हे प्रभु जो इन्सान सच्चे होते हैं
वही तेरे साधक बच्चे होते हैं
ना उन्हें अपने सुख दुःख या मन
नसों तक में नासूर बहता पर ना करे वो आह ही
उनका जीवन तेरी मुश्किलों से दिया हुआ
प्रारब्ध के धागों में उनका हर हाल सिला हुआ
फूल की आशा में रुके हुओ को भले कांटे चुभ जाये
सारे कठिन रास्तो को पार करके भी उनकी मंजिल रुक जाये
दुखो के फलो से भरे उनके वृक्ष जैसे कंधे मुड
स्तुति के पात्र वो चाहे बेचारे दुनिया की निंदा में जुड़ पाए
आखिरी कदम तक प्रभु की बाट देखते हैं
भक्ति के सहारे जिंदगी की अँधेरी रात झेलते हैं
तब भी कुछ ज्ञान वाले कहेंगे की भक्ति से कभी दुःख नहीं होता
भला राधा मीरा का अक्स भी कृष्ण सा सुख कभी कही खोता
मुट्ठी भर की खुशिया हजारो जन्मो के पुण्यो से ना आ सकी
सालो की पूजा भी साधक की एक अनुराधा को ना भा सकी
भास्कर सा उसका तेज़ कभी कभी तो दुनिया को हरा सकता था
छोटे छोटे दीपकों से तो उसका साया भी ना डरा करता था
पर प्रकृति ने एक भक्त को मजबूर कर दिया था
किस्मत ने एक अधूरे खाली कल को आज भर दिया था
जिसकी जिम्मेदारी ने आंसुओ की एक नयी भाव झील चला दी
अपना एक स्वार्थ भी बह गया पर परमार्थ की कई नाव सी बहा दी
परम प्रभु आराधना का ये कौन सा आपने दौर बताया हैं
सरल से मुझ साधक को कैसी जटिल उलझन में लाया हैं
क्या मानू कि धर्म की अनूठी परिभाषा लिखने की ये कोई नीव हैं
भगवान बनकर निस्वार्थ सबकी मदद करने वाला " वीरेन " भी जीव हैं
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