मेरे पूज्य सदगुरु बापूजी ने कवि गंग के जीवन काल में हुए अन्याय के बारे में बताया है। उसी को आधार मानकर मैं यह धार्मिक प्रेमिओं के लिए रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ । किसी भी दोष के लिए कृपया मुझे माफ़ करें ।
कवि गंग के बारे में शायद बस धार्मिक और गूढ़ साहित्य प्रेमी ही जानते हैं । वो तानसेन के समकालीन थे और अकबर के दरबार में कविता आदि गाने का काम करते थे । वो तानसेन से बहुत प्रभावशाली थे परन्तु कुछ कारन थे जिनकी वजह से वो इतिहास से बिल्कुल बेदखल कर दिए गए । उसका सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है :-
कवि गंग सिर्फ़ इश्वर निष्ठ कवि थे । भगवान् के अतिरिक्त वो किसी और की प्रशंसा के गीत कभी नही गाते थे । हालांकि सामाजिक मुद्दों पर भी लिखते जैसा मैंने इससे पिछली पोस्ट में उनका एक दोहा लिखकर दर्शाने का प्रयास किया है । पर कभी भी उन्होंने चापलूसी करने जैसी कोई कविता अकबर के लिए नही लिखी । ये वाकई दुर्लभ बात थी क्योंकि उस समय लगभग सभी अपनी आजीविका बढ़ाने के लिए झूठी सच्ची कविताये लिखकर अकबर से इनाम पाते थे। पर कवि गंग ने ऐसा कभी नही किया ।
कवि गंग की एक खास शैली ये थी वो आखिरी पंक्ति में अकबर को संबोधित कर लेते थे । अब एक दिन अकबर ने उन्हें आदेश दिया की कल वो एक कविता बनायें और उसकी आखिरी पंक्ति हो
" सब मिलकर आस करें अकबर की "
मतलब साफ़ था की कवि गंग को अकबर की बड़ाई करनी होगी । अगले दिन कवि गंग ने कविता पढनी शुरू की . उसके अर्थ कुछ ऐसे थे की एक को छोड़कर जो दूसरे को पुकारे उसकी जीभ कट जाए , वो दुश्चरित्र है जो बार बार अपने ईमान बदल लेते है। कवि गंग कहना चाहते थे की वो इश्वर अधीन है , कभी भी अकबर की झूठी चापलूसी नही करेंगे ।
उन्होंने आखिरी पंक्ति शुरू की ,
सारी दुनिया धन को भजे , कवि गंग तो एक गोविन्द भजे
जिसको न भरोसा इश्वर का , वो सब मिलकर आस करे अकबर की ।
बस कहने की जरुरत नही की क्या माहौल बनाया होगा अकबर के चापलूसों ने । फ़िर भी अकबर ने कहा की साफ़ साफ़ कहो । तो कवि गंग ने कहा
एक हाथ घोडा एक हाथ खर ( गधा ) ,
कहना था सा कह दिया करना है सो कर
दुष्ट सत्ता ने आदेश दिया की कवि गंग को हाथी से कुचल दिया जाए । कुचले जाने से पहले महान कवि ने अपनी आखिरी पंक्तियाँ कही
" कभी न रानडे रन चढ़े कभी न बाजी बंध ,
सकल सभा को आशीष है ,विदा होत कवि गंग
कायर कभी रन में नही लड़ते और कभी नही जीतते , भरी सभा को कवि गंग आशीर्वाद देता विदा होता है ।
कृपया कोई भी इसे हिंदू मुस्लिम कोण से न देखे , सिर्फ़ एक राजा और एक प्रतिभाशाली इश्वर प्रेमी कवि के चापलूस न होने को ही इस घटना का आधार माने । मैं भाग्यशाली था जो अपने बापूजी के आश्रम की मासिक पत्रिका " ऋषि प्रसाद " से ये पढ़ पाया ।
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