शनिवार, 19 दिसंबर 2009

वंशावली भाग छः - भगवान के अवतार (दस पूर्णावतार )

भगवान विष्णु के शास्त्रों ने चौबीस अवतार माने हैं । इनमे दस पूर्णावतार हैं और चौदह अंशावतार हैं । मेरी पिछली वंशावली वाली पोस्टों में आप सन्दर्भ ले सकते हैं जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी आपको समझने में दिक्कत ना हो । क्रम से वंशावली ये हैं ।

पहला अवतार : ( मत्स्यावतार )
सातवें मनु श्री सत्यव्रत महाराज के समय में भगवान् हरि ने अवतार लियाiके सूर्य इस बार के सूर्य के पुत्र हैं । जब पिछले कल्प के अंत का समय आया तो भगवान् विष्णु ने राजा सत्यव्रत को एक सप्ताह पहले मछली के रूप में आकर कहा की वो एक बड़ी नाव बनाये जिसमे सप्त ऋषि और संसार की समस्त ओषधि आ सके । फिर एक सप्ताह बाद जब सारा संसार जल में डूबने लगा तो विष्णु जी ने अपने मत्स्य रूप को बड़ा किया और उस नाव को अपने सींग से बांधकर कल्प की रात्रि में खड़े रहे । फिर दोबारा से मनु महाराज को नयी सृष्टि प्रारंभ करने का मार्गदर्शन दिया । इससे आगे की कथा आप पुरानों से भी पढ़ सकते हैं ।

दूसरा अवतार ( कच्छपावतार)
ये इस कल्प में राजा बलि के समय में जब समुन्द्रमंथन हुआ तो इंद्र और बलि ने मंदराचल पर्वत को रई की तरह प्रयोग किया और रस्सी की तरह वासुकी नाग को प्रयोग किया । इसमें समस्या यह हुई की मंदराचल पर्वत समुन्द्र के अन्दर धंसता चला गया , जिससे देवताओं और राक्षसों के अनुग्रह पर भगवन ने कछुए का रूप धारण करके मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया और समुन्द्र मंथन में सहायता करने लगे। वैसे इसी समय विष प्रकट हुआ जिसे भगवान् शिव ने धारण किया और नीलकंठ कहलाये ।

तीसरा और चौथा अवतार (वराह अवतार और नरसिंह अवतार )
कश्यप ऋषि की दो प्रमुख पत्निया थी दिति और अदिति । अदिति के देवता आदि कई पुत्र हुए । दिति के दो राक्षस पुत्र हुए हिरनकश्यप और हिरण्याक्ष । पहले हिरण्याक्ष को मारने के लिए वराह ( सूअर ) का अवतार लिया भगवान् ने और आपने दांतों से जल में समाई पृथिवी को बाहर ले आये और अपने शापित पार्षद जय और विजय को रूप में हिरण्याक्ष और फिर प्रहलाद के पिता हिरन्यकश्यप को नरसिंह बनकर उद्धार कर दिया ।
वैसे यहाँ काबिले गौर हैं सनकादी ऋषियों के श्राप से जय विजय को तीन बार मनुष्य लोक में जन्म लेना पड़ा था
इनका पहला जन्म तो हिरन्यकश्यप और हिरण्याक्ष का हुआ । दूसरा रावन और कुम्भकर्ण और तीसरा यदुवंश में शिशुपाल और दन्तवक्र ( श्री कृष्ण के बुआ के पुत्रों के रूप में ) के रूप में हुआ


पांचवा अवतार (वामन अवतार )
इंद्र के छोटे भाई के रूप में जन्म लिया और पिता कश्यप और माता अदिति से जन्म लिया .
राजा बलि के से तीन पग भूमि मांगने वाले विष्णु जी ने छोटे कद का रूप बनाया और राजा बलि की दानशीलता को अमर बनाया और उन्हें आठवे कल्प में इंद्र बनाने का वरदान दिया । सारा वैभव राजा बलि से जीतकर अपने बड़े भाई इंद्र को सौंप दिया।


छठा अवतार ( भगवान् परशुराम )
रिचिक मुनि के पुत्र जमदग्नि के पुत्र के रूप में एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया और इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर के ब्राह्मणों को दान कर दिया । एक हज़ार भुजाओ वाले सहस्त्रबाहु अर्जुन के हैहयवंश का संहार कर दिया और भगवान् राम के सीता स्वयंवर के बाद साधना के लिए चले गए और अब भगवान् के कल्कि अवतार तक के लिए गुप्त स्थान पर चले गए।

सातवाँ और आठवां अवतार ( राम और कृष्ण अवतार )
सबको इन अवतार के बारे में पहले से ही सारी जानकारी ज्ञात हैं । रावन और कुम्भ कर्ण को भगवान् राम ने संहार का दिया और इनके जय और विजय के तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्र बनकर आये अपनी बुआ ( कुंती की बहने ) जी के पुत्रों का भगवान् कृष्ण ने समाप्त कर उद्धार कर दिया ।

नवां अवतार ( भगवान् बुध )
लगभग चार सो इसा पूर्व ( 400 B. C. ) में भगवान् बुध के रूप में नौवा अवतार हुआ । इनके बारे में भी सभी को पता हैं

दशम अवतार ( भगवान् कल्कि )
कलयुग के आखिरी समय में लगभग तीन लाख पचपन हज़ार साल बाद उत्तर प्रदेश के संभल ग्राम में पंडित विष्णु यशा के घर में अंतिम अवतार होगा । इनके बारे में भी पुरानो में विस्तृत जानकारी उपलब्ध हैं ।
इस अवतार से कई लोग जुड़े हैं जैसे माता वैष्णो देवी जो भगवान् राम को पति रूप में ना पाकर उनके कल्कि रूप में पति रूप में स्वीकारेंगी । राम की पीढ़ी के राजा मरू और भीष्म पितामह के ताऊ देवापी भी उस समय प्रगट होंगे । भगवान् परशुराम और ज्ञानी याज्ञवल्कय भगवान् के गुरु और मार्गदर्शक होंगे । यह संक्षेप में इस अवतार का वर्णन हैं ।

अगर मुझसे लिखने में कोई त्रुटी हो गयी हो तो कृपया मार्गदर्शन करें जिससे मैं उसमे सुधार कर सकूँ .
चौदह अंशावतारों का वर्णन किसी दूसरी पोस्ट में समय आने पर करूँगा

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