जैसे तुच्छ लोग क्या जानेंगे उसका मर्म्।

vandana gupta ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (6/9/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

वीरेंद्र रावल ने कहा…

धन्यवाद वन्दना जी , तिवारी सर और हमारी वाणी . आपने इतना कीमती समय निकला और मेरी अप्रासंगिक सी लगती रचना पर गौर किया मैं आभारी रहूँगा .

वंदना जी अब मैं तो ठहरा साधारण भावुक व्यक्ति , छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दे . यह बात मैंने नोट कर ली हैं अब आगे से ध्यान रखूँगा . इसी बात के लिए तो कहा था की मार्गदर्शन करे . ऐसी कोई और भी गलती हो तो कृपया बताये

SANJEEV RANA ने कहा…

aise hi prem rash me bhigote rahiyega
ache lekhan ke liye badhaiya

SANJEEV RANA ने कहा…

aise hi prem rash me bhigote rahiyega
ache lekhan ke liye badhaiya

बेनामी ने कहा…

badiya likha hai, thanks.

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...