अपना दर्द कृष्ण जी को शिकायत के रूप में प्रस्तुत हैं सिर्फ पहला पैरा कृष्ण को समर्पित हैं फिर तो मेरा दर्द शुरू होता हैं और ख़त्म बस जबरदस्ती करना पड़ता हैं . भगवान् के बारे में तो लिखना वैसे ही दुर्लभ लोगो को मिलता हैं पर फिर भी उसके चक्कर में मत पढना .क्योंकि
जब वो अंदर तक आ जायेगा मौत सा दर्द दे जायेगा
कृष्ण नाम एक छलिये बस क्षण में चैन लूट ले जायेगा
उसके चक्कर में ना पड़ो वो तो प्रेम व्यापारी हैं
दिल दिमाग को तहस नहस करने वाला व्यभिचारी हैं
बातो से वो पार हैं पर मीठे बोल सुनाता हैं
सब कुछ छीन लेता हैं पर झूठ सारे रचाता हैं
निर्बल समझ रुलाता रहेगा
करुना को बस अपनी भुनाता रहेगा
व्यभिचार सा कुछ दिखाता रहेगा
प्रेम की आड़ में जिसे मेरा दिल सहेगा
ना कभी तरस उसे मुझ पर आएगा
नश्तर से विरह को जब वो चलाएगा
नजरो में मेरी मुझे गिरा देगा
आँखों में जब आंसू ला देगा
दर्शन नहीं देगा और भगा देगा
पर गिरते ही वो मुझे सजा देगा
जन्मो का बिछड़ा कोई मिला देगा
अश्को में लिपटा वो चेहरा दिखा देगा
कभी समझ नहीं पाया मेरी गलती क्या थी
मछली सी आँखों वाली वो लड़की कहाँ थी
पहले ढूंढ लेता तो आज तमाशा नहीं होता
जिंदगी में शर्मिंदा नमी का समां नहीं होता
रोते रोते आज मेरा दर्द बयान नहीं होता
क्यों सर काटने को मेरे जल्लाद खड़ा नहीं होता
आंसू रुकते नहीं बस छलकते जा रहे हैं
टूट के अरमान बिखरते जा रहे हैं
कितनी तारीखों या संयोगो की मैं बात करता हूँ
जब संयम की ना कोई राह स्वीकार करता हूँ
ना मुझमे और जानवर में मूल अंतर हैं
व्यभिचार मेरा उसका समानांतर हैं
सिर्फ जीव की सी क्षुद्र वासना मुझे भी कमजोर कर गयी
दोस्त वो सबसे अजीज सी मुझे झकझोर कर गयी
उसके सपने क्या सजाऊ जब आज अपने ही टूट गए
भविष्य की नीव रखी थी पर अतीत के भाग रूठ गए
सिर्फ वो मुझे कभी अपना सच्चा दोस्त कहना बंद ना करे
मन में बुरा कहती रहे पर जाहिर में सुनाना ना शुरू करे
सिर्फ उसकी आँखों का विश्वास ही कभी धरोहर था
अपने मन की भावनाओ से उसका रूप मनोहर था
पर भक्ति मेरी डूबी जहाँ मेरी वासना का सरोवर था
छः महीने बस जैसे एक क्षण में तबाह हो गए
रूठे पुत्र के वादे भी पिता के लिए अब स्वाह हो गए
बुझ जाये उसके दीपक जिसने मुझे गिराया
झोंका एक अपराध बोध का मुझ पर आजमाया
संकल्प को मेरे किस देवता ने हटाया
स्वार्थ क्यों अपना उस कमीने ने मिटाया
उसकी नजरो की बात क्या जब कहाँ अपनी पलके खुल पाती हैं
मेरी बड़ी बड़ी बाते ज्ञान की रह रह कर मुझे रुलाती हैं
साधक मन होने का बस एक ढोंग रच लिया हैं
झूठी बातो के बस रस घोल घोल पिया हैं
बेचारी को कैसा तुने ये सदमा दिया हैं
नीचता का ये कैसा हाल तुने अपना किया हैं
भक्ति का बस ढोंग करेगा लूट लेगा कृष्ण दुनिया सारी
"वीरेन " लुटा और लुट गयी वृन्दावन की राधा प्यारी
सच में शायद मीरा जी ने दर्द की वजह से कहा हैं
जो मैं ऐसा जानती की प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती की तुम प्रीत ना करिहो कोई
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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2 टिप्पणियां:
socha aaj ayodhya faisale pe kuchh likha milega..
"machhli", "aankh" aur "sar katna" ye shabad to kal sham ko mere dimag mey chal rahe they.. wahan kaise pahunch gaye?
बेहद दर्द भरा है…………कविता मे ।
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