सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

भक्तो के लिए उदारतम प्रिय इष्टदेव - भगवान श्री हरि , कृष्ण सुदामा प्रसंग

हम सभी साधक जानते हैं की विष्णु जी के साधक प्रायः कष्टों में पाए जाते हैं या अभावो में जीवनयापन करने वाले मिलेंगे । पर शिवजी के साधक हमेशा सुख समृधि से भरपूर मिलेंगे । जबकि शिवजी स्वयं साधारण तरीक से रहते हैं और विष्णुजी सुखो और आनंद से भरपूर । इसका रहस्य वैसे तो मुझे यही लगता हैं की विष्णु जी के इष्टदेव शिव जी हैं सो शिवभक्त होने कारन वे समृद्ध हैं और क्योंकि शिवजी के इष्टदेव विष्णुजी हैं इसीलिए शिवभक्त होने के कारन समृद्ध हैं ।

एक प्रसंग जो मित्रता और उदारता की पराकाष्ठा हैं वो हैं कृष्ण और सुदामा का मिलन । सुदामा की अति तुच्छ भेंट को स्वीकार करके बदले में उसे अति उच्च सुख वैभव देने की ठान लेते हैं । रामानंद सागर जी द्वारा निर्मित "श्री कृष्ण " का ये प्रसंग सुनिए

कृष्ण जी कहते हैं :- इन तीन मुठ्ठी चावल पर तो मैं तीनो लोक न्यौछावर कर दूँ । बस इससे तीनो लोकों में हलचल हो जाती हैं । पृष्ठभूमि में गीत उभरता हैं
"
हर दाने का मोल यदि देने लगे भगवान्
रह जाएगा सृष्टि में बस एक ही धनवान

प्रेम के भूखे प्रेम के तंदुल प्रेम के भाव से खाने लगे हैं
तंदुल के दानो में दीन का दैन्य दारिद्र्य चबाने लगे हैं

एक एक मुठ्ठी में एक एक लोक
सुदामा के भाग में जाने लगे हैं
त्रिभुवन पति की देख उदारता तीनो भवन थर्राने लगे हैं

पहले मुठ्ठी लेते ही प्रभु ने स्वर्ग सुदामा के नाम किया हैं
दूसरी मुठ्ठी में पृथ्वी का वैभव विप्र को सौंप दिया हैं

तीसरी मुठ्ठी में देने लगे जो वैकुण्ठ
तो लक्ष्मी ने रोक लिया हैं
अपना निवास भी दान में दे रहा
कैसा दानी ये मेरा पिया हैं ।

इस प्रकार देखा हमने की प्रभु कैसे करूणानिधि और भक्तवत्सल हैं कि अपना सब वैभव सौंपने को तैयार हैं , तभी तो इतनी ऊंची ज्ञान कि स्थिति को छोड़कर खुद हरिभक्त भगवान् शिव कहते हैं
" उमा कहूं मैं अनुभव अपना
सत हरिभजन जगत सब सपना "

कोई टिप्पणी नहीं:

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...