रविवार, 7 फ़रवरी 2010

दो गीत दर्द भरे -वक्त ने किया , दिल के अरमान

पहला गीत हैं वक्त ने किया क्या हसीं सितम जो फिल्म कागज़ के फूल का हैं । दूसरा हैं निकाह का सलमा आगा द्वारा गया हुआ । आशा हैं दर्द महसूस करने वालो को पसंद आयेंगे .

वक्त ने किया क्या हसीं सितम हम रहे ना हम तुम रहे ना तुम

बेक़रार दिल इस तरह मिले जिस तरह कभी हम जुदा ना थे
तुम भी खो गए हम भी खो गए एक राह पर चल के दो कदम , वक्त ने ...
जायेंगे कहाँ सूझता नहीं चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश हैं कुछ पता नहीं बुन रहे हैं दिल ख्वाब दम बदम


दूसरा गीत
दिल के अरमान आसुओं में बह गए
हम वफ़ा करके भी तनहा रहा गए ..........................

जिंदगी एक प्यास बन कर रह गयी
प्यार के किस्से अधूरे रहा गए , दिल के अरमान .....

शायद उनका आखिरी हो ये सितम
हर सितम ये सोच कर हम सह गए , दिल के अरमान ....

खुद को भी हमने मिटा डाला मगर
फासले जो दरमियाँ थे रह गए , दिल के अरमान ........

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

कृष्ण सुदामा मिलन

श्री रामानंद सागर की "श्री कृष्ण" में बहुत सुंदर भजन हैं उन्ही में से एक अभी मैंने संकलित किया हैं . धर्मपत्नी सुशीला के बार बार कहने पर जब कृष्ण भक्त सुदामा जब द्वारका पहुँचते हैं तो द्वारपाल संदेशा लेकर भगवान् कृष्ण के सामने कहता हैं

शीश पगा ना झगा तन पे ,जाने को आयो बसों एही ग्रामा
धोती फटीसी लटी लुपटी सी और पामन पाहन की नहीं सामा
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रहयो चकी सो वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को धाम बतावत आपनो नाम सुदामा

नाम सुदामा का सुनते ही तज आसन दौड़े द्वार की ओरा
मुकुट कहीं तो कही पट उलझा मिलने को व्याकुल जी ना थोरा
ऐसी उतावली हैं घट में जैसे बावली वायु का मस्त झकोरा
मित्र से भेंट को मित्र चले ज्यू धावत चाँद की और चकोरा
उधर सुदामा जी द्वार पर खड़े सोचते हैं कि शायद कृष्ण आयेंगे नहीं इसीलिए द्वार से वापिस आ जाते हैं । प्रष्ठभूमि में कृष्ण कि दशा वर्णन करता गीत उभरता हैं

कौतुहल धरे यही सब देख रहे सुध बुध खोके कृष्ण दौड़े कहाँ जाते हैं
उड़ के चले हैं पीछे मुड़ के ना देखे ,
लीला देखने वाले तो कुछ समझ ना पाते हैं
गिरते हैं पड़ते हैं फिर उठ चलते हैं द्वारपालों सभी दासिओं से टकराते हैं
कौन ये महत्वपूर्ण आ गया हैं द्वार पे अगुवानी करने को ऐसे अकुलाते हैं

दीनो के बंधू करुना के सिन्धु नैनों में लेकर के जल बिंदु
सारे नातो से बढ़ के एक नेह का नाता निभाने चले हैं

भ्रमण करे जो फूलों के रथ पे चल कर वो पथरीले पथ पे
नंगे पाँव जो आया उसको नंगे पाँव बुलाने चले हैं

दर्शन क़ी अभिलाषा खोके
जगत हसाई से व्याकुल होके

आस के टुकडे सुदामा संजो के
अश्रु में जीवन डुबाने चले हैं


प्रेम परीक्षा कि घडी आई मित्र के नाम की हो ना हंसाई
मित्र परायण कृष्ण कन्हाई रूठा मित्र मनाने चले हैं

जब प्रभु कृष्ण द्वार पे आते हैं तो सुदामा नहीं मिलते हैं तो कृष्ण फिर पीछे पीछे ढूँढने चले जाते हैं । आखिरकार वो सुदामा को ढूंढ ही लेते हैं और दोनों गले मिलते हैं जो काफी भावुक दृश्य हैं , पृष्ठभूमि का गीत ये हैं

बरसों के बिछड़े दो मीत आज सन्मुख हैं
नैनो में दर्शनों के याचना पवित्र हैं
मिलने की ललक भी मिलने में झिझक भी हैं
बालपन के साथियों की दशा कुछ विचित्र हैं

दोनो के नैनो में आसुओं के मोती हैं
मोतियों में बालपन कि मित्रता का चित्र हैं
छोटा बड़ा उंच नीच राजा रंक कोई नहीं
प्रेम की धरा मित्र केवल एक मित्र हैं

भाव भरी इस भेंट को देख रहा संसार

देखने वाले कर रहे कृष्ण की जय जयकार

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे ( सफ़र , गीतकार इन्दीवर )


पुरानी फिल्मो के गीतकारों में इन्दीवर मुझे सबसे अच्छे लगते हैं । उनकी कुछ कृतियाँ अगली पोस्टों में डालूँगा । इन्ही में से एक हैं लता जी का "सफ़र " फिल्म का शर्मीला टैगोर पर फिल्माया ये गीत

हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे
डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे

क्या मुहब्बत के वादे क्या वफ़ा के इरादे
रेत की हैं दीवारें जो भी चाहे गिरा दे
हम थे जिनके सहारे .................


है सभी कुछ जहाँ में दोस्ती हैं वफ़ा हैं
अपनी ये कमनसीबी हमको ना कुछ भी मिला हैं
हम थे जिनके सहारे .................

यूँ तो दुनिया बसेगी तन्हाई फिर भी डसेगी
जो जिंदगी में कमी थी वो कमी तो रहेगी
हम थे जिनके सहारे .................

थोडा हैं थोड़े की जरुरत हैं ( फिल्म खट्टा मीठा )

सन1972 में दो पारसी परिवारों पर बनी खट्टा मीठा फिल्म एक हास्य फिल्म हैं । इसका ये गाना बड़ा ही सुन्दर हैं। ये मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के सपनो पर बड़ा ही सटीक बैठता हैं कि कैसे इनके सपने होते हैं । ये गाना चलता रहता हैं और साथ में इन दो परिवारों के लडको के सपने भी दिखाए जाते रहते हैं ।
इस गाने के बोल ये हैं
थोडा हैं थोड़े की जरुरत हैं ,
जिंदगी फिर भी यहाँ खूबसूरत हैं

जिस दिन पैसा होगा वो दिन कैसा होगा
एक दिन पहिये घूमेंगे और किस्मत के लब चूमेंगे
बोलो ऐसा होगा , थोडा हैं थोड़े की .....

सुन सुन हवा चली सबा चली,
तेरे आँचल से उडके घटा चली
मैं छूने जरा आसमा चली ,बादल पे उड़ना होगा
थोडा हैं थोड़े की ..........................................

हमने सपना देखा हैं कोई अपना देखा हैं
जब रात का घूंघट उतरेगा
और दिन की डोली गुजरेगी
तब सपना पूरा होगा ,
थोडा हैं थोड़े की जरुरत हैं
जिंदगी फिर भी यहाँ खूबसूरत हैं

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

भक्तो के लिए उदारतम प्रिय इष्टदेव - भगवान श्री हरि , कृष्ण सुदामा प्रसंग

हम सभी साधक जानते हैं की विष्णु जी के साधक प्रायः कष्टों में पाए जाते हैं या अभावो में जीवनयापन करने वाले मिलेंगे । पर शिवजी के साधक हमेशा सुख समृधि से भरपूर मिलेंगे । जबकि शिवजी स्वयं साधारण तरीक से रहते हैं और विष्णुजी सुखो और आनंद से भरपूर । इसका रहस्य वैसे तो मुझे यही लगता हैं की विष्णु जी के इष्टदेव शिव जी हैं सो शिवभक्त होने कारन वे समृद्ध हैं और क्योंकि शिवजी के इष्टदेव विष्णुजी हैं इसीलिए शिवभक्त होने के कारन समृद्ध हैं ।

एक प्रसंग जो मित्रता और उदारता की पराकाष्ठा हैं वो हैं कृष्ण और सुदामा का मिलन । सुदामा की अति तुच्छ भेंट को स्वीकार करके बदले में उसे अति उच्च सुख वैभव देने की ठान लेते हैं । रामानंद सागर जी द्वारा निर्मित "श्री कृष्ण " का ये प्रसंग सुनिए

कृष्ण जी कहते हैं :- इन तीन मुठ्ठी चावल पर तो मैं तीनो लोक न्यौछावर कर दूँ । बस इससे तीनो लोकों में हलचल हो जाती हैं । पृष्ठभूमि में गीत उभरता हैं
"
हर दाने का मोल यदि देने लगे भगवान्
रह जाएगा सृष्टि में बस एक ही धनवान

प्रेम के भूखे प्रेम के तंदुल प्रेम के भाव से खाने लगे हैं
तंदुल के दानो में दीन का दैन्य दारिद्र्य चबाने लगे हैं

एक एक मुठ्ठी में एक एक लोक
सुदामा के भाग में जाने लगे हैं
त्रिभुवन पति की देख उदारता तीनो भवन थर्राने लगे हैं

पहले मुठ्ठी लेते ही प्रभु ने स्वर्ग सुदामा के नाम किया हैं
दूसरी मुठ्ठी में पृथ्वी का वैभव विप्र को सौंप दिया हैं

तीसरी मुठ्ठी में देने लगे जो वैकुण्ठ
तो लक्ष्मी ने रोक लिया हैं
अपना निवास भी दान में दे रहा
कैसा दानी ये मेरा पिया हैं ।

इस प्रकार देखा हमने की प्रभु कैसे करूणानिधि और भक्तवत्सल हैं कि अपना सब वैभव सौंपने को तैयार हैं , तभी तो इतनी ऊंची ज्ञान कि स्थिति को छोड़कर खुद हरिभक्त भगवान् शिव कहते हैं
" उमा कहूं मैं अनुभव अपना
सत हरिभजन जगत सब सपना "

बना के क्यों बिगाड़ा रे नसीबा ( ज़ंजीर , लता मंगेशकर )

इश्वर से प्रेम बड़ी अनूठी बात हैं । हम सभी इश्वर से प्रेम तो करते हैं पर शिकायते भी पूरे दिल से करते हैं । यही तो आधार हैं जो धीरे धीरे हमें इश्वर के निकट ले जाता हैं और फिर वो हमेशा के लिए अपना बना लेता हैं । फ़िल्मी गीत वैसे तो ज्यादातर मनोरंजन के लिए ही बनते हैं पर कई गीत फिर भी बहुत अच्छे होते हैं । ऐसा ही एक गीत जो इश्वर से शिकायत करते वक्त जया भादुड़ी पर फिल्माया ये गीत लता जी की आवाज़ में बड़ा ही अभूतपूर्व लगता हैं । हरि शरणम् ही सर्वोपरि हैं । देखिये ये गीत :-

बना के क्यों बिगाड़ा रे बिगाड़ा रे नसीबा
ऊपर वाले ऊपर वाले

जो तुझको मंजूर नहीं था फूल खिले इस प्यार के
फिर क्यों तुने इन आँखों को रंग दिखाए बहार के
आस बंधा के प्यार जता के बिगाड़ा रे नसीबा
ऊपर वाले ऊपर वाले .................................

पाप करे इन्सान अगर तो वो पापी कहलाता हैं ,
तुने भी ये पाप किया फिर कैसे कहूँ तू दाता हैं
रहा दिखा के राह पे लाके ,बिगाड़ा रे नसीबा
ऊपर वाले ऊपर वाले ..............................

हनुमान कालनेमि संवाद ( लक्ष्मण मूर्छा प्रसंग )

भक्ति के प्रसंग मन को लुभाते हैं । कभी कभी अभक्त भी कुछ ऐसे गीत गाते हैं कि मन सहज ही कहता हैं कि इश्वर सबका हैं । श्री रामानंद सागर की रामायण में जब लक्ष्मण जी लिए हनुमान जी संजीवनी लेने गए तो रस्ते में रावन का भेजा हुआ कालनेमि माया से हनुमान जी को भ्रम में डालने की कोशिश करता हैं । उसका भजन देखिये :-
पहले हनुमान जी को दिखाने के लिए भजन गाता हैं
राम श्री राम जय जय राम श्री राम मैं तो राम ही राम पुकारूँ
श्री राम नहीं मोरी सुध लीन्ही मैं कब से राह निहारूं
फिर हनुमान जी को संबोधित भी कर देता हैं
बटेहू जाने वाले श्री राम प्रभु के मतवाले
तू राम नाम रस पी ले तन मन की प्यास बुझा ले

फिर पृष्ठभूमि में गीत उभरता हैं
कपि के कानो में पड़ा राम राम जय राम
उतरे हनुमत जानकार रामभक्त का धाम
फिर हनुमान जी को अपनी अंतर्यामी शक्ति का रौब दिखाते हुए नाम लेकर पुकारता हैं और कहता हैं की वो त्रिकाल दर्शी हैं , वो सब जानता हैं और भजन ये हैं :-
मेघनाद ने शक्ति मारी हैं ,तेरा राम बड़ा दुखारी हैं
तुझे एक वैद्य ने पठाया हैं तू संजीवनी लेने आया हैं
किते से आवे किते को जावे बाबा ने सब बेरा रे
जानो हैं बड़ी दूर बटेऊ कर ले रैन बसेरा रे
पर हनुमान जी आराम करने के लिए मना करते हैं और कहते हैं कि हे भगवन मुझे प्रस्थान की आज्ञा दें ।
फिर कालनेमि कहता हैं :-
यही भगवन की आज्ञा हैं तू आज यही विश्राम करे
तू क्यों चिंता करता हैं जो करना हैं सो राम करे
राम लखन के जीवन में कभी होगा नहीं अँधेरा रे
पर हनुमान जी फिर भी तैयार नहीं हुए तो उसने कहा कि स्नान करके आओ मैं पल भर में में उस पर्वत तक पहुंचा दूंगा जहाँ संजीवनी हैं , वो कहता हैं

तुझे भूख प्यास नहीं लागे मैं ऐसा मन्त्र बता दूंगा
तुझे जिस पर्वत पे जाना मैं पल भर में पहुंचा दूंगा
स्नान ध्यान करके तू आजा तोहे बना लू चेरा रे

इसके बाद का तो आपको पता ही होगा की हनुमान जी ने इस राक्षस और एक पूर्व जन्म की अप्सरा, इस जन्म की मादा मगरमच्छ का उद्धार कर दिया .

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...