शनिवार, 11 सितंबर 2010

प्यार पर लिखी एक और उदास कविता - भाग इक्कीस

बस जीवन पर लिखी थोड़ी उदास सी पोयम हैं . किसी को पसंद आएगी किसी को नहीं . फिर भी पढ़ ले अपने कीमती समय को ख़राब करने के लिए

मुझे अपनी गलती समझ नहीं आई थी
दिल मेरा था पर क्यों चाहते परायी थी
मेरे पुण्य से ही तो उसका दीपक जगमगाया था
जिसमे मेरा अतीत आया वो मेरा हमसाया था
मेरे मन को प्यारी वो अमानत लौटा दी जाये
मेरी दुआ और मेरे पुण्य सारे मुझे फिर मिल जाये

कितनी तर्कों की मै डोर पकड़ पाया
वक्त ने कैसे इन रिश्तो में उलझाया
सब कुछ मेरे लिए तबाही का मंज़र था
मेरे दिल में ईश्वर का लगा खंजर था

दूर दूर से ही ईश्वर हंसकर भाग गया था
मेरे सुख और उसके दुःख बाँट गया था
इष्ट मंत्रो का मोल अब समझ आया था
गुप्त ही रखना था गुरु ने बताया था

किसी नज़रिए से कभी कोई सपनो में भी नहीं था
पर भाग्य मेरा लिखना वाला चित्रगुप्त भी कही था
ज्यादा अच्छा होना भी क्या बेबस कर गया था
जल उठा चिराग जो पुण्य का तेल रम गया था

नींद उसकी उड़ जाती जिसे परमात्मा कहा गया
दुःख निर्गुण का मुझ सगुण से ना सहा गया
टूटती हसरतो में मेरा सपना बहा जाता था
हे हरि बता तो सही मेरा उससे क्या नाता था

सही और गलत सोच का आधार कुछ भी नहीं था
मर्यादा का जब मंजर तोड़ने को छुआ तक नहीं था
सिर्फ धर्म ही नहीं लुटेरो में कृष्ण भी वही था
जिसकी कोई मदद कर पाता वो "वीरेन " नहीं था

ज्ञानी सारे भगवान् के बड़प्पन कि दुहाई देते रहे
प्रेम के दर्द को नासमझी कहने के स्वर सुनाई देते रहे
कहाँ इष्टदेव कहाँ गुरुवर और सद्ग्रंथो की शरण हटी
बस जिंदगी किसी चरित्रहीन दिल की रेखा पर मर मिटी

अपने दिल में बसी उन यादो को कैसे भुलाऊ
कोई भी विश्वास ना करेगा चाहे मैं मिट जाऊ
सपने जब टूटे तो दूसरा कोई मदद नहीं कर पाया
कितनी बार वीरेन यूँ ही तो ख़तम होता आया

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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

1 टिप्पणी:

वीरेंद्र सिंह ने कहा…

Bahut hi sunder aur arthpurn prastuti.


Badhaai.....

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...