यह कविता श्रीमती वंदना गुप्ता जी की ब्लोग्पोस्ट के जवाब में हैं . असल में टिपण्णी ज्यादा बड़ी हो रही थी . इसीलिए मजबूरीवश ऐसा करना पड़ा .वंदना जी के के पोस्ट का लिंक ये हैं . वैसे जरुरी हैं कि मेरे जैसे निम्न स्तर के व्यक्ति से पहले आप उनकी अद्भुत रचना को पढ़े तो तारतम्यता भी बनी रहेगी .
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html
दुःख हमारा बस थी सच्चे प्रेम की आह
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
आप तो सर्वसमर्थ थे फिर क्यों नियमो की आड़ देते हो
समाज के अंगो की बिसात आप तो भावो से ही ताड़ लेते हो
आपकी सारी बाते सही पर इसमें राधा का कसूर बताओ
पुरुष प्रधान दुनिया में पिसती रहे जरा दस्तूर समझाओ
जब परमसत्ता तू ही हैं तो फिर क्यों तर्क देता हैं
भविष्य राधा का तू फिर क्यों ना अत्तीत देता हैं
साधना जिसकी तू ठुकरा कर भाग गया
शायद झूठा तेरा कर्मयोग तुझे जाग गया
व्यवहार पर खरा उतरा लोगो के फिर भावो को क्यों नहीं देखा
धोबी का तुझे पूरा ध्यान दिखी ना राधा के दिल की रेखा
सीता ही तो परीक्षा देती रही सदा यहाँ
मर्यादापति के भाग्य में भला ऐसा सौभाग्य कहाँ
वृन्दावन की राधा ही तो प्रतीक्षा करेगी
समर्थ कृष्ण से ना ये कभी प्रथा निभेगी
कृष्ण चाहे तर्कों से बात करे पर राधा को इनसे क्या मतलब हैं
सिर्फ भावो के दम पर वो लुट गयी कहाँ ज्ञान का कोई करतब हैं
सामर्थ्य की परमसत्ता होकर भी राम कृष्ण क्यों बहाने बनाता हैं
टूटती किस्मत सी बनकर सीता राधा सा जीव लुट जाता हैं
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
3 टिप्पणियां:
ek baar fir bahut hi bhaavpuran rachna
jai SHRI KRISHNA
वीरेन्द्र जी,
मैने तो कृष्ण राधा दो अलग स्वरूप बताये ही नही……………जब अलग हैं ही नही तो विछोह कैसा?
ये तो जगत के लिये बताया है कि मानव बनकर यदि भगवान भी धरती पर अवतरित हुआ तो इस दुनिया ने उसे भी नही छोडा तो हम जैसे तुच्छ प्राणी की क्या बिसात्…………………धरती पर आकर तो भगवान को भी धरती के नियम ही निभाने पडे……………ये दुनिया किसी की सगी नही है फिर वो चाहे भगवान ही क्यों ना हो………………जहाँ तक प्रेम की बात है तो उसकी दिव्यता तक तो हम पहुँच ही नही सकते उस अनन्य प्रेम को समझना हम मनुष्यों के बस की बात नही है।
वैसे कविता के भाव बहुत ही सुन्दर बने हैं ……………आपके प्रेम को नमन्।
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