शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

एक बुरो प्रेम को पंथ बुरो.--कवि गंग ( मोरारी बापू के कथा प्रवचन से )

कवि गंग एक अद्भुत कवि थे जो सिर्फ़ धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर ही लिखते थे , वे तानसेन के समकालीन थे । उनका जीवन परिचय किसी और पोस्ट में डालूँगा अभी उनके उस कविता के बारे में चर्चा करते है जो शायद आप सभी ने पूज्य मोरारी बापूजी की कथा में भी सुनी होगी।

एक बुरो प्रेम को पंथ , बुरो जंगल में बासो
बुरो नारी से नेह बुरो , बुरो मुरख में हंसो
बुरो सूम की सेव , बुरो भगिनी घर भाई
बुरी नारी कुलक्ष , सास घर बुरो जमाई
बुरो ठनठन पाल है बुरो सुरन में हंसनों
कवि गंग कहे अकबर सुनो एक सबते बुरो माँगनो
माँगनो एक सबते बुरो
सरलार्थ : प्रेम का मार्ग बहुत बुरा है क्योंकि सच्चे प्रेमी कहीं के नही रहते , जंगल में निवास करना बुरा है क्योंकि वहां कोई सुविधा नही होती , स्त्री से अकारण ज्यादा प्रेम करना भी बुरा है क्योंकि इतिहास में बड़े युद्ध सुंदर स्त्रिओं के कारन ही हुए है ( ये विचार व्यक्तिगत है शास्त्र्गत नही , इसीलिए मेरे अलावा किसी और को इस पंक्ति के लिए दोष न दे ), मूर्खो की सभा में कभी हँसना नही चाहिए क्योंकि उनकी कोई बात आपके योग्य नही होती ।
बुरो सूम के सेव का मतलब है की कंजूस की सेवा में कभी कोई सेवक आनंद नही पाया है , बहन के घर भाई को ज्यादा दिन तक नही रुकना चाहिए क्योंकि इससे मान घट जाता है । ख़राब लक्षणों वाली नारी बुरी होती है क्योंकि उसका डांवाडोल चरित्र आपमें भी दोष पैदा कर सकता है । सास के घर दामाद बहुत दिन रुके तो ये बहुत बुरा है क्योंकि आत्मसमान दांव पर लगा होता है ।
ठनठन पाल अर्थात गरीब होने में भी burayee है क्योंकि आप जीवन का आनंद नही उठा सकते । rajaon ki sabha me भी हँसना सुरक्षित नही है क्योंकि वहां माहौल बहुत संवेदनशील होता है ।
लेकिन इन सबके बाद भी सबसे बुरा है माँगना या याचना करना क्योंकि आपका अस्तित्व उस samay भिखारी के समान होता है

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