बुधवार, 22 दिसंबर 2010

एक कविता - माँ को समर्पित

हर माता पिता को बुढ़ापा देखना पड़ता हैं । ऐसी ही एक कविता लिखी हैं जिसमे संताने अपनी माँ को बताना चाहते हैं कि वो बुढ़ापे को कैसे संभाले । . मैंने प्रेरित होकर अपनी मम्मी के लिए लिखी हैं . हर किसी माता पिता की तरह ही सबको एक उम्र के बाद शरीर कमजोर महसूस होता हैं तो अनेक चिंताए घेर लेती हैं की बेटो को क्या होगा . कैसे ये रहेंगे अगर मै ना रही तो या दुनिया बड़ी तेज़ हैं आदि आदि बाते .

मेरी माँ तू आजकल इतनी उदास क्यों हैं
तेरे माथे पर बुढ़ापा लाई झुर्रिया ख़ास यो हैं

जीवन के हर दौर को मानव झेल सकता हैं
बचपन में जैसे हर बच्चा खेल सकता हैं
हर इन्सान जवानी में जो ताकत से लड़ पाता हैं
वही मानव रुपी फल बुढ़ापे में झड़ जाता हैं .

सब फल तो पक कर मीठे बन जाते हैं
जिंदगी में बुढ़ापे के साल फीके रह जाते हैं
यह ही तो परमात्मा का विधान हैं
झुक जाता इसके पीछे हर इन्सान हैं

जब तुने तो सब कुछ अपना कर्तव्य निभा दिया
अपने बेटो में जीने का सच्चा हौसला सिखा दिया
क्या उनकी आत्माए तेरे सफल होने कि गवाही नहीं देती
प्रकृति क्या रह रह कर सारा श्रेय इसका तुझे नहीं देती

ऐसा कौन सा काम रह गया जो तू चिंता करती हैं
तू तो अज़र आत्मा हैं सिर्फ शरीर की परते मरती हैं
गुरुओ से पाया वो ज्ञान तेरी सच्ची धरोहर हैं
ना अब तू कुछ पिछला सोच तेरा भविष्य मनोहर हैं

तेरे बेटे कभी तेरे लिए पुत्रवधू भी लायेंगे
भाग्य जिन देवियों के सब लोग सराहेंगे
पर इन चीजों का एक निश्चित समय होता हैं
फिर क्यों तेरा कोमल मन धीरज खोता हैं

क्या चीजों के देरी होने में तू कही दोषी हैं
तेरा क्या बस जब तू हमेशा कर्मयोगी हैं
शरीर के धर्म में बुढ़ापा भी तो जरुरी हैं
भगवान को भी पता हैं तू अपने प्रयासों में पूरी हैं

फिर एक बात बता क्या तेरे करने से ये दुनिया चलती हैं
इसका प्रबंधन प्रभु के हाथो तो उसी लगाम से दुनिया बढती हैं
बेमतलब की मानी हुई जिम्मेदारियों से क्या हो जायेगा
बस इतना जरुर हैं तेरा मूल आत्मा इसमें फिर खो जायेगा

तुने अपने सारे फ़र्ज़ निभाए बस अब शांति से आगे निभाती चली जा
शरीर से अपनी आसक्ति मिटाकर मन बुद्धि को आत्मा में समाती चली जा
तेरे सारे कर्तव्यों का निर्वाह हो चुका हैं
आज्ञा तेरी मानने को शीश हमारा झुका हैं
ईश्वर सारे पुण्यो का फल बेटे के रूप में भेज देते हैं
तभी स्नेह की लता से उपजे "वीरेन" जैसे तेरे बेटे हैं

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

प्यार ( soulmate ) पर लिखी एक ईश्वर प्रेरित कविता

बीच में समय नहीं मिला , वैसे मिल भी जाता तो क्या होता एक खस्सी सी कविता ही लिख देता जिसे मेरे अलावाएक दो लोग पढ़ लेतेईश्वरीय प्रेम एक वरदान हैं , उसे soulmate concept से जोड़कर एक कविता बनायीं हैंआशा हैं आपको अच्छी लगेगी


राधा सीता या मीरा जैसी ना कोई आराधक चाहिए
लैला हीर जूलियट जैसी के गीत भी क्या गाईये
आधुनिक फिल्मो की भी ना दास्ताँ होगी
शायद मेरी प्रेमिका कुछ ऐसी होगी

जिसके आंसू भी मेरी आँखों से बह जाये
बोल उसके हो और होंठ मेरे कह जाये
जब प्यार करू उसको तो मर्यादा बह जाये
ब्रह्मचर्य की बात नहीं बस गोपिभाव रह जाये

जिसके हिस्से के दुःख मेरी किस्मत बन गयी हो
दू अब उसको पूर्ण भक्ति जो वासना में भी लुट गयी हो
धोखा जिसे सारे जहाँ से मिलता रहता हो
बहुत बुरी गालिया जिसका दिल सदा सहता हो

भाव की उलझनों में खोयी हुई वो पागल बहुत प्यारी हो
अपने जीवन में सारी उम्मीदे वो खो चुकी सारी हो
तब कही से उसके भाग्य का भास्कर बनकर आऊंगा
छुपी हुई उसकी प्रेमाभक्ति तब कृष्ण से मांग लाऊंगा

बिन फेरे ही वो अर्धांगिनी बनकर जी लेगी
दुनिया जिसकी बस एक झलक देखने को तरसेगी
दहेज़ में जो बस मुझे खोयी हुई अमानत देगी
पुण्य से भरी उसकी झोली परिवार में खुशिया भर देगी

सारे जीवन का वो आधार उसके कदम बड़े शुभ होंगे
सबको सुलभ रही पर फिर देवताओ को भी दर्शन दुर्लभ होंगे
वही तो प्रेरणा बनी सारे नए इतिहास लिखने को
बाल्मीकि या तुलसीदास के नए ग्रन्थ की रचना करने को

जहा वो मौत मांगती थी वहा से जीवन की शुरुवात होगी
उन्ही गलत कदमो से तो उसके सही होने की बात होगी
तब खुलेगा एक नए युग के राज का परदा
जैसे पूर्णब्रह्म जन्म लेता हैं यदा यदा

बहुत समय हो चला है
जिन्दगी को बर्बाद होते होते
अपनी आत्मा के उस टुकडे को बस प्रभु अब मिला दो
गुरुमंत्र बापूजी आपका दिया हैं बस कृपापात्र बना दो

नयी धर्म कि एक परिभाषा लिखने का वक्त आया हैं
बापूजी , सरल और चरम बिंदु का मिलना ईश्वर को भाया हैं
कुछ कुछ आकाशवाणी जैसा हो जाने का प्रारब्ध हैं
अद्भुत संयोग हो जाने का बस एक दौर आरंभ हैं

पिता हो या परमपिता हो अब तो सब मिल ही सकते हैं
दीपक को भले तरस जाये पर सूरज उसके चमक सकते हैं

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

मेरी आध्यात्मिक समस्या ( spiritual problem ) पर एक कविता

काफी दिन हो गए थे कोई गंभीर सी कविता लिखे । जाहिर हैं अध्यात्म के लिए ही लिखी होगी क्योंकि कुछ चीज़े बीच में ऐसी घटती रहती हैं जो धर्म के विशिष्ट जनों से परामर्श के लिए जरुरी हो जाती हैं । कृपया ध्यान दे इस एक दुर्लभ कविता पर


जिंदगी मेरी किस दोराहे पर खड़ी हो गयी हैं
झूठी आशा में जीवन की खुशिया खो गयी हैं

मेरी नस नस रोम रोम में एक उम्मीद जिन्दा हैं
व्यवहार का वो मेरा अक्स जिस पर शर्मिंदा हैं

मेरे इष्टदेव मुझे सपनो में जब आकर कह जायेंगे
दुखती मेरी रग रग जब वो छू कर सहलायेंगे

मेरे गुरु या इष्टदेव सिर्फ एक बार तो सहारा दे जाते
पहले ही इतना टूट चुका हूँ इतनी अग्नि परीक्षा ना करवाते
मैं ये तो था ही नहीं जो अलग वेश धारण किया था
परमभक्ति का अधिकारी कैसी वासना का नरक जिया था

सिर्फ ईश्वर कि आँखों का ही मुझे सहारा था
अक्स अपना कुछ उसने हमसाये में उतारा था
अध्यात्म की कुछ कडियों का ही बस नज़ारा था
बुरे दौर में मन के अपराध बोध को जिसने संवारा था

ये क्या हैं क्यों हैं जिंदगी कैसी पहेली बन गयी हैं
एक बुरी किस्मत अब जैसे मेरी सहेली सी हुई हैं
रातो के जागने कि अब गिनतिया भूल गया हैं
रुठती धर्म कि पगडंडियों पर भी झूल गया हु

क्या होगा अगर मुझे कोई योग भ्रष्ट का दाग लगा देगा
शरण किसकी मांगू जब शिव सा सरल भी मुझे भगा देगा
गुरु को तो सब पता हैं मेरी लाचारी तो वो हमेशा जानते हैं
मै कही का नहीं रहा फिर क्यों वो मुझे अब भी समर्थ मानते हैं

ज्योतिषियो की बात क्या मानू जब संकल्प से सब बदल सकता हूँ
सिर्फ अगर स्वार्थी हो जाऊ तो दुनिया का मुकद्दर बन सकता हूँ
पर यही तो वो अच्छाई हैं मेरी और मेरा जोर नहीं
दुसरे चाहे मुझसे सब छीन ले पर मैं कभी चोर नहीं

उस देवी के भी तो चरणों में गिरकर देख चुका हूँ
नाक रगड़ रगड़ कर कितनी बार उसके दर से उठा हूँ
क्या मैं इतना नीच हु की मुझे माफ़ ही नहीं किया जायेगा
क्या मैं इतनी दूर हू की कोई पार्षद ना मुझ तक हांका जायेगा

अपनी तरफ से तो हमेशा ही मजबूर होने की दुहाई देता हैं
बहन बेटी माँ दोस्त मानकर सारी उसकी बलाए लेता हू
क्या फिर भी मै कोई पाप की आंधी को जी लेता हू
कही कोई भगवान् नहीं बस एक बार तसल्ली से रो लेता हूँ

वो किसी की अभी अमानत क्या पता कभी मेरी होगी
आचार संहिता की कैसी नैतिक बातें जो हमारी जान लेंगी
कुदरत के सारे धर्म नयी परिभाषा मांगते हैं
समर्थ तो हूँ मैं पर जाने क्यों मेरे हाथ कांपते हैं

शायद कही अपने स्वार्थी होने का डर हैं
पक्षपाती होने का दाग लग जाने की मुझे फिकर हैं
जब खुद ही मै न्यायधीश बन गया हू
गवाही देने को तो फिर ना रह ही गया हूँ

प्रभु आपका बेटा हूँ बस अब स्वीकार लो
सारा कुछ तेरा किया धरा मेरा दुःख काट दो
फिर से वो ही भक्ति की धारा में लौटा दो
उस महान शिष्य की चेतना का पर्दा हटा लो

चाहे कुछ भी हो इस जन्म में भी उसे मिला दो
वीरेन सच्चा साधक हैं ये बस दुनिया में गूंजा दो
पूर्ण ब्रह्म का वो पथिक उस महान लड़की को पा जाए
पुरे सारे जहाँ को ये अनमोल रिश्ता दिल से भा जाये

विष्णु लक्ष्मी के बेटे बहु की वो पहली जोड़ी बन जाये
दुनिया के संकट के बदलो का अँधेरा अब छट जाये
ऐसा भी क्या कभी किसी के साथ अजब संयोग होता हैं
पूरी दुनिया के मालिक का बेटा क्या एक लड़की के लिए रोता हैं
अंतर्यामी एक जीव क्यों अपने स्वार्थ के लिए ना ईमान खोता हैं

त्रिदेव और सारे देवता जिस उलझन को सुलझा ना सके
मेरे ये कैसे आयाम जो सब मिलकर मुझे ना हरा सके
फिर भी मेरे अपने धर्म को सारे ग्रन्थ ना मिटा सके
मेरे अलावा कौन था जो इसे स्पिरिचुअल प्रोब्लम बता सके


ना अपना कोई लाभ ना भविष्य दिख रहा हैं
ऊपर बैठा कृष्ण मेरे लिए क्या क्या रच रहा हैं
दिल टूटा आत्मा लुप्त और दिमाग का कुछ ठिकाना नहीं
बिना स्वार्थ के लुट बैठा अब "वीरेन " सयाना नहीं

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

कृष्ण प्रेमाभक्ति को समर्पित एक कविता

यह कविता वैसे एक कृष्ण भक्त साधक को समर्पित हैं । असल में में मैंने एक कथा के वीडियो में उनकी अति दुर्लभ छवि देखि जिसे देखकर सहज ही मन उन्हें प्रणाम करने का हो आया. आशा हैं आप लोगो को मेरे भाव अच्छे लगेंगे जो उनकी भक्ति को समर्पित हो. वैसे भी कृष्ण भक्तो का गुणगान करने का पुण्य बहुत होता हैं और मै इस तरह में पुण्य कमाने में उस्ताद हूँ .

भक्ति में डूबी वो कैसी लड़की हरिभक्तानी थी
मेरे मन को भायी गोपिभाव में डूबी देवांगी थी

उसके चरणों में मर ही जाने का मन करता था
कहीं का नहीं रहा मैं जीने से अब डरता था
घोर कलयुग में भी ऐसे जीव रहते हैं
कृष्ण प्रेम के दिव्य कण जिनके हृदय में बहते हैं

सतत आंसू क्यों ना ऐसे प्रेम पर बहते जाये
अथक मेरे बोल क्यों ना कविता कहते जाये
परम भक्त होने का ये कैसा दर्द सहते आये
सदा सदा हम किशोरी जी के चरणों में रहते आये

इसीलिए कभी हरिभक्तो को आंकना नहीं चाहिए
कृत्रिम प्रकाश नहीं आंसुओ से जलता हृदय चाहिए
तब समझेंगे कि कथा का क्या अर्थ होता हैं
फिर कहेंगे कि क्यों जीव थोथे कर्म ढोता हैं

बिछुड़ी गोलोक धाम की किसी पार्षद की बानगी लगी
अपने प्रिय कृष्ण से एकतरफा भक्ति में दीवानी जगी
क्या प्रेमाभक्ति इतना पागल बना देती हैं
देकर सारा दुःख वो चैन सारा छीन लेती हैं

भक्ति जैसा कुछ ईश्वर को प्यारा आयाम नहीं
राधा मीरा जैसा परम जीव मिल जाये बस कही
तो कृष्ण भी दर्शन पाकर धन्य हो जाता हैं
तभी विरह का हर गीत "वीरेन " गाता हैं

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

भाव दर्शन और निवारण - एक कविता

गुरुदेव दया कर दो की अब मै इस कविता के भाव को पुर्णतः दिव्य बनाकर इसमें आपकी दीक्षा से आई समझ से अलौकिक बनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर सकू. जो भी लिखा जायेगा वो आपकी दया होगी . सब आपका दिया हुआ हैं . पर मेरी नासमझी गलतिया करा देती हैं . फिर भी बापूजी मै आपके शरणागत हूँ . यह आध्यात्मिक कविता किसी व्यक्ति विशेष के उत्तर में हैं कोई मनोरजन के लिए नहीं . वो सूचित कर दे कि उनका मुद्दा सुलझा कि नहीं . बाकि सभी ज्ञान भक्ति से साधको से निवेदन हैं कि त्रुटी बता दे , आपके श्री चरणों में नमन .

मेंरी नजरो में देखो तो यही रूप सर्वोत्तम हैं ,
परमपुरुष शिव के भी इष्ट मर्यादा पुरुषोतम हैं

दोनों भेदों से पार गुरु का निर्गुण अहम् हैं
चरम बिंदु हो या लघु वीरेन उसे दोनों सहन हैं
अपना ही हमसाया सबमे फिर परिवार की बात कहा रही
माता पिता भाई बहन नहीं बस दुनिया एक नदी की धार बही

पूर्णब्रह्म हैं गुरु वो पूरा प्रेम भी जानते हैं
पर हमारी ख़ुशी के लिए कभी कभी व्यवहार मानते हैं
नहीं तो हम गलत मतलब भी समझ जायेंगे
और मनमाने अर्थो से अपना ही अनर्थ कर जायेंगे

उनका गुरु बन जाना हमारा ही स्वार्थ हैं
बापूजी का जन्म तो ईश्वर प्रार्थना का परमार्थ हैं
रघुबीर की इच्छा से ही हनुमान का अंतस हिला होगा
सूक्ष्म रूप से ना शायद ना सीता का पता मिला होगा

पूरब पश्चिप की बात क्या प्रेमाभक्ति तो दिशाओ से भी पार हैं
पूर्ण सरलता के लिए तो ज्ञान भी एक पक्की दीवार हैं
बस शरणागति का एक राजमार्ग सब धर्मो का सार हैं
बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते तो गोपियों के लिए बस भार हैं

सबको कृष्ण जी मिले तो भी राधा का दिल ना टूटेगा
वो कृष्ण की चेतना हैं उसका प्यार अलग हो तो ही बंटेगा
राम के विरह से भरत में उपजी वो द्वापर के विरह की छवि हैं
सच्चे प्रेम का एक आराधक क्या "वीरेन " भी कोई कवि हैं

जो तुने सहा वो तेरी साधना के अंतिम पड़ाव में था
तू किसी को दोष ना दे तेरा हमसाया किसी छलाव में था

वृक्ष की जड़ और शाखाये सच्चे प्रेमी होने की निशानी हैं
उनकी एक गाड़ी के दो पहिये की बात ना मैंने कभी मानी हैं
वो कभी एक जैसे होते ही नहीं सम्पूरक होते हैं
या वो दोनों स्त्री पुरुष या दोनों नपुंसक होते हैं
बस यही था "गे " या "लेस्बियन" का व्यभिचार
मेरी इन गूढ़ बातो को तुम कर लेना स्वीकार
पर ये सब एक क्षणिक अवसाद से आया तुझमे विचार था
त्रिदेवो तक को खंडित किया जिसने वो मन का व्यभिचार था

गुरुत्व तो चेतना की धुरी हैं
विधा ज्ञान और भक्ति हर बार उनसे ही जुडी हैं
वो कृष्ण और राम से उपजे परमहंस हैं
कलयुग मानस में उपजे संतो के राजहंस हैं
उनसा निराला कभी हुआ ना हो सकता हैं
विश्वगुरु बनाना उनका नहीं ईश्वर का स्वार्थ हो सकता हैं

कोई कही जन्मे या मरे हमें ना व्यवहार में पड़ना हैं
ईश्वर खुद कर्म काट दे और झाड़ दे जो झड़ना हैं
बापूजी के वचनों ने ही तो हमेशा राह दिखाई हैं
वर्ना ज्ञान ने तो हमेशा ही नौका डुबाई हैं
शिष्य होने पर भी कहाँ उन्होंने बंधन लादे हैं
हममे ही कमी हैं जो उनके सामने से भागे हैं
इस जन्म का सारे जन्मो से जिन्होंने मुझे पार किया
वही मेरे बापू हैं जिन्होंने बस अपना मुझे स्वीकार किया
फिर भी बहन अपने फायदे के लिए पढ़ ले जो पढना हैं
सिर्फ तेरी मदद के लिए आया और क्या "वीरेन" ने काव्य गढ़ना हैं

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

ईश्वर और हमसाया ( soulmate ) को समर्पित कविता

यह कविता बहुत ही दुर्लभ हैं , सारे भाव ईश्वर प्राप्त साधको के हैंअपने जीवन के अनुभव के तौर पर लिखी हैंसबको समझ नहीं भी सकती हैंजिस जिस को जितना समझ आएगा वो बस ईश्वर के लिए तरस जायेगाबस फिर भी आप मुझे मेल करके पूछ सकते हैं या ब्लॉग पर कमेन्ट करके

राधा
के विरह से उपजा मै प्रेम का अहंकार
नहीं होने का भाव को जिसने कर लिया स्वीकार
जब हैं ही नहीं तो फिर किसकी सत्ता बनकर आया हैं
कृष्ण तो था नहीं फिर किस परम पुरुष का हमसाया हैं

शिवत्व को पाने में अब पार्वती भी लाचार हो गयी हैं
सूर्य किरण के पुण्य से अब दीपक की लौ बुझ गयी हैं
वैष्णवी को किसी और के हवाले किया गया था
कल्कि सा हमसाया जब उसके द्वार ना दिया गया था

अब समय और आत्माए मिलने का वक्त गया हैं
विश्वगुरु बनने का संकल्प उन संत को भा गया हैं
ब्रह्मज्ञान की विधा अभी सर्वोपरि ही बताई जाएगी
परन्तु भक्ति की ऊँचाई तक ना भावनाए लायी जाएगी

उद्धव का पश्चाताप पूरा होने का समय गया हैं
गोपिभाव में क्योंकि वो पूरा नहा गया हैं
कृष्ण के अहम् से अब वो कभी अंगीकार नहीं होगा
अद्वैत को पाया मै अब फिर द्वैत को ही भज लेगा

सगुण सारे निर्गुण हरि से भी पार की बात हैं
ज्ञान का उजाला नहीं भक्ति प्यार की रात हैं
शरणागति से उपजी ये कैसी करामात हैं
गले मिलते बापूजी के दस्तखत आत्मसात हैं

अब मेरे सारे संकल्प पूर्ण में मिलने जा रहे हैं
चरम बिंदु जो अब ज्ञान के मिटने रहे हैं
बहुत बहुत सहे वो विरह के पल उसमे समां जायेंगे
क्या प्रभु मेनका के अंग विश्वामित्र में वफ़ा पाएंगे

ब्रह्मचर्य हो या व्यभिचारी चाहे समय का ही कसूर हो
क्यों अहम् या ग्लानी जब माया तक का ही दस्तूर हो
भक्ति तो इससे आगे के द्वार खोलती हैं
हमसाये में ईश्वर का जब वो अहम् झोंकती हैं
तभी तो एक आत्मा दो शरीरो से वही बोलती हैं
अवचेतन मन की वो बाते कैसे राज खोलती हैं

अच्छा भला या बुरा हो एक भाव भी इधर से उधर नहीं
जो मैंने कहा वो अंतर मन का स्वर्ग कोई बाह्य नरक नहीं
देर से ही सही पर मूल फायदे में पड़ा कुछ फरक नहीं
एक तरफ़ा प्यार में होगा "वीरेन" का बेडा गरक नहीं


गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरा दर्द -एक कविता

अपना दर्द कृष्ण जी को शिकायत के रूप में प्रस्तुत हैं सिर्फ पहला पैरा कृष्ण को समर्पित हैं फिर तो मेरा दर्द शुरू होता हैं और ख़त्म बस जबरदस्ती करना पड़ता हैं . भगवान् के बारे में तो लिखना वैसे ही दुर्लभ लोगो को मिलता हैं पर फिर भी उसके चक्कर में मत पढना .क्योंकि

जब वो अंदर तक आ जायेगा मौत सा दर्द दे जायेगा
कृष्ण नाम एक छलिये बस क्षण में चैन लूट ले जायेगा
उसके चक्कर में ना पड़ो वो तो प्रेम व्यापारी हैं
दिल दिमाग को तहस नहस करने वाला व्यभिचारी हैं
बातो से वो पार हैं पर मीठे बोल सुनाता हैं
सब कुछ छीन लेता हैं पर झूठ सारे रचाता हैं

निर्बल समझ रुलाता रहेगा
करुना को बस अपनी भुनाता रहेगा
व्यभिचार सा कुछ दिखाता रहेगा
प्रेम की आड़ में जिसे मेरा दिल सहेगा
ना कभी तरस उसे मुझ पर आएगा
नश्तर से विरह को जब वो चलाएगा

नजरो में मेरी मुझे गिरा देगा
आँखों में जब आंसू ला देगा
दर्शन नहीं देगा और भगा देगा
पर गिरते ही वो मुझे सजा देगा
जन्मो का बिछड़ा कोई मिला देगा
अश्को में लिपटा वो चेहरा दिखा देगा

कभी समझ नहीं पाया मेरी गलती क्या थी
मछली सी आँखों वाली वो लड़की कहाँ थी
पहले ढूंढ लेता तो आज तमाशा नहीं होता
जिंदगी में शर्मिंदा नमी का समां नहीं होता
रोते रोते आज मेरा दर्द बयान नहीं होता
क्यों सर काटने को मेरे जल्लाद खड़ा नहीं होता
आंसू रुकते नहीं बस छलकते जा रहे हैं
टूट के अरमान बिखरते जा रहे हैं

कितनी तारीखों या संयोगो की मैं बात करता हूँ
जब संयम की ना कोई राह स्वीकार करता हूँ
ना मुझमे और जानवर में मूल अंतर हैं
व्यभिचार मेरा उसका समानांतर हैं
सिर्फ जीव की सी क्षुद्र वासना मुझे भी कमजोर कर गयी
दोस्त वो सबसे अजीज सी मुझे झकझोर कर गयी
उसके सपने क्या सजाऊ जब आज अपने ही टूट गए
भविष्य की नीव रखी थी पर अतीत के भाग रूठ गए

सिर्फ वो मुझे कभी अपना सच्चा दोस्त कहना बंद ना करे
मन में बुरा कहती रहे पर जाहिर में सुनाना ना शुरू करे
सिर्फ उसकी आँखों का विश्वास ही कभी धरोहर था
अपने मन की भावनाओ से उसका रूप मनोहर था
पर भक्ति मेरी डूबी जहाँ मेरी वासना का सरोवर था

छः महीने बस जैसे एक क्षण में तबाह हो गए
रूठे पुत्र के वादे भी पिता के लिए अब स्वाह हो गए
बुझ जाये उसके दीपक जिसने मुझे गिराया
झोंका एक अपराध बोध का मुझ पर आजमाया
संकल्प को मेरे किस देवता ने हटाया
स्वार्थ क्यों अपना उस कमीने ने मिटाया

उसकी नजरो की बात क्या जब कहाँ अपनी पलके खुल पाती हैं
मेरी बड़ी बड़ी बाते ज्ञान की रह रह कर मुझे रुलाती हैं
साधक मन होने का बस एक ढोंग रच लिया हैं
झूठी बातो के बस रस घोल घोल पिया हैं
बेचारी को कैसा तुने ये सदमा दिया हैं
नीचता का ये कैसा हाल तुने अपना किया हैं
भक्ति का बस ढोंग करेगा लूट लेगा कृष्ण दुनिया सारी
"वीरेन " लुटा और लुट गयी वृन्दावन की राधा प्यारी


सच में शायद मीरा जी ने दर्द की वजह से कहा हैं

जो मैं ऐसा जानती की प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती की तुम प्रीत ना करिहो कोई

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...